'आतंकवादी हमलों को नहीं रोक सकते'

मुंबई हमला

"मुंबई हिंदुस्तान का चेहरा है. ये आतंकवादियों की नज़रों में हमेशा खटकता रहता है. ये 26/11 आख़िरी हमला है ऐसा मैं नहीं कह सकता क्योंकि मुंबई आतंकवादियों का निशाना था, निशाना है और हमेशा निशाना रहेगा." यह किसी आम आदमी के शब्द नहीं हैं बल्कि महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते के मुख्य केपी रघुवंधी के हैं. ज़ाहिर तौर पर इन शब्दों से मुंबई वालों के हौसले पस्त हो सकते हैं. यह सोच कर कि एक साल पहले हुए हमलों की तरह शहर में इस तरह के हमले आगे भी हो सकते हैं किसी का भी दिल दहल सकता है क्योंकि इतने घातक हमले शहर की मौजूदा पीढ़ी ने कभी नहीं देखे थे. इस पीढ़ी को 1993 के सिलसिलेवार बम धमाके शायद याद न हों. मुंबई के अलग-अलग इलाक़ों में एक के बाद एक 12 धमाकों के बाद शहर की आर्थिक कमर टूट गई थी.

इन धमाकों में 255 लोग मारे गए थे. लेकिन इस पीढ़ी को 2006 के ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाके अच्छी तरह याद होंगे.

सात ट्रेनों के सात अलग-अलग डिब्बों में हुए धमाकों में 180 से अधिक लोग मारे गए थे लेकिन अगले ही दिन ट्रेनें फिर से चलने लगी थीं और आम जीवन सामान्य होने लगा था.

दहशत

26 नवंबर 2008 को हुए हमलों के एक साल बाद लोगों में दहशत अब भी है. और अगर आतंकवाद हमलों को रोकने वाले दस्ते के प्रमुख यह कहे कि मुंबई आतंकवाद का निशाना रहेगा, तो यह इस दहशत को कम करने में मददगार नहीं साबित होगा.

सच तो यह है की पौने दो करोड़ की आबादी वाले इस विशाल शहर को आतंकवादी हमलों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता.

रघुवंशी का कहना है कि उनके बयान का मकसद लोगों को डराना नहीं है बल्कि एक कड़वे सच की तरफ ध्यान दिलाना है. रघुवंशी कहते हैं कि 26/11 जैसे आतंकवाद हमलों से सुरक्षा संबंधित सबक सीखे जा सकते हैं और उनका कहना है कि सबक सीखे गए हैं. इस बारे में मुख्यमंत्री अशोक चौहान की भी दलील यह है कि 26/11 की कमजोरियों को सामने रख कर कई क़दम उठाये गए हैं.

वो कहते हैं, "मैं कहना चाहूँगा कि जो भी कमियाँ नज़र आ रही थीं उन कमियों को दूर करने की पूरी कोशिश की गई है." इसके बाद मुख्यमंत्री ने एक के बाद एक जितने भी क़दम पिछले एक साल में उठाए गए हैं, उन्हें गिनाना शुरू किया.

उन्होंने कहा, "राज्य सुरक्षा समिति का गठन हो, फ़ोर्स वन की स्थापना हो, एनएसजी का क्षेत्रीय केंद्र हो, या ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच बेहतर ताल-मेल हो यह सभी क़दम हमने कैबिनेट के फ़ैसलों के ज़रिए उठाए हैं." मुख्यमंत्री के कहने का मतलब यह था कि अगर अब हमले हुए तो इनसे पिछले साल के मुक़ाबले बेहतर और कम समय में जूझा जा सकता है.

तैयारी

रघुवंशी भी कहते हैं कि किसी भी आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए पुलिस अब पहले से ज़्यादा तैयार है.

वे कहते हैं, "हम ने बहुत क़दम उठाए हैं जो आपको चारों तरफ नज़र आते होंगे. कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो नहीं दिखाई देतीं. मुंबई शहर में और महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में जगह-जगह क्यूआरटी की यूनिट्स बनाईं गई हैं. अहम जगहों में यह यूनिट्स रात-दिन खड़ी दिखाई देंगीं. वो तैयार हैं. हथियारों से लैस हैं. अगर इस तरह की घटना कभी होती है तो पूरी की पूरी यूनिट्स, पुलिस फ़ोर्स तैयार है और पहले तो हमारा प्रयत्न यह होगा कि ऐसी घटना न होने दें. लेकिन अगर हुई तो हमारी परफ़ॉर्मेंस पहले से कहीं बेहतर होगी." उनकी बात सच है. पिछले साल के हमलों के बाद से मुंबई में पुलिस सड़कों पर ज़्यादा दिखाई देती है, नाकाबंदी आम है और रात के पहरों को बढ़ा दिया गया है. उधर निजी तौर पर भी मुंबई में दुकानें, मॉल्स, सिनेमाघर और रेलवे स्टेशनों में सुरक्षा ज़्यादा दिखाई देती है. मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन के हर गेट पर रेलवे गार्ड तैनात हैं. अंदर आने वालों के सामानों की जांच मेटल डिटेक्टर और एक्स-रे मशीनों से की जाती है.

लेकिन यह भारत के सबसे बड़े और सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक है. यहाँ अंदर आने के ऐसे दरवाज़े भी हैं जहाँ कोई पहरा नहीं हैं. पिछले साल के हमलों में इस स्टेशन पर 58 लोग बंदूकधारियों की गोलियों का निशाना बने थे.

यहाँ एक किताब की दूकान के मालिक एहसान मालिक कहते हैं कि वो पहले से अधिक सुरक्षित महसूस ज़रूर करते हैं लेकिन डर हमेश बना रहता है.

उनका कहना है, "जब कभी ज़ोर की आवाज़ होती है या कोई धमाका होता है तो लगता है कोई आतंकवादी हमला फिर हो गया. सुरक्षाकर्मी हर जगह तैनात हैं लेकिन हज़ारों मुसाफ़िरों की जाँच करना असंभव है." तो क्या मुंबई अब सही मायनों में एक सुरक्षित शहर हैं?

पीड़ित

भार्गव जी थांकी मुंबई के एक बड़े व्यापारी हैं. वे उनकी पत्नी हेमा और उनके बेटे हेमन 26 नवंबर की रात ताजमहल होटल में खाना खाने गए थे. और अगले दिन सुबह तक बंधक बने रहे.

क्या थांकी ख़ुद को मुंबई में सुरक्षित महसूस करते हैं? परिवार का कहना है- हाँ, लेकिन बिलकुल सुरक्षित नहीं. थांकी कहते हैं, "पुलिस काफ़ी संख्या में मौजूद हैं. रास्ते पर और भीड़-भाड़ वाले इलाक़ों में पुलिस ज़्यादा सतर्क हो गई है. यह बात भी सही है. एनएसजी का केंद्र भी खुल गया है. सरकार ने जो क़दम उठाए हैं काफ़ी अच्छे हैं. लेकिन और भी थोड़ा करेंगे तो आम जनता ज़्यादा सुरक्षित महसूस करेगी." इस शहर के आम लोगों की राय यह है कि मुंबई में कई आतंकवाद हमले हो चुके हैं और हर बार सरकार दावे करती हैं कि सुरक्षा के इंतजाम कड़े कर दिए गए हैं.

लेकिन वो यह भी स्वीकार करते हैं कि किसी भी बड़े शहर में आतंकवाद हमलों को पूरी तरह से शायद रोका नहीं जा सकता.

हाँ सतर्क रहा जा सकता है और हमलों से जूझने के बेहतर इंतजाम किए जा सकते हैं.

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