गैस पीड़ितों का भोपाल

ट्रेनों, बसों और हवाई जहाज़ों के लेट होने पर लोग कितना ही खीजें, लेकिन "बोरियत के यह लम्हे" कई दफ़ा आपको सोचने और यादों में झाँकने का वक़्त मुहैया करवाते हैं. दिल्ली हवाई अड्डे पर उस दिन भी ऐसा ही हुआ जब भोपाल जाने वाली फ़्लाइट घंटों लेट हो गई. याद आया कि पाँच साल पहले जब मेरी पोस्टिंग भोपाल हुई थी तब मेरी पहली रेडियो और ऑनलाइन श्रृंखला भी भोपाल पर ही थी, भोपाल गैस कांड पर. तब 2-3 दिसंबर 1984 की उस काली रात को घटित हुए बीस साल हुए थे. उस समय यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी से मिथाइल आइसोसाइनाइड लीक हुए थी.

बरसी

इस साल विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना की 25वीं बरसी है जिसमें 15 हज़ार से अधिक लोग मारे गए और पांच लाख घायल हुए थे.

चार घंटे की देरी से भोपाल पहुँचने के बाद जब लोगों से मिलने जुलने का सिलसिला शुरू हुआ तो पाया कि शहर के आम लोगों में इस बात को लेकर कोई चर्चा नहीं थी.

बल्कि इस मामले पर बात शुरू करने पर भाव कुछ इस तरह था कि क्या फिर से वही बात लेकर बैठ गए. सालों पहले मशहूर लेखक मंज़ूर एहतशाम ने कुछ इसी तरह की बात की थी कि पत्रकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं की बदौलत अब भोपाल की पहचान सिर्फ़ गैस कांड तक सिमट कर रह गई है.

संघर्ष

मैंने उनसे कहा था क्या यह भी सच नहीं कि गैस पीड़ितों को जो भी थोड़ी बहुत मदद मिली है वह इन्हीं लोगों के लगातार आवाज़ उठाने और पीड़ितों के संघर्ष की वजह से मिली?

बहरहाल, जहाँ भोपाल के आम लोग और स्थानीय पत्रकारों की बातें शुरू होने वाले विधान सभा सत्र, कुछ दिनों पहले शपथ दिलाए गए मंत्रियों और होने वाले स्थानीय निकाय के चुनावों के इर्द गिर्द घूम रही थी वहीं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारनवीसों और मीडिया से जुड़े लोगों का आना शुरू हो गया था- भोपाल गैस कांड की 25वीं बरसी के सिलसिले में. इस वजह से भोपाल के कई अच्छे होटलों में कमरे मिलना थोडा मुश्किल है तो गाड़ियों के लिए भी ट्रवेल एजेंटों से पहले ही बुकिंग करवानी ज़रूरी है.

बंद पड़ी यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी कुछ जियारतगाह सी बन गई है जिसमें जाने के लिए बाहर से आया लगभग हर पत्रकार ज़िलाधीश के यहाँ अर्ज़ी लगा रहा है और दिन भर के बदले कुछ घंटों की एंट्री के लिए मिल गई तो इसे लोग बड़ी कामयाबी मान रहे हैं.

ज़रूरत

बुकिंग तो आपको इन दिनों स्वयंसेवी संस्थाओं से भी लेनी पड़ेगी. इंटरव्यू करने के लिए, कई तो इनमें सिर्फ़ इसी मौक़े पर कुछ माह के लिए शुरू होकर ख़त्म हो जाते हैं.

मैं भी तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ अब्दुल जब्बार के दफ़्तर पहुँचा लेकिन हमेशा गैस पीड़ितों से घिरे रहने वाले जब्बार भाई (जिस नाम से गैस पीड़ित उन्हें बुलाते हैं) एक पत्रकार के साथ बैठे थे और कई लोग उन्हें बार-बार फ़ोन कर आने का वक़्त मांग रहे थे. वैसे अंग्रेज़ी न बोल पाने वाले जब्बार भाई बाहर के पत्रकारों के फ़ेवरिट नहीं. क्योंकि घटते बजट और कम वक़्त के चलते ऐसे पत्रकारों को कम समय में ही सब कुछ चाहिए.

दो पीड़ित व्यक्ति, दो-तीन ऐसे लोग जिनके परिजन इस हादसे में मारे गए हों और कुछ ऐसे पीड़ित, जो जन्म से ही गैस पीड़ित हैं.

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