'चुनाव के जरिए सत्ता में हमें नहीं आना'

  • 23 दिसंबर 2009
सव्यसाची पंडा
Image caption सव्यसाची पंडा मानते हैं कि वे सरकार के मुक़ाबले अभी बहुत कमज़ोर हैं

एक बड़े नक्सली नेता सव्यसाची पंडा का कहना है कि सरकार जब दमन की तैयारी कर रही है तब बातचीत का प्रस्ताव सरकार का नाटक है.

बीबीसी से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने हथियार छोड़कर चुनाव में भाग लेने की संभावनाओं से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा कि उनकी ताक़त पहले से बेहतर है लेकिन उनकी ताक़त अभी भी वैसी नहीं है जैसा सरकार बता रही है.

उड़ीसा में कंधमाल और गंजाम ज़िले की सीमा पर जंगलों के बीच सव्यसांची पंडा से मुलाक़ात हुई.

41 वर्षीय सव्यसांची पंडा सीपीआई (माओवादी) पार्टी के उड़ीसा इकाई के सचिव हैं. वे पोलित ब्यूरो और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के सदस्य हैं.

अपने हथियारबंद दस्ते के साथ पहाड़ पर बने एक अस्थाई कैंप में सव्यसाची ने लंबी बातचीत की. वे हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार थे. पेश है मुख्य अंश -

आप नक्सल आंदोलन से बहुत लंबे समय से जुड़ें हैं और महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं. तो बताइए कि पिछले 40 वर्षों में नक्सल आंदोलन से क्या हासिल हुआ?

चार दशकों में दंडकारण्य, झारखंड, बिहार और आंध्र प्रदेश तथा उड़ीसा का सीमांत इलाक़ा इन सब जगहों पर जनता की सत्ता की बात हम करते आ रहे थे. इन इलाक़ों में जनता की सत्ता, छोटे पैमाने पर ही सही, बन रही है. इसी से देश में मुक्ति आएगी.

विश्व व्यवस्था तेज़ी से बदल रही है. एक आकलन के मुताबिक आने वाले वर्षों में मुताबिक भारत और चीन विश्व में आर्थिक सत्ता का केंद्र बनेंगे. चीन को अब बाज़ार से कोई परहेज नहीं है वह खुली अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, ऐसे में भारत के माओवादियों की क्या सोच है?

पहले के चीन और वर्तमान चीन में अंतर है. पहले चीन में माओवाद का प्रयोग हुआ लेकिन माओवाद के देहांत के बाद साम्यवादी पार्टी ने जो रास्ता अपनाया वह पूंजीवादी रास्ता था.

चीन में अभी जो चल रहा है वह पूंजीवादी अर्थव्यस्था है. यह माओवादी या क्रांतिकारी रास्ता नहीं है. वे अब साम्राज्यवाद की तरफ़ जाएंगे या नहीं, यह देखना होगा.

नेपाल में भी माओवादियों को सशस्त्र संघर्ष छोड़ कर लोकतांत्रिक रास्ता अपनाना पड़ा. तो क्या सशस्त्र संघर्ष एक रूमानी भर सच्चाई रह गई है?

नहीं ऐसा नहीं है. कुछ लोग हथियारबंद संघर्ष के बाद भटक गए हैं. नेपाल में माओवादियों ने सत्ता में जो दलाल पूंजीवादी, ज़मींदार वर्ग हैं उनके साथ समझौता कर लिया है. हम उन्हें संशोधनवादी मानते हैं.

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्दांत को नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी भूल गई है.

चारू मजूमदार, नागभूषण पटनायक और कानू सान्याल के दौर से देखें तो माओवादी आंदोलन भटका हुआ लगता है, ख़ासकर लोकतांत्रिक संसदीय राजनीति को लेकर.

इन वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन में भटकाव तो आया है. 60 के दशक में दमन के बाद आंदोलन को लेकर सवाल-जवाब हुए हैं. कुछ लोग सीधे संशोधनवादी हो गए.

कानू सान्याल और विनोद मिश्रा जैसे लोग संसदीय राजनीति में घुस गए. कुछ लोग गलतियों से सबक नहीं लेकर उन्हीं से चिपके रहे.

तीसरा रास्ता अपनाने वाले लोगों ने ग़लतियों को सुधार कर जनसंघर्ष को आगे बढ़ाया, जनसंघर्ष और हथियारबंद संघर्ष के साथ तालमेल बनाया, भूमिगत रह कर संगठन को मजबूत बनाया. जनता की सत्ता के लिए संघर्ष किया. ऐसे संगठनों में पीपुल्स वार, पार्टी यूनिटी, एमसीसी आदि हैं.

माओवादी हिंसा के शिकार ज़्यादातर सरकारी कर्मचारी और पुलिस हैं. वो जो कुछ कर रहे हैं वह आजीविका कमाने के लिए ही है. ऐसे निर्दोष लोगों की मौतों को आप लोग किस तरह देखते हैं?

जो शासक वर्ग हैं वह कभी सामने नहीं आता.

पुलिस, संसद कोर्ट को लेकर समाज में भ्रम फैलाया जाता है कि यह आम जनता के लिए है. पुलिस और दूसरे सरकारी कर्मचारी शोषक वर्ग के लिए काम करते हैं. उनकी सत्ता को बचाने के लिए काम करते हैं. ऐसे में संघर्ष तो पुलिस, सेना के साथ ही होगा.

यह सच है कि ये मजदूर-किसान परिवार से आते हैं. पुलिस को हम मारेंगे ही, ऐसा नहीं है. हमने कई पुलिस को पकड़ने के बाद छोड़ा भी हैं. साधारण जनता, आदिवासी को नक्सल बोल कर मारने वालों, महिलाओं के साथ बलात्कार करने वालों को हम बेकसूर नहीं कह सकते. तो उनके ख़िलाफ़ संघर्ष कार्रवाई करता ही है.

प्रधानमंत्री ने नक्सलवादियों को देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया है, आप जैसे नेता इसे किस रूप में देखते हैं?

Image caption नक्सली कहते हैं कि उनके पास वैसे हथियार नहीं है जैसे सरकार बता रही है

नक्सलवादी देश के लिए ख़तरा नहीं हैं. प्रधानमंत्री सम्राज्यवाद, पूंजीपति वर्ग और जमींदारों के प्रतिनिधि हैं. हां, नक्सलवाद इनके लिए बड़ा ख़तरा है, ऐसा हम मानते हैं.

नक्सलवाद सत्ता को बदलने की बात कर रहे हैं. प्रधानमंत्री की यह वर्ग दृष्टि है कि जो जनता के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनको आंतकवादी बोल रहे हैं. अमरीका या भारत सरकार उनको आंतकवादी कह रही है जो जनता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यह चोरी करने वालों का दूसरों को चोर बोलने जैसा है.

माओवादी सिर्फ़ एक चरमपंथी आंदोलन है या सच में यह आतंकवादी आंदोलन हो गया है.

माओवादी आंदोलन एक क्रांतिकारी आंदोलन है. यह एक वर्ग संघर्ष है. सही मायने में जनता की सरकार के लिए यह संघर्ष है. शोषण खत्म करने वाला एक संघर्ष है. इसे आप आतंकवादी कैसे कह सकते हैं? हां हम जो कुछ आंतकवादी कार्यकलाप कर रह हैं वह आम जनता के लिए नहीं है, बल्कि पूंजीपति, ज़मींदार वर्ग के लिए है. इसे हम लाल आंतक बोलते हैं. हम यह जनता को साथ लेकर करते हैं.

गृहमंत्री का कहना है कि माओवादी देश के 200 ज़िलों में फैल चुके हैं, आपका इस बारे में आपका क्या कहना है?

प्रभाव की बात करें तो पूरे देश में हमारा प्रभाव है. जनता के ऊपर शोषण के खिलाफ एक ही रास्ता है. लेकिन यह आंकड़ा बढ़ा चढ़ा कर दिया जा रहा है जिससे कि बड़े पैमाने पर दमन करने की सरकारी योजना बनाई जा सकी.

हम कभी नहीं सोचते कि हम बहुत बड़े हो गए हैं. ऐसा सोचें तो हमारा हश्र भी एलटीटीई की तरह ही होगा.

केंद्रीय गृहमंत्री ने नक्सली हिंसा से हुए मौत के आंकड़े भी दिए हैं, जिसके अनुसार अब सबसे ज़्यादा मौतें नक्सली हिंसा की वजह से हो रही हैं. क्या ये आंकड़ें कभी नक्सलवादी आंदोलनकारियों को विचलित नहीं करते?

ये आंकड़ें ठीक नहीं हैं. सरकारी पुलिस, सेना की तरफ से जो हिंसा होती है उसकी प्रतिहिंसा में हम कार्रवाई करते हैं. सरकार अपना शोषण चलाने के लिए हिंसा कर रही है.पुलिस और सेना की कार्रवाई में जो आम लोग मारे जाते हैं, वो हमारे नेताओं को जिस तरह से पकड़ कर फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे देते हैं, वह भी इसमें शामिल है.

सरकार दिखाने की कोशिश कर रही है कि इन सब मौतों के लिए भी हम ज़िम्मेदार हैं. वैसे संघर्ष में कुछ जान तो जाएगी ही.

नक्सलवाद को कुचलने के लिए बड़ी कार्रवाई की योजना बन रही है, आखिर हिंसा का दौर कब रूकेगी.

सरकार बड़े पैमाने पर दमन करेगी, यह हम जानते हैं. लेकिन संघर्ष भी उतना ही बड़ा होगा. शोषक वर्ग जब तक रहेगी तब तक हिंसा जारी रहेगी. संघर्ष चलता रहेगा. जनवादी सरकार जब आएगी तब शोषक वर्ग के साथ हिंसा खत्म हो जाएगी

आपको यह उम्मीद है कि आने वाले दिनों में कभी ऐसा होगा?

जो उम्मीद नहीं रखेंगे वो क्रांति में क्यों शामिल होंगे.

Image caption सव्यसाची मानते हैं कि एलटीटीई ने कई नीतिगत ग़लतियाँ कीं और माओवादी आंदोलन ने इससे सबक सीखे हैं

क्या आपको लगता है कि भारत सरकार श्रीलंका में एलटीटीई के ख़ात्मे से उत्साहित है. एलटीटीई की हार को माओवादी नेता किस रूप में देखते हैं?

हां, ऐसा है. लेकिन यह एक पहलू है. एलटीटीआई के हार जाने के अन्य कारण को वह नहीं देखते हैं. वे देखते हैं कि एलटीटीआई के पास इतने हथियार थे, इंफ्रास्टकचर था जिसे हमने कुचल दिया.

एलटटीआई की हार के कई कारण हैं. एक तो संगठन को तमिल समुदाय के अंदर के एक हिस्से से समर्थन नहीं था. वह सारे सिंहली को दुश्मन मानना भी गलत था. ऐसे लोग जो उनका समर्थन कर सकते थे, जो उनके आंदोलन को समझ सकते थे, उन सिंहली लोगों को भी एलटीटीई ने साथ नहीं लिया. मास लाइन यानी व्यापक जनसमर्थन उनके पास नहीं था. जनवादी तरीका उन्होंने नहीं अपनाया.

सबसे बड़ी ग़लती थी कि उन्होंने अपनी ताकत को दुश्मन की ताकत से बड़ा आंका. गुरिल्ला युद्ध के सिद्धांतों के अनुसार जब आपकी ताक़त कम हो रही थी, तो आपको पीछे हट जाना था.

हमने इससे सबक सीखा है.

बस्तर जिसे दंडकारण्य भी कहते हैं, का आधा हिस्सा, दुनिया से कटा हुआ है. अधिकांश हिस्सों में शिक्षा की व्यवस्था नहीं है, पानी नहीं है, शौचालय नहीं है. माओवादी दावा करते हैं और सरकार भी मानती है कि माओवादियों ने वहाँ समांतर व्यवस्था कायम कर रखी है. आप इसे किस रूप में देखते हैं?

पीने के पानी का सवाल, खाने का सवाल पूरे देश का सवाल है. वहां के आदिवासियों के लिए सत्ता ने कुछ नहीं सोचा. जहाँ लोगों को धान की खेती के बारे में पता नहीं था, उसे हमने खिखाया. मछली पालन सिखाया. अस्पताल हमने बनाया है, भले ही पूरा बंदोबस्त वहाँ नहीं है.

हम आदिवासियों की भाषा बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए हम काम कर रहे हैं.

हमने वहाँ पीने के पानी के लिए छोटे कुएँ बनाने शुरु किए. इससे पहले सरकार बड़े कुएँ बनाकर पैसा ख़र्च कर चुकी थी. अब छोटे कुएँ की उपयोगिता को देखते हुए सरकार दूसरे राज्यों में भी यह प्रयोग दोहरा रही है. इसी को मॉडल बना कर सरकार अन्य जगहों पर लागू कर रही है.

सलवा जुडूम के तौर तरीके माओवादी आंदोलन की तरह ही हैं, क्या आदिवासियों ने इसे खुद खड़ा किया है?

बिलकुल नहीं, यह स्वतस्फूर्त नहीं है. सलवा जुडूम के पीछे सरकार है. सीआरपीएफ और सलवा जुडूम साथ-साथ हैं जो बेकसूर जनता को मार रही हैं और वे इसे नक्सलवादी के साथ एनकांउटर बताते हैं.

सलवा जुडूम में भाग लेने वालों में सरकार की नीतियों के प्रतिनिधि है. उनमें से कुछ लोग माओवादियों के उन सामाजिक सुधारों से नाख़ुश थे जो बाहरी समाज से आदिवासी समाज में आ गए थे. हमने बहुविवाह प्रथा को ख़त्म किया और घोटुल को ख़त्म किया तो कई लोगों को यह नागवार गुज़रा. वे लोग आदिवासी भाषा के लिए कुछ नहीं करना चाहते, लेकिन इन सुधारों का विरोध करते हैं. महेंद्र कर्मा जैसे लोग इसमें हैं.

सलवा जुडूम से क्या फायदा नुकसान हुआ है माओवादी आंदोलन को?

सलवा जुडूम के खिलाफ हम लोग हथियारबंद होकर उतरे. हमारे आंदोलन में सीधे-सीधे लोग जनयुद्ध में शामिल हुए. इससे हमारी सत्ता मजबूत हुई. आंदोलन को इससे फायदा हुआ. पहले हम गाँव के स्तर पर थे लेकिन सलवा जुड़ुम की वजह से हम ज़िले के स्तर पर संगठन बनाने की स्थिति में आ गए हैं.

केंद्र सरकार का दावा है कि माओवादी का संबंध पूर्वोतर राज्य की चरमपंथियों के साथ है, इस बात में कितनी सच्चाई है.

पूर्ववर्ती राज्यों में चल रहे आंदोलन को हम चरमपंथी नहीं कहेंगे. वे जातीय आंदोलन चला रहे हैं, ऐसा हम मानते हैं. हम इसके पक्ष में हैं. इसलिए सरकार ऐसा कह रही है.

कुछ-कुछ संगठन के साथ विचार के स्तर पर हमारा संबंध है तो कुछ के साथ थोड़ा ज्यादा है. हम एक-दूसरे के अनुभव का आदान-प्रदान कर रहे हैं.

नेपाल के माओवादियों के साथ आपके कैसे संबंध हैं?

पहले तो विचार के स्तर पर था. हम उनके पक्ष में थे, वे लोग भी हमारे पक्ष में थे. उनके अनुभव से हम, हमारे अनुभव से वे लाभान्वित हुए. लेकिन अब वे गलत रास्ते पर हैं.

हम उन्हें सलाह ही दे सकते हैं कि ये संशोधनवाद का रास्ता है. ये रास्ता छोड़ कर ही क्रांति संभव है.

माओवादी संगठनों पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (आईएसआई) के साथ संबंध का आरोप भी लगता रहा है...

सरकार ऐसा प्रचार कर रही है. ये तो साफ़-साफ़ झूठ है.

हम क्रांतिकारी है. पाकिस्तान के साथ मदद लेकर हम काम करेंगे यह विचारधारा के अनुकूल नहीं है. देश को बर्बाद करने के लिए हम संघर्ष नहीं कर रहे हैं. देश को ठीक करने के लिए, शोषण-उत्पीड़न को खत्म करने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं.

भारत सरकार एक बडी़ कार्रवाई की बात कर रही है, तो संघर्ष के लिए आपकी क्या तैयारी है?

हथियार-संसाधन एक पहलू है. जनता को साथ लेकर चलना है, वर्ग दृष्टि आपकी क्या है यह महत्वपूर्ण है. 80 प्रतिशत से ज्यादा जनता आपके पास नहीं होगी तो क्रांति सफल नहीं होगी.

सरकार प्रचार कर रही है कि हमारे पास काफी संसाधन है, यह झूठ है. हथियार के मामले में हम कमजोर हैं. हालांकि हम पहले से बेहतर स्थिति में हैं. सरकार से छीन कर हमें धीरे-धीरे हथियार मिल रहे हैं.

बाहर से हम बड़ी मात्रा में हथियार ला रहे हैं, यह दुष्प्रचार है.

समाज में हाशिए पर आदिवासियों की तरह दलित भी हैं, फिर माओवादियों के आंदोलन का हिस्सा दलित क्यों नहीं बन पाए?

यह कहना ठीक नहीं है माओवादी आंदोलन के साथ दलित नहीं है. हमारी पार्टी में दलित लोगों की संख्या काफी है. बिहार, आंध्र प्रदेश आदि मैदानी इलाके में जहाँ हमारा संघर्ष है वहाँ हमें दलितों का साथ है.

लेकिन आदिवासी इलाके में दलित हमारे साथ कम आ रहे हैं यह सही है. इन इलाकों में दलित और आदिवासियों के बीच छोटा-मोटा झगड़ा है. लेकिन कंधमाल जैसे मुद्दों को लेकर हमने सांप्रदायिक फासीवाद से लड़ाई लड़ी अब दलितों की सोच में बदलवा आया है.

मध्यवर्ग माओवादी आंदोलन से नहीं जुड़ पा रहा है, क्या यह आंदोलन की विफलता नहीं है?

शहर में माओवादी आंदोलन नहीं है, ऐसे में शहरी मध्यवर्ग कैसे आंदोलन से जुड़ेंगे.

सरकार दुष्प्रचार भी फैला रही है कि माओवादी के साथ जुड़ने से दमन होगा. आंदोलन के पक्ष में काफी मध्यवर्ग के लोग हैं.

चौक-चौराहे पर माओवादी आंदोलन के पक्ष में बात होती हैं, लेकिन वे दुष्प्रचार की वजह से आंदोलन से सीधे नहीं जुड़ रहे हैं.

आंध्र प्रदेश में दो वर्ष का युद्ध विराम, सरकार से बातचीत फिर विफलता, फिर बड़ा संघर्ष- इन सबसे क्या सबक सीखा है?

हमारी स्थिति कमजोर हो गई थी. हमने सोचा था कि युद्ध विराम के बाद हम मजबूत बन कर उभरेंगे. बातचीत के माध्यम से सरकार ने एक चाल चली थी.

बातचीत का नाटक कर उन्होंने माओवादी नेटवर्क की जानकारी हासिल की और फिर उसका इस्तेमाल हमारे ख़िलाफ़ किया. सरकार जनता के मुद्दों को वे हल नहीं करना चाहती थी. हमें यह सबक मिली की दुश्मन के चाल को ठीक से समझना चाहिए. हम नहीं फँसेंगे अब.

किसी भी प्रदेश में राज्य या केंद्र सरकार से बातचीत की कोई सूरत नजर आती है?

अभी सरकार दमन के बारे में सोच रही है, बातचीत कौन करेगा. सरकार अगर वार्ता की बात करती है तो वह सरकार का नाटक है.

सरकार को जलवा जूडूम, शांति सेना को बंद करना चाहिए. बिना दमन रोके बातचीत कैसे संभव है.

प्रधानमंत्री ने कहा है कि बुद्धिजीवी का एक वर्ग माओवादी के साथ है, इसे माओवादी आंदोलन की तारीफ़ माने या सरकार की हताशा...

यह भी सरकार की एक साजिश है. वे बुद्धिजीवियों को भी माओवादियों का साथी बता कर मार डालना चाहते हैं. ऐसा वे कोलकाता में पहले भी कर चुके हैं.

बुद्धिजीवी जनता के बारे में, देश के बारे में सोच रहे हैं, इस वजह से माओवादी के साथ उनकी सोच कुछ बातों में मिल जाती है. उनको फंसाने के लिए सरकार ऐसा कर रही है. माओवादी कहते हैं कि रात में चाँद दिखता है और बुद्धिजीवी कहते हैं कि रात में चाँद निकलता है तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि बुद्धिजीवी माओवादी हो गए.

बुद्धिजीवी नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा. क्रांति सफल होने के लिए सभी लोगों का साथ चाहिए.

आंदोलन में या जवाबी कार्रवाई में जो मौत हो रही उससे मानवाधिकार के हनन की बात हो रही है, आपकी क्या सोच है?

सत्ता शोषण और उत्पीड़न के जरिए खुद मानवाधिकार का हनन कर रही है. पहले दास समाज में एक दास के मारे जाने से कोर्ट में कोई नहीं केस नहीं बनता था. पुलिस आज बेकसूर आदिवासी को मार डालती है, पुलिस पर कोई केस नहीं हो सकता है. तो फर्क क्या है? सरकार ने जनता को वेबकूफ बनाने के लिए मानवाधिकार बनाया है कि देखो हम कितने जनवादी हैं. लोग जानवर जैसे रह रहे हैं, मलेरिया, डायरिया से मर रहे हैं कौन जिम्मेदार है इसके लिए. सरकार पर केस करेंगे? यहां से मानवाधिकार की बात कीजिए.

सरकार का कहना है कि क्रांतिकारी आंदोललन की आड़ में माओवादी बड़े व्यापारियों, ठेकेदारों से नियमित पैसा लेते है और उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है.

सरकार अपनी सत्ता चलाने के लिए आम जनता से कर लेती है. कंपनियों से भी कर लेती है लेकिन उसे जरूरत पड़ने पर छूट भी देती है.

हम भी सत्ता चला रहे हैं, जनता के विकास के लिए काम कर रहे हैं, युद्ध लड़ रहे हैं. आम जनता हमें मदद करती है लेकिन उससे युद्ध चलाना मुश्किल है. तो इसके लिए हमारे इलाके में काम करने वाले दुश्मन वर्ग कांट्रेक्टर, व्यापारियों से हम कर लेते हैं, मदद नहीं लेते हैं.

हम अपनी विचारधारा को नहीं छोड़ते. जनता के खिलाफ जो चीज है जैसे खनिज उत्पादन, तो हम उसे नहीं होने देंगें.

वर्ष 1989 के बाद देश में गठबंधन की सरकार बनती रही है जिसमें मुख्य पार्टी को 200 के क़रीब सीट मिलती रही हैं. यदि एक क्षण को माने की 200 ज़िलों में आपका प्रभाव है तो क्यों नहीं आप चुनाव लड़े और सरकार बनाए.

चुनाव लड़ेंगे या नहीं यह मूल बात नहीं है. शोषण उत्पीड़न से लड़ने में चुनावी राजनीति ठीक होगी या नहीं यह मूल बात है.

चुनाव के जरिए सत्ता में आना यह बात हमारे बीच नहीं है.

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