आख़िर कब मिलेगा गैस पीड़ितों को इंसाफ़

भोपाल हादसा
Image caption भोपाल गैस दुर्घटना में हज़ारों लोगों की जान गई थी

अगर हर दिन मरना हो तो सोचता हूँ आख़िर कोई कितनी बार मर सकता है. आख़िर मरने की भी एक हद होती है. मगर नहीं. हम भोपाल वाले तो अभिशप्त हैं.

हर रोज़ जीने का अभिनय करते हुए मरते हैं. अगले दिन शुमार हो जाते हैं उस गिनती में जिसे भोपाल गैस पीड़ितों की मृतक संख्या कहा जाता है. अब तक 25 हज़ार, बाक़ी बचे पाँच लाख.

दिसंबर 2 और 3 सन् 1984 की आधी रात शुरू हुआ ये मौत का खेल. या शायद 1969 में क्योंकि इसी साल तो हमारी सरकार ने अपनी बाहें फैलाकर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड का स्वागत किया और भोपाल में कीटनाशक कारख़ाना खुलवाया.

15 साल बाद, कार्बाइड ने अपना काम पूरा कर दिखाया– दिसंबर की उस सर्द आधी रात में बेख़बर सो रहे भोपाल के बेगुनाह और मासूम लोगों को कीट-पतंगों की तरह मारकर.

कार्बाइड का यह ज़हर, जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) कहा जाता है सचमुच काफ़ी असरदार है. इसकी ज़द में आने वाले उस घड़ी न मरे तो अब पल-पल मरते हैं. वह भी दुनिया को ये ख़ुशफ़हमी देते हुए कि वे जी रहे हैं.

कुछ दिन बाद पता चलता है कि असल में वे मर रहे थे. तब थोड़ी देर को मातम होता है. लगभग उतनी ही देर को हम सबको यह अहसास होता है कि हमारे इस ख़ूबसूरत शहर भोपाल को 25 साल पहले ग्रीक त्रासद नाटकों के मंच में बदल दिया गया है.

एक ऐसा मंच जहां पर हर पात्र अपनी-अपनी त्रासदी को भोगता हुआ अपने दुखद मगर एक निश्चित अंत की ओर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है.

आशंका

मेरा दुर्भाग्य है कि 28 साल पहले मेरे मन में यह आशंका पैदा हुई थी और कोशिश की थी कि अपने शहर और लोगों की मौत को रोक सकूं.

वर्ष 1981 के दिसंबर महीने में कार्बाइड प्लांट में कार्यरत मोहम्मद अशरफ़ की फ़ास्जीन गैस की वजह से मौत हो गई. मैं चौंक गया.

वहां पहले भी दुर्घटनाएं हुई थीं और वहां के मज़दूर और आसपास के लोग प्रभावित हुए थे. मैने एक पत्रकार के नाते इसे पूरी तरह जान लेना ज़रूरी समझा कि आख़िर ऐसा क्या होता है इस प्लांट में.

नौ महीने की जी-तोड़ कोशिशों के नतीजे में साफ़ साफ़ दिखाई दे गया कि यह कारखाना एक बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह चल रहा है. सुरक्षा के सारे नियमों की धज्जियां उड़ाता हुआ.

किसी दिन यह इस पूरे शहर की मौत का सबब बन सकता है. आख़िर को एमआईसी और फ़ास्जीन दोनों ही हवा से भारी गैस हैं.

19 सितंबर, 1982 को अपने छोटे से साप्ताहिक अख़बार ‘रपट’ में लिखा ‘बचाइए हुज़ूर, इस शहर को बचाइए’. एक अक्तूबर को फिर लिखा ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’. आठ अक्तूबर तो चेतावनी दी ‘न समझोगे तो आख़िर मिट ही जाओगे.’

जब देखा कोई इस संभावना को गंभीरता से नहीं ले रहा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को पत्र लिखा और सर्वोच्च न्यायालय से भी दख़ल देकर लोगों की जान बचाने का आग्रह किया. अफ़सोस, कुछ न हुआ.

अनदेखी

हुआ तो बस इतना कि विधानसभा में सरकार ने इस ख़तरे को ही झुठला दिया और कार्बाइड को बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था वाला कारखाना क़रार दिया.

फिर हिम्मत जुटाई और 16 जून, 1984 को देश के प्रमुख हिन्दी अख़बार ‘जनसत्ता’ में फिर यही मुद्दा उठाया. फिर अनदेखी हुई. और फिर एक आधी रात को जब सोते हुए दम घुटने लगा तो जाना मेरी मनहूस आशंका बदनसीबी से सच हो गई है.

उस रात के बचे, अब तक जीते हैं. कई हज़ार जनाज़ों का बोझ सीने पर उठाए जीते हैं कि इंसाफ़ हो. शहर के ग़रीब-मज़लूम और लाचार लोगों को अस्पतालों में हर दिन दम तोड़ते देखते हुए चीखते हैं– इंसाफ़ हो.

मगर 25 साल में इंसाफ़ नहीं हो पाया है. अब तक किसी एक भी गुनहगार को सज़ा नहीं हुई है. कल होगी, पता नहीं.

हां, एक बात ज़रूर पता है – हम मरते-मरते भी अब तक जीते हैं, शायद किसी दिन जीतें भी.

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