भारत को कोई क़ानूनी बाध्यता स्वीकार नहीं

जयराम रमेश

भारत के केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि कोपनहेगन में भारत एक सकारात्मक रुख के साथ जाएगा लेकिन उत्सर्जन में कटौती के मुद्दे पर किसी तरह की क़ानूनी बाध्यता स्वीकार नहीं करेगा.

उन्होंने बताया कि सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में कार्बन उत्सर्जन की दर कम हुई है और इसमें 20-25 प्रतिशत तक की कमी लाने का लक्ष्य भारत ने रखा है.

गुरुवार को भारतीय संसद की लोकसभा में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का वो देश है जिसपर जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक असर पड़ रहा है. इसलिए भी भारत को गंभीर और ज़िम्मेदार बनना होगा.

उन्होंने कहा, "भारत जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कोपनहेगन में हो रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एक सकारात्मक रुख़ के साथ जाएगा. हम एपने रुख में एक लचीलापन रखेंगे क्योंकि हम कोपनहेगन में एक व्यापक समझौता चाहते हैं. भारत चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे देशों के साथ संवाद भी बनाएगा."

उन्होंने यह भी दोहराया कि आने वाले दिनों में भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन किसी विकसित देश की तुलना में कम ही रहेगा. पर साथ ही उन्होंने कहा कि अमरीका और चीन की तुलना में काफी कम उत्सर्जन करने का यह मतलब नहीं है कि भारत इस मुद्दे पर गंभीर न हो.

कुछ अहम तर्क

कोपनहेगन सम्मेलन और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत के रुख की कई अहम बानगी जयराम रमेश ने संसद के पटल पर रखीं.

उन्होंने कहा, "भारत न तो किसी तरह की क़ानूनी बाध्यता स्वीकार करेगा कि उत्सर्जन में इतनी कटौती करनी है और न ही उत्सर्जन की सीमा को लेकर को समयबद्धता स्वीकार की जाएगी."

उन्होंने कहा कि भारत सरकार की ओर से इस दिशा में जो भी प्रयास किए जा रहे हैं या जो भी काम मंत्रालय और सरकार कर रहे हैं, उनकी जवाबदेही भारतीय संसद में तय होनी चाहिए, किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के प्रति जवाबदेह होने की ज़रूरत नहीं है.

जिन अहम प्रयासों की ओर उन्होंने संकेत दिए उनमें से एक था उत्सर्जन में वृद्धि की दर को कम करना. इसके लिए उन्होंने उत्सर्जन में सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में होने वाली वृद्धि की दर 20 से 25 प्रतिशत तक कम करने की बात कही.

उन्होंने कहा कि दिसंबर, 2011 तक वाहनों के लिए ईधन के इस्तेमाल के मानक तय किए जाएंगे और ऐसा सुनिश्चित कराने के लिए क़ानूनी प्रयास भी किए जा सकते हैं.

उन्होंने भवन निर्माण के लिए भी मानक तय करने की बात कही और कहा कि इसे लेकर सभी राज्य सरकारों और निकायों से संपर्क किया जाएगा. उन्हें कहा जाएगा कि भवन निर्माण की दिशा में इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जाए.

वार्षिक रूप से भारत के वनों की स्थिति पर एक रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करने की बात भी उन्होंने कही. साथ ही क्लीन कोल तकनीक की मदद से कोयले के इस्तेमाल में उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए प्रयास करने की भी बात उन्होंने कही.

भारत के प्रयास

संसद में उन्होंने स्वीकारा की भारत की ओर से अबतक जो प्रयास हुए हैं, वो नाकाफी हैं.

पहली चिंता उन्होंने इस बात पर व्यक्त की कि जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई ठोस और निष्पक्ष अध्ययन या काम भारत की ओर से अभी तक नहीं हुआ है.

उन्होंने बताया कि भारत या दुनिया के अधिकांश देशों की इस बारे में पूरी जानकारी केवल पश्चिमी देशों के अध्ययन और शोधों पर आधारित हैं. हालांकि केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत की ओर से एक राष्ट्रीय स्तर का प्रयास इस दिशा में शुरू हुआ है.

इस प्रयास के तहत भारत में जलवायु परिवर्तन की स्थिति का अध्ययन किया जाएगा. इसके लिए विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहे 97 संस्थानों और 250 वैज्ञानिकों को काम पर लगाया गया है.

कोपनहेगन में भारत के प्रतिनिधिमंडल के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल में कुल पाँच सांसदों को शामिल किया गया है. इनमें से तीन लोकसभा से और दो राज्यसभा से हैं.

इसके अलावा दो स्कूल जाने वाले बच्चों और दो कॉलेज स्तर के विद्यार्थियों को भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया जाएगा.

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