'सर्च इंजनों के साथ सहयोग ज़रुरी'

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Image caption दुनिया भर में अख़बारों को इंटरनेट से चुनौती मिल रही है.

पत्रकारिता के विश्व स्तरीय तीन दिवसीय शिखर सम्मलेन में आह्नान किया गया कि समाचार पत्रों की कमज़ोर होती हुई स्थिति से निपटने और उनकी घटती हुई आय को सँभालने के लिए गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू जैसी कंपनियों को उनके साथ सहयोग करना चाहिए.

सम्मेलन में सतास्सी देशों से नौ सौ प्रतिनिधियों, संपादकों, पब्लिशरों और पत्रकारों ने भाग लिया है.

वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज़पेपर्स एंड पब्लिशर्स की 62वीं विश्व कांग्रेस और 16वीं वर्ल्ड एडिटर्स फोरम की कांफ्रेंस के दौरान शुरु से आखीर तक यही सवाल चलता रहा कि इन्टरनेट और न्यूज़ पोर्टल्स के कारण कमज़ोर पड़ते हुए समाचार पत्रों को कैसे संभाला जाए.

आज आखिरी दिन दो सत्रों में इस मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित किया गया. जहाँ एक सत्र में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अगर समाचार पत्रों को अपने आप को जिंदा रखना है और मज़बूत बनाना है तो उन्हें पाठकों का विश्वास और दिल जीतने के लिए अपने आप में लगातार नयापन लाना पड़ेगा और तकनीक का बेहतर प्रयोग करना पड़ेगा.

दूसरे सत्र में उस चुनौती पर ध्यान केंद्रित किया गया जो गूगल जैसे सर्च इंजन से समाचार पत्रों के लिए उभर रहा है. इस सत्र में गूगल कम्पनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उनकी कंपनी समाचार पत्रों की सहायता के लिए उनके साथ बातचीत को तैयार है.

इनोवेशन इंटरनेशनल मीडिया कंसल्टिंग ग्रुप के उपाध्यक्ष जॉन सेनोर ने समाचारपत्रों में नएपन लाने के प्रयासों पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि वो पत्रकारिता और समाचार पत्रों के भविष्य को लेकर परेशान नहीं है बल्कि उन्हें समाचार पत्रों में छपने वाली सामग्री की चिंता अधिक है क्योंकि वो पिटे हुए समाचार ऐसे घिसे पिटे अंदाज़ में छापते हैं जो कम ही लोग पढ़ना चाहेंगे.

उन्होंने कहा कि लोग अब समाचार के लिए अखबार नहीं पढ़ते बल्कि वो घटनाओं को समझने और उनके विश्लेषण के लिए पेपर पढ़ते हैं. उन्हों ने कहा कि "कोई यह नहीं जानना चाहता की गुज़रे हुए कल क्या हुआ था. वो यह जानना चाहते हैं कि आने वाले कल में क्या होने वाला है".

सेनोर ने कहा, "समाचार पात्र उसी समय सफल होंगे जब वो एक नई कहानी एक अलग और दिलचस्प अन्दाज़ में सुनाएंगे. लोगों को ऐसी पत्रकारिता नहीं चाहिए जो केवल समस्याओं की बात करे बल्कि उन्हें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो उन के समाधान के रास्ते बताए".

Image caption गूगल जैसे सर्च इंजन अख़बारों की ख़बरें फ्री में इंटरनेट पर मुहैया कराते हैं.

गूगल का हम क्या करें?

इस विषय पर एक दुसरे सत्र में जहाँ समाचार पत्रों के संपादकों और पब्लिशरों ने यह शिकायत की कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू जैसी इन्टरनेट कंपनियां समाचारपत्रों की रिपोर्टें अपने वेबसाइट के ज़रिए पाठकों को उपलब्ध कराकर कॉपीराईट कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और समाचार पत्रों का नुकसान कर रहे हैं, वहीँ गूगल ने इस का खंडन किया.

गूगल कंपनी के वरिष्ट उपाध्यक्ष डेविड ड्रमंड ने माना कि समाचार पत्रों का घटता हुआ सर्कुलेशन और घटती हुई आमदनी चिंता का कारण है और उस से निपटने के लिए गूगल समाचारपत्रों के मालिकों और उनके संगठनों के साथ मिल कर काम करने पर तैयार है. लेकिन उन्होंने इस बात का खंडन किया कि समाचार पत्रों में छपने वाली सामग्री आन लाइन उपलब्ध करवाकर गूगल बहुत पैसा कमा रही है.

दूसरी और "इनडिपेंडेंट न्यूज़ एंड मीडिया" के सीईओ गेविन ओ राइली ने गूगल पर कॉपी राईट कानून का उल्लंघन का आरोप लगते हुए कहा कि ऐसे उपकरण बनने चाहिए जिससे गूगल जैसी कम्पनियाँ इस तरह की गतिविधियां जारी न रख सकें और इस से होने वाली आमदनी का एक बड़ा हिस्सा उन समाचार पत्रों को मिलना चाहिए जिन्होंने इस सामग्री की तैयारी पर पैसे खर्च किए हैं.

उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल गूगल की नहीं है बल्कि उन सब कंपनियों की है जो समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाली सामग्री को एक जगह कर के उन्हें पाठकों को मुफ्त में उपलब्ध करवाते हैं.

कोरिया न्यूज़पेपर्स एसोसिएशन के डे व्हेन चांग ने दक्षिणी कोरिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां इन्टरनेट पोर्टल्स ने समाचारपत्रों की बुनियादों को ही खोखला कर दिया है और विज्ञापनों से समाचारपत्रों को होने वाली आमदनी कम हो गई है और पोर्टल्स को होने वाली आमदनी बढ़ गई है.

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