जलवायु परिवर्तन का शिकार होते बच्चे

  • 4 दिसंबर 2009
बच्चे
Image caption सैंकड़ों बाढ़ प्रभावित बच्चे शिविरों में रह रहे हैं.

कृष्णा नदी के मीलों चौड़े पाट के किनारे बसवागाद्दपुरम गाँव दूर से ही बड़ा सुंदर और आकर्षक दिखता है. लेकिन नज़दीक आने पर यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि दो अक्तूबर को इस नदी में आई भयंकर बाढ़ ने कितनी तबाही मचाई थी.

लेकिन दो सौ परिवारों वाला यह गाँव इस मायने में खुशनसीब है कि यहां ग़ैर सरकारी संगठन सेव द चिल्ड्रेन ने छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित घर स्थापित किए हैं.

इस संस्था ने हाल ही में अपनी विशेष अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि बाढ़ और सूखे जैसी विपदा से मरने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और केवल भारत में हर साल इन कारणों से मरने वाले बच्चों की संख्या ढाई लाख है जो अगले बीस वर्षों में चार लाख हो जाएगी.

ये रिपोर्ट कोपेनहेगेन में होने वाली जलवायु परिवर्तन बैठक के मद्देनज़र तैयार की गई है. रिपोर्ट का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह कि विपदाएँ बढ़ती जा रही है.

बाल पीड़ा

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य डॉक्टर शशिधर रेड्डी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण काफी बदलाव देखने को मिल रहा है जिसमें मौसम और मॉनसून में आने वाला परिवर्तन भी शामिल है.

Image caption कुछ बच्चों को शिविरों का सहारा भी नहीं हैं.

कहीं बारिश ज़्यादा तो कहीं कम हो रही है. मिसाल के तौर पर मुंबई में 24 घंटे में 944 से लेकर एक हज़ार मिलीमीटर बारिश हुई और उसके बाद कई जगहों पर ऐसा हुआ.

हाल ही में कर्नूल, महबूबनगर और कर्नाटक में भी ऐसी ही बारिश हुई. महबूबनगर में सालाना बारिश औसत 60 सेंटीमीटर है लेकिन दो अक्तूबर को 24 घंटे में 32 सेंटीमीटर बारिश हुई.

सेव द चिल्ड्रेन की जर्मन सदस्य दरीना हयल्स का कहना था, बाढ़ से बेघर बच्चे अस्थाई शिविरों में रह रहे हैं. वह अपने जाने पहचाने वातावरण से दूर हैं. हो सकता है इन्हें बाल मज़दूर बनना पड़े.

बाढ़ पीड़ित इलाक़ों में बच्चों को शारीरिक रोगों और पीड़ा का तो सामना करना ही पड़ता है, वह मानसिक और वैज्ञानिक समस्यायों से भी घिर जाते हैं.

दरीना हेयल्स उदाहरण देकर बताती हैं कि किस तरह एक बूढी महिला ने उनसे अनुरोध किया कि वह उनकी अनाथ पोती को लेकर चली जाएँ क्योंकि उनके पास पेट भरने के लिए कुछ नहीं है.

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