सामाचारपत्रों पर गंभीर चिंतन, कई सवाल

समाचारपत्र
Image caption नए संचार माध्यम के आने के बाद समाचारपत्रों की लोकप्रियता प्रभावित हुई है.

पत्रकारिता की दुनिया का विश्व स्तरीय सम्मलेन गुरूवार को हैदराबाद में इस आह्वान के साथ संपन्न हुआ कि समाचारपत्रों की कमज़ोर होती हुई स्थिति से निपटने और उनकी घटती हुई आय को संभालने के लिए गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और याहू जैसी कंपनियों के साथ सहयोग करना चाहिए.

इस सम्मेलन में 87 देशों के लगभग 900 प्रतिनिधियों, संपादकों, प्रकाशकों और पत्रकारों ने भाग लिया.

वर्ल्ड एसोशिएशन ऑफ़ न्यूज़पेपर्स एंड पब्लिशर्स की 62वीं और वर्ल्ड एडिटर्स फ़ोरम की 16वीं कॉंफ़्रेंस में शुरू से आख़िर तक यही सवाल छाया रहा कि इंटरनेट और न्यूज़ पोर्टल्स के कारण कमज़ोर पड़ते हुए समाचारपत्रों को कैसे संभाला जाए.

इसमें दुनिया के कई बड़े समाचारपत्रों के संपादक और प्रमुख अधिकारियों ने भाग लिया.

कॉंफ़्रेंस के आख़िरी दिन गुरूवार को पहले सत्र में इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया गया कि अगर समाचारपत्रों को अपने आप को ज़िंदा रखना है और मज़बूत बनाना है तो उन्हें पाठकों का विश्वास और दिल जीतने के लिए अपने आप में लगातार नयापन लाना पड़ेगा और टेक्नॉलोजी का बेहतर प्रयोग करना पड़ेगा.

दूसरे सत्र में गूगल जैसे सर्च इंजनों से समाचारपत्रों को मिलने वाली चुनौती पर चर्चा की गई. इस सत्र में गूगल कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उनकी कंपनी समाचारपत्रों की मदद के लिए उनके साथ बातचीत के लिए तैयार है.

गूगल का क्या करें

गूगल का हम क्या करें? इस विषय पर एक अन्य सत्र में जहाँ समाचारपत्रों के संपादकों और प्रकाशकों ने ये शिकायत की कि गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और याहू जैसी इंटरनेट कंपनियाँ समाचारपत्रों की रिपोर्टें अपने वेबसाइट के ज़रिये पाठकों को उपलब्ध कराकर कॉपी राइट क़ानून का उल्लंघन कर रही हैं और समाचारपत्रों का नुक़सान कर रही हैं, वहीँ गूगल ने इसका खंडन क्या.

गूगल कंपनी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डेविड ड्रमंड ने माना कि समाचारपत्रों का घटता हुआ प्रसार और घटती हुई आमदनी चिंता का कारण है और इससे निपटने के लिए गूगल समाचारपत्रों के मालिकों और उनके संगठनों के साथ मिल कर काम करने पर तैयार है.

लेकिन उन्होंने इस बात का खंडन किया कि समाचार पत्रों में छपने वाली सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध करवाकर गूगल बहुत पैसा कमा रही है.

दूसरी और "इंडेपेंडेट न्यूज़ एंड मीडिया" के सीईओ गेविन ओ रैली ने गूगल पर कॉपीराइट क़ानून के उल्लंघन का आरोप लगते हुए कहा कि ऐसे उपकरण बनाने चाहिए जिससे गूगल जैसी कंपनियाँ इस तरह की हरकत जारी न रख सके और इससे होने वाली आमदनी का एक बड़ा हिस्सा उन समाचारपत्रों को मिलना चाहिए जिन्होंने इस सामग्री की तैयारी पर बहुत पैसे ख़र्च किए हैं.

उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल गूगल की नहीं है बल्कि उन सब कंपनियों की है जो समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाली सामग्री को एक जगह करके उन्हें पाठकों को मुफ़्त उपलब्ध करवाते हैं.

नए पन की ओर

इनोवेशन इंटरनेशनल मीडिया कॉंसल्टिंग ग्रुप के उपाध्यक्ष जॉन सिनोर ने समाचारपत्रों में नए पन लाने के प्रयासों पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि वह पत्रकारिता और समाचारपत्रों के भविष्य को लेकर परेशान नहीं है बल्कि उन्हें समाचारपत्रों में छपने वाली सामग्री पर ज़्यादा चिंता है क्योंकि वह पिटे हुए समाचार ऐसे घिसे-पिटे अंदाज़ में छापते हैं जो कम ही लोग पढ़ना चाहेंगे.

उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि माइकल जैक्सन की मौत के छत्तीस घंटों बाद भी विश्व के बड़े-बड़े अख़बारों ने पहले पन्ने पर यह सुर्ख़ी लगाई, "पॉप के शाहंशाह की मौत".

सिनोर ने कहा कि सिर्फ़ एक बड़े अख़बार ने चौंकाने वाली और दिलचस्प सुर्ख़ी लगाई, " माइकल जैक्सन की मौत तो 20 साल पहले ही हो गई थी, अब तो वह केवल एक खोखला शरीर थे."

Image caption गूगल पर कॉपी राइट्स क़ानून के उल्लंघन का आरोप लगता रहा है

सिनोर ने कहा,'' अपनी सामग्री की क्वालिटी को बेहतर बनाकर, उसमें नयापन लाकर और पाठकों का विश्वास जीत कर ही समाचारपत्र, दूसरे माध्यमों से मुक़ाबला जीत सकते हैं.''

उन्होंने कहा कि लोग अब समाचार के लिए अख़बार नहीं पढ़ते बल्कि वह घटनाओं को समझने और उनके विश्लेषण के लिए पढ़ते हैं. उन्होंने कहा कि "कोई यह नहीं जानना चाहता कि कल क्या हुआ था. वह यह जानना चाहते हैं की आने वाले कल क्या होने वाला है".

उन्होंने नया अंदाज़ अपनाने वाले कुछ समाचार पत्रों की सफलता की मिसाल देते हुए कहा कि एक पुर्तगाली पेपर 'आई' है जो इसी साल शुरू हुआ और वहां के बड़े समाचार पत्रों में शामिल हो गया.

सिनोर ने कहा, " समाचारपत्र उसी समय सफल होंगे जब वह किसी नई कहानी को अलग और दिलचस्प अंदाज़ में सुनाएंगे. लोगों को ऐसी पत्रकारिता नहीं चाहिए जो केवल समस्याओं की बात करे बल्कि उन्हें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो उन के समाधान के रास्ते बताए."

इंटरनेट साइट्स और मोबाइल फोन को समाचार जानने का आम साधन बताते हुए उन्होंने कहा की समाचारपत्र बड़े ख़ास लोगों का माध्यम बन रहे हैं जो उनके लिए ज़्यादा क़ीमत दे सकते हैं.

सिनोर ने कहा कि गत पचास वर्षों में समाचारपत्रों की सबसे बड़ी भूल ये रही कि उन्होंने अपने मूल्य को हद से ज़्यादा कम कर दिया.

उनका कहना था," अब समाचारपत्रों को अपनी क़ीमत बढ़ानी होगा और ऐसी सामग्री देनी होगी जिसके लिए लोग ज़्यादा क़ीमत देने पर तैयार हों, चाहे इस के कारण सर्कुलेशन कम ही क्यों न हो."

सिनोर ने सुझाव दिया की समाचारपत्रों को अपना डिज़ाइन, अपने काम करने के ढंग में बदलाव लाना होगा और अपनी आमदनी के नए रास्ते तलाश करने पड़ेंगे.

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