अब मकोका पर छिड़ी बहस

अनवर
Image caption अनवर को संतोष है कि उन्हें अदालत से न्याय तो मिला

अनवर गुलज़ार आज़मी इमारतों को बनाने वाली एक कंपनी में काम करते हैं और उनके बड़े भाई अबरार अतर बनाने की एक फ़ैक्टरी में.

दोनों अपने परिवार के साथ अलग मोहल्लों में छोटे से कमरे में रहते हैं. उनका ख़ून का रिश्ता तो है ही साथ ही वे ग़रीबी और मुफ़लिसी के रिश्ते से भी बंधे हैं.

दोनों भाइयों को एक और चीज़ जोड़ती है और वो है दोनों की पौने तीन साल जेल में गुज़ार कर वापस समाज में बसने की कोशिश.

दरअसल, 10 फ़रवरी 2005 को उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई जब पुलिस ने एक पड़ोसी को धमकाने के आरोप में उन्हें महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण क़ानून यानी मकोका के तहत गिरफ्तार कर लिया.

अनवर कहते हैं, "हमारे ख़िलाफ़ झूठा आरोप था इसीलिए हमने समझा कि हम दो-एक दिन में छोड़ दिए जाएँगे, लेकिन उसके बाद जो हुआ उसने हमारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी."

दो-एक दिन पौने तीन साल में बदल गए और जब अनवर और अबरार जेल से बाहर आए तो अबरार की तीसरी संतान ढाई साल की हो चुकी थी.

मकोका का दुरुपयोग

दोनों भाइयों को अदालत ने न सिर्फ़ धमकी के आरोप से बरी कर दिया बल्कि मकोका के दुरुपयोग पर पुलिस को फटकार भी लगाई.

अनवर को अपने जीवन के पौने तीन साल खोने का ग़म और ग़ुस्सा नहीं है. वो इस बात से संतुष्ट हैं कि अदालत ने उनके साथ इंसाफ किया और दोनों भाइयों पर लगे मकोका को ख़ारिज़ कर दिया.

आज़मी बंधुओं के ख़िलाफ़ मकोका के दुरुपयोग का मामला अनोखा नहीं है.

महाराष्ट्र पुलिस पर मकोका के ग़लत इस्तेमाल के आरोप अक्सर लगाए जाते रहे हैं. बीबीसी ने मुंबई में कई ऐसे लोगों से मुलाक़ात की जो मकोका की वजह से कई साल जेल में रहे और बाद में उन्हें अदालत ने रिहा कर दिया.

एक व्यक्ति ने नौ साल जेल में गुज़ारे, लेकिन ये सभी लोग इतना डरे हुए थे कि उन्होंने बीबीसी से ऑन रिकॉर्ड बात नहीं की.

अब से 10-15 साल पहले मुंबई संगठित अपराध का अड्डा माना जाता था. यहाँ अंडरवर्ल्ड की एक अलग दुनिया थी जहाँ तस्करी, शूटआउट और हफ़्तावसूली आम बात थी और जनता अपराध से तंग आ चुकी थी. लेकिन अब हालात बदल गए हैं.

मकोका के अब 10 साल पूरे हो गए हैं. यह विशेष क़ानून शुरुआत में मुंबई में संगठित अपराध रोकने और तस्करी को ख़त्म करने के लिए लागू किया गया था, लेकिन बाद में इसे आतंकवाद के अभियुक्तों के ख़िलाफ़ भी इस्तेमाल किया जाने लगा.

उदाहरण के तौर पर मालेगांव बम धमाके के अभियुक्त दयानंद पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा और कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित सहित सात और लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस ने मकोका लगाया था लेकिन बाद में अदालत ने इसे ख़ारिज़ कर दिया.

पुलिस इस फैसले के ख़िलाफ़ अब बॉम्बे हाईकोर्ट गई है.

बहस

Image caption अबरार को भी मकोका के तहत पौने तीन साल जेल में गुजारने पड़े थे

यह अलग बहस का मुद्दा है कि उनके ख़िलाफ़ मकोका लगाना उचित था या नहीं. मुद्दा यह है कि टाडा और पोटा जैसे क़ानूनों की तरह अब मकोका के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठने लगी है.

पुलिस पर मकोका के ग़लत इस्तेमाल का आरोप लग रहा है. तो क्या टाडा और पोटा की तरह मकोका के दिन भी पूरे हो सकते हैं?

मकोका को ख़त्म करने की चर्चा आम होती जा रही है. आखिर इस क़ानून में कौन से ऐसे प्रावधान हैं जिनके कारण इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जा रही है?

आज़मी बंधुओं के वकील शहीद आज़मी इसका जवाब यूँ देते हैं: "मकोका में ज़मानत जल्दी नहीं मिलती. अभियुक्तों को पुलिस 30 दिन तक हिरासत में रख सकती है और आरोप पत्र 180 दिन में दाखिल किया जा सकता है, जबकि आम क़ानून में इसकी मोहलत 90 दिन है."

मानवाधिकार से जुड़े लोगों का कहना है कि इस क़ानून ने एक बेगुनाह आदमी का मौलिक अधिकार उससे छीन लिया है. संविधान विशेषज्ञ मजीद मेमन कहते हैं कि इस क़ानून का इस्तेमाल सही तरह से नहीं हो रहा है इसलिए इसे हटा देना चाहिए.

मेमन कहते हैं, "देखिए इस क़ानून से मुंबई में अपराध बहुत कम हुआ है ख़ास तौर पर संगठित अपराध. इस पर किसी को शक नहीं है. चिंता केवल इस बात की है कि इसका इस्तेमाल बेगुनाहों के ख़िलाफ़ हो सकता है."

अपराध कम

लेकिन इस क़ानून के पक्ष में बोलने वालों का मानना है कि इस क़ानून को लागू किए जाने के बाद मुंबई में अंडरवर्ल्ड का सफाया हो गया है. जाने-माने वक़ील एमवी किनी के अनुसार यह क़ानून बहुत सफल है और इसे हटाना सही नहीं होगा.

वो कहते हैं, "जिनके ख़िलाफ़ यह कानून ग़लत तौर पर लागू किया गया वो अदालत जा सकते हैं, लेकिन अपराध और आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए यह एक असरदार क़ानून है."

आज़मी भाइयों के वक़ील शाहिद आज़मी का तर्क है कि इस क़ानून से लाभ कम और नुक़सान ज़्यादा हो रहा है. उनका कहना है कि 1999 से अब तक इस क़ानून के तहत 200 लोगों के मुकदमें अदालत में लाए जा चुके हैं, लेकिन सज़ा केवल 30 प्रतिशत लोगों को ही दी गई है.

उधर, मुंबई में आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख केपी रघुवंशी इस कानून के ग़लत इस्तेमाल के इल्ज़ाम को सहीं नहीं मानते और कहते हैं कि इस क़ानून के अंतर्गत सज़ा मिलने का प्रतिशत क़रीब 65 हैं.

शायद इसीलिए अब दिल्ली और गुजरात की सरकारें भी इस तरह का क़ानून बनाने की कोशिश में हैं.

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