ग्लेशियर के बारे में शोध का अभाव

हिमालय
Image caption कई अध्ययन बताते हैं कि अनेक ग्लेशियर पिघल रहे हैं या सिकुड़ रहे हैं.

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ग्लेशियरों की सही स्थिति को बताने के लिए शोध और आंकड़ों का अभाव है.

देश के जाने माने ग्लेशियर मामलों के जानकार डॉक्टर इक़बाल हसनैन ज़ोर देकर कहते हैं कि अभी तक हमारे पास कोई आंकड़े मौजूद नहीं हैं जिससे यह पता चल सके कि ग्लेशियर कब और कैसे पिघल सकते हैं या नहीं.

टाटा एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) से जुड़े हसनैन कहते हैं, "ग्लेशियरों का 10 वर्षों तक अध्ययन करने की ज़रूरत है. उपग्रहों से जो ग्लेशियरों की तस्वीर मिली है और हमारे पास जो आंकड़े मौजूद हैं उनकी तुलना की जानी चाहिए."

वे कहते हैं कि अब तक जो शोध किए गए हैं उनमें महज छह महीने से एक साल के अध्ययन को आधार बनाया गया है.

डॉक्टर इक़बाल हसनैन और पर्वातारोही कमांडर सत्यव्रत डैम के साथ मैंने पश्चिमी हिमालय की यात्रा की.

इस यात्रा का उद्देश्य ऐसे ग्लेशियर की खोज करना था जिसका इस्तेमाल ग्लेशियर के अध्ययन के लिए लंबे समय तक किया जा सके.

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से लद्दाख की इस पंद्रह दिनों की यात्रा में हम 15 हज़ार मीटर की ऊँचाई पर स्थित ड्रूंगडोरोंग ग्लेशियर तक पहुँचे.

डॉक्टर हसनैन का कहना था कि ड्रूंगडोरोंग ग्लेशियर को गेलेशियरों के अध्ययन के लिए चुना जा सकता है. उन्होंने बताया कि वे अगले वर्ष यहाँ आकर इस ग्लेशियर पर यंत्र स्थापित करेंगे.

ड्रूंगडोरोंग ग्लेशियर की यात्रा

डॉक्टर हसनैन ने पिछले एक वर्ष के दौरान कश्मीर इलाक़े में मौजूद कोलाहाय ग्लेशियर और सिक्कम में मौजूद राथोंग ग्लेशियर के बारे में आंकड़े इकट्ठे करने के लिए इन ग्लेशियरों में यंत्र स्थापित किया है. यह यंत्र पूरे साल ग्लेशियर से संबंधित आंकड़े इकट्ठा करता है. इन आंकड़ों का इस्तेमाल ग्लेशियरों की स्थिति के बारे में पता लगाने में किया जाएगा.

हमने अपनी यात्रा के दौरान कई ग्लेशियरों को पार किया. जब हम नूनकून ग्लेशियर के नज़दीक थे तब कमांडर डैम ने कहा, "मैं पिछले वर्ष जुलाई में यहाँ आया था तबसे ग्लेशियर का मुहाना और पीछे चला गया है."

कश्मीर विश्वविद्यालय के भूगर्भ विभाग के रहीम शाह ने बताया कि 10 वर्ष पहले ग्लेशियर से बनने वाली नदी दिखाई नहीं पड़ती थी लेकिन अब इसे देखा जा सकता है.

कमांडर डैम का कहना था कि उन्हें पता नहीं कि इसे क्या कहें लेकिन एक पर्वतारोही के रूप में उन्होंने जलवायु परिवर्तन का प्रभाव ग्लेशियर और पहाड़ों पर पड़ते हुए देखा है.

भारत, पाकिस्तान, नेपाल, चीन और भूटान में हिमालय के इर्द-गिर्द क़रीब 15 हज़ार ग्लेशियर हैं.

कई अध्ययन बताते हैं कि अनेक ग्लेशियर पिघल रहे हैं या सिकुड़ रहे हैं जिससे ऊँचाई पर झीलों का निर्माण हो रहा है.

इन पहाड़ों के आस-पास रहने वाले समुदायों के लिए ख़तरा पैदा हो गया है. तीन हज़ार मीटर से ज़्यादा की ऊँचाई पर रहने वाले समुदायों के लिए पानी की कमी हो गई है.

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