दोतरफ़ा पिस रहे हैं छात्रः मानवाधिकार संस्था

झारखंड का एक स्कूल
Image caption झारखंड की एक कक्षा का हाल जहाँ डेस्क और कुर्सियों की जगह सुरक्षा बल के इस्तेमाल का सामान मौजूद है

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्मूमैनराइट्स वॉच ने एक रिपोर्ट में कहा है कि माओवादी विद्रोहियों और सरकारी बलों के बीच निरंतर जारी संघर्ष भारत में हाशिए पर रह रहे लाखों बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है.

बिहार और झारखंड के 22 स्कूलों में जा कर 130 से अधिक व्यक्तियों से बातचीत पर आधारित इस रिपोर्ट को 'स्कूली शिक्षा में विघ्नः भारत के बिहार और झारखंड राज्यों में स्कूलों पर नक्सली आक्रमण और पुलिस का कब्ज़ा' नाम दिया गया है.

रांची में जारी की गई इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि कैसे भारत के कई हिस्सों में लंबे समय से जारी सशस्त्र आंदोलन के तहत माओवादी सरकारी स्कूलों को निशाना बना रहे हैं और उन्हें विस्फोट से उड़ा रहे हैं.

सुरक्षाबलों का क़ब्ज़ा

इसके साथ ही पुलिस और अर्धसैनिक बल नक्सल-विरोधी अभियानों के लिए स्कूलों पर लंबे समय तक कब्ज़ा कर के शिक्षा में बाधा डाल रहे हैं. ह्यूमैनराइट्स वॉच के बाल अधिकार विभाग में शोधकर्ता और इस रिपोर्ट के लेखक बीड शेपर्ड का कहना है, "माओवादी कहते हैं कि वे भारत के गरीबों के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन स्कूलों पर उनके हमले बच्चों को उस शिक्षा से वंचित कर रहे हैं जिसकी उनको बेहद ज़रूरत है. इसके साथ ही, स्कूलों पर लंबे समय तक पुलिस के कब्ज़े के कारण ख़तरे और सदमे के वातावरण में रह रहे इन बच्चों को कक्षाओं से दूर रहना पड़ता है और वे भय के साए में रहने पर विवश हो जाते हैं."

ह्यूमैनराइट्स वॉच के अनुसरा बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के ये स्कूल सरल लक्ष्य होते हैं और इन पर हमला करने से मीडिया का ध्यान इस ओर जाता है और स्थानीय समुदायों में भय और आंतक का माहौल पैदा होता है.

झारखंड के एक 16 वर्षीय छात्र ने ह्मूमैनराइट्स वॉच को बताया,"स्कूल बुरी तरह बर्बाद हो चुका है…पूरी इमारत नष्ट हो गई है, खिड़कियाँ टूट गई हैं और उड़ चुकी हैं, फ़र्श पर दरारें पड़ गई हैं तथा दीवारों और छत पर भी. दरवाज़ा तक टूट गया है. बाहर की दीवार जो बरामदे से जोड़ती है वह भी नष्ट हो गई है, सब कुछ खंडहर बन गया है."

सरकारी सुरक्षा बल-पुलिस और अर्धसैनिक पुलिस दोनों ही- नक्सलवाद विरोधी अभियानों के लिए स्कूलों की इमारतों का अधिग्रहण कर लेते हैं जो कि कभी-कभी तो कुछ दिनों के लिए ही होता है लेकिन प्रायः कई महीने या कई वर्ष भी जारी रहता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलवादी आक्रमण और स्कूलों पर सुरक्षा बलों के कब्ज़े से छात्रों को अनावश्यक रूप से नुकसान उठाना पड़ता है और कभी-कभी वे या तो स्कूल छोड़ देते हैं या उनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ जाता है.

रिपोर्ट के अनुसार स्कूल की इमारत के कुछ हिस्से पर सुरक्षा बलों के कब्ज़े से परेशानी का अनुभव कर चुकी या इसकी आशंका से ग्रस्त लड़कियाँ विशेष रूप से स्कूल छोड़ती देखी गई हैं. स्कूल के अहाते में जब सुरक्षा बल के लोग संदिग्ध लोगों की पिटाई करते हैं तो उसे देख कर छात्रों में दहशत पैदा होती भी देखी गई है. शेपर्ड का कहना है, "भारत में अत्यधिक गरीबी में या हाशिए पर रह रहे बच्चों की शिक्षा तक पहुँच भारत के विकास का एक ज़रूरी अंग है. इन क्षेत्रों में जहाँ संघर्ष जारी है, बच्चे वर्षों से इस अधिकार से वंचित हैं."

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नक्सलवादी नेता अपने लड़ाकों को निर्देश दें कि वे स्कूलों पर हमले तुरंत बंद करें. इसके अलावा सरकार को भी स्कूलों के सैन्य इस्तेमाल की अपनी प्रथा पर पुनर्विचार करना चाहिए जिसके कारण छात्रों की शिक्षा प्रभावित होती है और नक्सलवादी इसका फ़ायदा उठाते हैं.”

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