तेलंगाना को लेकर राजनीतिक उथल-पुथल

हैदराबाद में जश्न
Image caption तेलंगाना समर्थक बुधवार को रात से ही जश्न मना रहे हैं

आंध्र प्रदेश को विभाजित करके अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने की केंद्र सरकार की घोषणा से राज्य में राजनीतिक उथल पुथल मच गई है.

एक ओर तेलंगाना के लोगों और नेताओं का जश्न रुक नहीं रहा है और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता चंद्रशेखर राव हीरो बन गए हैं.

लेकिन दूसरी ओर तटीय आंध्र प्रदेश और रायलसीमा के राजनीतिज्ञों में खलबली मच गई है और राज्य के गठन का विरोध करते हुए सभी दलों के कम से कम 93 विधायकों और दो सांसदों ने इस्तीफ़े दे दिए हैं.

विधायकों के इस्तीफ़े विधानसभा स्पीकर के पास भेजे गए हैं और उन्होंने कहा है कि वे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सभी विधायकों से व्यक्तिगत रुप से चर्चा करने के बाद ही इस्तीफ़ों के बारे में कोई फ़ैसला करेंगे.

इस बीच आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने के मसले पर वह पीछे हटने वाली नहीं है, हालांकि यह घोषणा अभी भी नहीं की गई है कि विधानसभा में राज्य के गठन के संबंध में प्रस्ताव कब पेश किया जाएगा.

इस्तीफ़े

बुधवार को आधी रात को केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की घोषणा का जो जश्न शुरु हुआ था वह गुरुवार को दिन भर भी जारी रहा.

टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव ने 11 दिन का आमरण अनशन बुधवार की रात ही ख़त्म कर दिया था.

उन्होंने केंद्र सरकार की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा था कि यह तेलंगाना के लोगों के लिए 50 वर्षों का सपना पूरा होने की तरह है.

लेकिन तटीय आंध्र प्रदेश और रायलसीमा के राजनीतिज्ञों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

Image caption चंद्रशेखर राव की हालत आमरण अनशन की वजह से गंभीर हो गई थी

नाराज़गी ज़ाहिर करने वालों में सत्ताधारी कांग्रेस, मुख्य विपक्षी दल तेलुगु देशम पार्टी और पिछले साल गठित प्रजा राज्यम पार्टी के नेता शामिल हैं.

अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए इन सभी दलों के 93 विधायकों ने विधानसभा के स्पीकर को अपने इस्तीफ़े भेज दिए हैं.

इस्तीफ़ा देने वालों में सबसे अधिक 53 विधायक कांग्रेस के हैं. जबकि तेलुगु देशम पार्टी के 29 और प्रजा राज्यम पार्टी के 11 विधायकों ने अपने इस्तीफ़े भेजें हैं.

इसके अलावा कांग्रेस के दो सांसदों- एल राजगोपाल (विजयवाड़ा) और वेंकट रामरेड्डी (अनंतपुर) ने भी इस्तीफ़ा दिया है.

राज्य विधानसभा में कुल 294 विधायक हैं जिनमें से 155 कांग्रेस के हैं. इसका मतलब यह है कि यदि दस विधायक भी सचमुच इस्तीफ़ा दे देते हैं तो राज्य की कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ जाएगी और ऐसे में एक नया राजनीतिक संकट पैदा हो जाएगा.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने राज्य में मंत्रिमंडल की बैठक का हवाला देते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री के रोसैया ने मंत्रियों से कहा है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के विधायकों से कहें कि वे अपना इस्तीफ़ा वापस ले लें.

इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आंध्र के कांग्रेस सांसदों की एक बैठक बुलाकर उनसे चर्चा की है.

उधर प्रजा राज्यम पार्टी के नेता चिरंजीवी ने भी अपने विधायकों से इस्तीफ़ा वापस लेने की अपील की है.

तेलुगु देशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू पहले तेलंगाना राज्य का समर्थन कर चुके थे लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार की घोषणा को एकतरफ़ा घोषणा बताते हुए कहा है कि इस घोषणा से पहले सभी दलों से चर्चा की जानी चाहिए थी.

हालांकि उन्होंने कहा है कि वे अभी भी विधानसभा में राज्य गठन के प्रस्ताव का समर्थन करेंगे, लेकिन यह चर्चा होनी चाहिए कि इसका स्वरुप क्या होगा.

वैसे को भारतीय जनता पार्टी ने तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने के फ़ैसले का स्वागत किया है लेकिन पार्टी के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने संसद सत्र के दौरान आधी रात को पत्रकारों से सामने घोषणा किए जाने को लेकर आपत्ति जताई है.

इस्तीफ़ों पर फ़ैसला

विधायकों के इस्तीफ़े पर स्पीकर एन किरण कुमार रेड्डी ने कहा है कि वे नियमानुसार हर विधायक से अलग-अलग चर्चा के बाद ही यह फ़ैसला करेंगे कि उन्हें स्वीकार करना है या नहीं.

उन्होंने बताया कि तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरु करने के केंद्र के फ़ैसले के विरोध में विधायकों ने अलग-अलग तरह से इस्तीफ़े उन्हें भेजे हैं.

उनका कहना था कि इनमें से कुछ इस्तीफ़े व्यक्तिगत तौर पर उनके पास पहुँचे हैं और कुछ फ़ैक्स के ज़रिए.

स्पीकर के अनुसार कुछ इस्तीफ़े हाथ से लिखे हुए हैं और कुछ टाइप किए हुए हैं.

उन्होंने कहा है कि नियमानुसार इन इस्तीफ़ों पर फ़ैसला करने के लिए उन पर समय सीमा का कोई दबाव नहीं है.

हैदराबाद का सवाल

तेलंगाना राज्य के गठन में एक बड़ा सवाल हैदराबाद का है और इसे लेकर बहस शुरु हो चुकी है.

हैदराबाद आंध्र प्रदेश की राजधानी है और जिसे तेलंगाना क्षेत्र कहा जाता है, उसमें हैदराबाद ज़िला भी आता है.

तेलंगाना के नेता कह रहे हैं कि वे हैदराबाद के बिना तेलंगाना राज्य स्वीकार नहीं करेंगे और दूसरी और शेष आंध्र प्रदेश के नेता भी हैदराबाद को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है.

ऐसे में राज्य सरकार और बाद में केंद्र सरकार के लिए यह एक चुनौती होगी कि वह राज्य के गठन के समय हैदराबाद को लेकर क्या फ़ैसला करती है और इसके लिए सर्वसम्मति किस तरह बनाती है.

वैसे एक प्रस्ताव यह भी है कि हैदराबाद को दोनों राज्यों की साझा राजधानी बना दिया जाए.

या फिर हैदराबाद को चंडीगढ़ की तरह केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाए.

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