'वादों से पलटी नीतीश सरकार'

बिहार में समान स्कूल प्रणाली आयोग की सिफ़ारिशें अब नीतीश सरकार के तिरस्कार की शिकार हो रही हैं. आयोग का गठन राज्य सरकार ने ही किया था.

यह बात आयोग के अध्यक्ष और भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे खुद स्वीकार करते हैं. उन्होंने बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में सरकारी मंशा पर कई तल्ख़ टिप्पणियां कीं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विशेष आग्रह पर प्रोफ़ेसर दूबे ने इस आयोग की अध्यक्षता कबूल की थी.

आयोग के दो अन्य सदस्यों में से एक थे जाने माने शिक्षाशास्त्री डॉक्टर अनिल सदगोपाल और दूसरे सदस्य थे बिहार सरकार के तत्कालीन शिक्षा सचिव(अब दिवंगत) डॉ. मदनमोहन झा.

इन तीनों ने मिलकर नौ महीने के कठिन बौद्धिक परिश्रम के बाद जो सिफारिशें नीतीश सरकार के सामने रखीं, उन्हें अब सरकार अव्यावहारिक बताकर टाल रही है.

बिहार सरकार के इसी रवैये पर बेहद क्षुब्ध लग रहे प्रो. दूबे ने यहाँ तक कह डाला कि अब लगता है नीतीश कुमार किसी दबाव में अपने वायदे और विचार से पूरी तरह पलट गये हैं.

बिहार की बदहाल स्कूली शिक्षा- व्यवस्था में सुधार के लिए तीन साल पहले इस 'समान स्कूल प्रणाली आयोग' का गठन किया गया था.

नौ महीने की समय सीमा के भीतर आयोग ने अपनी सिफारिशें राज्य सरकार को सौंप दीं.

अब इस आयोग के अध्यक्ष प्रो.दूबे कहते हैं, "अगर ये सिफ़ारिशें नीतीश सरकार मान लेती तो इस राज्य में फल -फूल रहे शिक्षा –माफिया पर अंकुश लग जाता और ग़रीब अमीर सब के लिए एक समान शिक्षा जैसे क्रन्तिकारी बदलाव की दिशा में एक मील का पत्थर लग जाता."

प्रो.मुचकुंद दूबे ने खुलकर कहा है कि राजनीतिक नेतृत्व सिर्फ़ जनता को बहलाने-फुसलाने के लिए आयोग गठित कर देता है लेकिन अपने स्वार्थ के अनुकूल सिफारिशें नहीं पाकर आयोग को तिलांजलि दे देता है.

वामपंथी दल ' भाकपा-माले' ने बिहार में इसे सत्ता के खिलाफ जन-प्रतिरोध का मुद्दा बनाया है.

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