दार्जिलिंग में बंद का व्यापक असर

दार्जीलिंग
Image caption दार्जीलिंग के कई चाय बगानों पर भी असर पड़ा है

दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर शुरू हुए चार दिन के बंद की वजह से आम जनजीवन पर काफ़ी असर पड़ा है.

ये बंद सोमवार सुबह छह बजे से शुरू हुआ है. अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर सैकड़ों गोरखा अनिश्चिकालीन भूख हड़ताल पर हैं.

दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाक़े से कोई भी बस सेवा नहीं जा रही है. दूकानें और बाज़ार बंद हैं. सरकारी दफ़्तरों में भी उपस्थिति न के बराबर है. चाय बगान वाले क्षेत्रों में भी बंद का असर पड़ा है.

पिछले दिनों आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की केंद्र सरकार की घोषणा के बाद गोरखालैंड की मांग ने एक बार फिर ज़ोर पकड़ लिया है.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख बिमल गुरुंग ने कहा, "अलग राज्य की हमारी मांग तेलंगाना से भी पुरानी है. ये हमारी आख़िरी लड़ाई है और हमें गोरखालैंड हासिल करना है. हम पश्चिम बंगाल में नहीं रह सकते क्योंकि हम अलग हैं."

भारत सरकार ने 21 दिसंबर को त्रिपक्षीय बैठक बुलाई है. इसमें केंद्र और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों के अलावा गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लोग भी शामिल होने का न्यौता दिया गया है.

लेकिन बिमल गुरुंग ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस बैठक का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने कहा, "हम पश्चिम बंगाल सरकार के साथ अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहते क्योंकि वे अलग राज्य का विरोध करते हैं जबकि हम अलग राज्य पर ही चर्चा करना चाहते हैं."

मांग

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पश्चिम बंगाल के हैं और उन्होंने पहले ही ये स्पष्ट कर दिया है कि अलग गोरखा राज्य संभव नहीं है.

लेकिन बिमल गुरुंग का कहना है कि यह प्रणब मुखर्जी का निजी विचार है और वे यह जानना चाहते हैं कि इस मामले पर केंद्र सरकार क्या सोचती है.

उन्होंने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि अगर अलग गोरखालैंड की मांग पर उसने सहानुभूति पूर्वक विचार नहीं किया तो उनका संगठन इसकी गारंटी नहीं ले सकता कि इलाक़े में मुश्किलें पेश नहीं आएँगी.

गुरुंग ने कहा, "हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण आंदोलन है, जो गांधी जी के आंदोलन की तरह है. यह भूख हड़ताल और आम हड़ताल तक सीमित है. लेकिन हमें अलग राज्य नहीं मिला तो जनता भड़क सकती है."

दार्जिलिंग के गोरखा 1980 के दशक से अलग राज्य के लिए आंदोलन चला रहे हैं. बाद में यह मामला ज़्यादा स्वायत्तता पर टल गया.

लेकिन अब उनके नेता ये कह रहे हैं कि स्वायत्तता समझौता नहीं चला. वे इसके लिए पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

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