ख़ामियों से भरा चुनावी गणित

मोहन भागवत और आडवाणी
Image caption भाजपा को इसके विरोधाभास ही डुबो रहे हैं

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का कहना था कि राजनीति विरोधाभासों को संभालने की कला है. उन्होंने अपने अनुभवों से आधार पर ही यह बात कही होगी, पर निश्चित रुप से उन्हें भारतीय जनता पार्टी के कामकाज से भी अपना मत बनाने में मदद मिली होगी.

असल में भाजपा अपने जन्म से अभी तक विरोधाभासों के बीच ही चली है और जबतक अटल बिहारी वाजपेयी जैसा उस्ताद विरोधाभासों को संभालने के लिए उपलब्ध था पार्टी फली-फूली. आज विरोधाभास ही इसे डुबो रहे हैं.

भाजपा के लिए सबसे बड़ा विरोधाभास उसकी निष्ठा में ही है. वो एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी संघ के प्रति निष्ठावान रहे या लोकतांत्रिक राजनीति अपनाने के चलते अपने समाज और वोटर समूह के लिए, यह दुविधा उसके लिए आज भी बनी हुई है और इसी चलते उसके नए नेता कभी जिन्ना को सेकुलर बनाने की दौड़ करते हैं तो कभी संघ के आगे शीश नमन करने में.

अभी भी उसका अध्यक्ष और सबसे प्रभावी महामंत्री संघ ही चुनता है.

दुविधा का नतीजा

और इस दुविधा का नतीजा है कि जब भाजपा चुनाव मैदान में उतरती है तो उसको लगभग तीन चौथाई वोटों में ही 50 प्रतिशत पाने की लगभग आक्रामक लडा़ई लड़नी होती है.

मुल्क में अल्पसंख्यक तो उसे हराने की एक मात्र रणनीति से ही वोट देते हैं, दलित-आदिवासी और पिछड़े मतदाताओं का लगभग पूरा हिस्सा भी उससे दूर रहता है. इतने सारे समूह आप से पहले ही दूर हों तब चुनावी मुक़ाबला जीतने की गुंजाइश अंतत समाप्त सी हो जाती है.

देश में पिछडे वर्गों का कितना वोट है उसे लेकर थोड़ा असमंसज है, लेकिन वे किसी भी सूरत में एक तिहाई से ज़्यादा हैं.

इस समूह का भी ज़्यादातर हिस्सा कट्टर लाइन लेने और कड़े आक्रामक नेतृत्व वाले संघ से नज़दीकी रखने के कारण भाजपा से कटा रहता है.

अगर कही लोध, कुर्मी, यादव और बंजारा जैसी जातियों का थोड़ा समर्थन बनता दिखता भी है तो उनके नेताओं को दरकिनार करने में वह सोशल इंजीनियरिंग भी ज़्यादा नहीं चला पाती.

प्रभाष जोशी का यह सूत्र था कि भाजपा पुणे-महाराष्ट्र की चितपावन कट्टरता और पंजाबी हिंदू की अल्पसंख्यक मानसिकता का प्रतिफलन है, पर मुल्क न तो इतना कट्टरपंथी स्वभाव का है न ही ऐसी मानसिकता का.

संघ का भ्रम

Image caption राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी जैसे क़द्दावर नेता की कमी है

इन बातों में तब ज़्यादा दम दिखता है जब भाजपा पूरे पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, अधिकांश दक्षिण भारत से नदारद दिखती है. उसके लिए माँसाहारी पूर्वोंचली लोगों को हिंदू मानना ही कठिन है. संघ के किसी भी आयोजन में सामिष भोजन नहीं परोसा जाता.

और बड़ी मुश्किल यह है कि भाजपा के कार्यकर्ता इन सीमाओं को जानकर भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपा कर समस्या के टल जाने की उम्मीद करते हैं.

अगर कभी लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह इन सामान्य सीमाओं को सांकेतिक रुप से तोड़ना चाहते भी हैं तो एकदम उल्टा क़दम उठाते हैं या कमज़ोर आधार वाले राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी जैसे लोग संघ की गोद में बैठना ही ज़्यादा सुरक्षित मानते हैं.

जबतक भाजपा के नेता मुल्क के स्वभाव और चुनावी राजनीति की अनिवार्यताओं के अनुरुप उसके अंदर बदलाव नहीं करते तबतक उसका अंतर बढ़ता ही जाएगा.

गाँधी को गरियाना और उसे प्रात स्मरणीय बताना, धर्मनिरपेक्षता का उपहास उड़ाना और उसकी शपथ खाना, राम का नाम लेना और कायरों का काम करना जब तक चलता रहेगा, भाजपा का उद्धार संभव नहीं है.

भाजपा को स्पष्ट करना होगा कि वो कहाँ खडी़ है और कहाँ जाना चाहती है.

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