मॉनसून की दगाबाजी, खलिहान खाली

  • 17 दिसंबर 2009
धान
Image caption धान की फ़सल चौपट हो गई

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक सलाहकार परिषद के अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2009-10 के दौरान खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 22 करोड़ 30 लाख टन रहने की संभावना है.

ये आँकड़ा वर्ष 2008-09 के मुक़ाबले एक करोड़ दस लाख टन कम है.

इस अनुमान से स्पष्ट है कि वर्ष 2009 में मॉनसून फिर भारतीय किसानों के लिए जुआ साबित हुआ जिसमें हार किसानों की हुई.

जून माह तक उत्तरी राज्यों में बारिश सामान्य से कम रही जिससे धान की फ़सल चौपट हो गई. बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हालात ख़राब रहे.

जुलाई आते-आते देश के लगभग 150 ज़िले सूखाग्रस्त घोषित कर दिए गए.

हालांकि प्रधानमंत्री ने बार-बार आश्वासन दिलाया कि सरकार के पास बफर स्टॉक पर्याप्त है और खाद्यान्न की कमी नहीं होगी.

दाम बढ़ने से रोकने के लिए आयात की अनुमति दी गई और कुछ खाद्यान्नों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

चार दशक का रिकॉर्ड

भारत के मौसम विभाग के मुताबिक 1972 के बाद देश सबसे ख़राब सूखे की चपेट में रहा क्योंकि मॉनसून की बारिश औसत से काफ़ी कम रही.

मौसम विभाग के प्रवक्ता पीके बंधोपाध्याय के मुताबिक 1972 के बाद 09 में मॉनसून के दौरान सबसे कम बारिश हुई है. इस वर्ष चार महीने की मॉनसून अवधि में बारिश औसत से 23 प्रतिशत कम रही.

1972 में बारिश औसत से 24 प्रतिशत कम रही थी. इससे पहले 1979, 1987 और 2002 में बारिश औसत से 19 प्रतिशत कम रही थी.

सूखे का हर इलाक़े में अलग अलग प्रभाव पड़ा. जहां दक्षिणी इलाक़ों में पानी ज़रुरत से सात प्रतिशत कम है वहीं उत्तर और पश्चिम के इलाक़ों में पानी ज़रुरत से 36 प्रतिशत कम है.

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