चाल, चरित्र और चेहरे का संकट

कार्यभार संभालते नितिन गडकरी
Image caption सत्ता के इस असहज हस्तांतरण को राजनाथ सिंह ने सहज बताया

भारतीय जनता पार्टी अपने आपको भारत की दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग पार्टी मानती रही है और इसके लिए उसने एक चर्चित नारा दिया था, चाल, चरित्र और चेहरा.

राजनीतिक टीकाकार इस समय भाजपा की स्थिति का जिस तरह से आकलन करते हैं, उससे यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है कि वर्ष 2009 ने भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे तीनों को संकट में डाला है.

जहाँ तक चेहरे का सवाल है तो पार्टी के गठन के बाद से पिछले बरस तक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के चेहरे रहे है. लेकिन अब अटल बिहारी वाजपेयी अपनी अस्वस्थता की वजह से पार्टी की सक्रिय गतिविधियों से अलग हो चुके हैं. लालकृष्ण आडवाणी ने एक के बाद एक कई ऐतिहासिक राजनीतिक भूलों को वजह से ख़ुद को हाशिए पर खड़ा कर लिया है.

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के विकल्प के रुप में भाजपा ने मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारु लक्ष्मण, जनाकृष्णमूर्ति, वेकैंया नायडू से लेकर राजनाथ सिंह तक कई लोगों को आज़माया लेकिन किसी और चेहरे की पहचान बन ही नहीं सकी.

इस बीच भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले कल्याण सिंह और उमा भारती को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा दिया. एक चर्चित और विवादित नेता प्रमोद महाजन, जिसे वर्ष 2005 में पार्टी के रजत जयंती समारोह में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना लक्ष्मण घोषित किया था, दुनिया को ही अलविदा कह गए.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पसंद के रुप में नितिन गडकरी को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में लाया गया है लेकिन इस चेहरे का सबसे बड़ा संकट यह है कि उन्हें महाराष्ट्र से बाहर कम ही लोग पहचानते हैं. अब भाजपा का राष्ट्रीय चेहरा ऐसा व्यक्ति है, जिसने अध्यक्ष का पद संभालते ही कहा, “मैंने पिछले पाँच सालों में एक भी रात दिल्ली में नहीं गुज़ारी है.”

देखना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नितिन गडकरी को पहचान दिलाने में कितनी सफलता हासिल कर पाता है.

चाल और चरित्र

Image caption वसुंधरा ने इस्तीफ़ा देने से पहले लोगों को दिखा दिया कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र की स्थिति कितनी दयनीय है

चाल से ही चरित्र का निर्धारण होता है. लेकिन 1998 से 2004 तक केंद्रीय सत्ता पर बने रहने और कई राज्यों में अपनी सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा के नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को चाल और चरित्र को लेकर निराश ही किया.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण की जो तस्वीरें लोगों ने अपने टेलीविज़न पर देखी वह बहुत समय तक लोगों को नहीं भूलेगी. संघ से पार्टी में महासचिव के तौर पर नियुक्त किए गए संजय जोशी पर लगे चारित्रिक पतन के आरोपों को कार्यकर्ताओं ने किस तरह देखा होगा, कहना कठिन नहीं है.

हिंदुत्व को लेकर पार्टी की पहचान बनाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने भले ही अपनी समझ से एक सोची समझी चाल चली थी और मोहम्मद अली जिन्ना को धर्म निरपेक्ष घोषित किया था लेकिन इस एक ग़लत चाल ने देश में भाजपा के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के मन में उनके चरित्र को बदल कर रख दिया.

ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी पर पत्रकार प्रबाल मैत्र की टिप्पणी प्रासंगिक लगती है, जब वे कहते हैं, “ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे कि कोई राजनेता तीन-साढ़े तीन दशक तक अपने दल के शीर्ष पर रहने के बाद अचानक अप्रासंगिक हो जाए, वह भी तब जब उसकी शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक क्षमताओं में कोई दृश्य क्षरण न हुआ हो.”

Image caption कहना कठिन है कि भाजपा को वाजपेयी जैसे क़द का कोई नेता कब मिल सकेगा

पूरे देश ने देखा कि अपने अनुशासन पर गर्व करने वाली पार्टी में लोगों ने लालकृष्ण आडवाणी पर सार्वजनिक रुप से नाराज़ होते उमा भारती को देखा, दूसरी पीढ़ी के नेताओं को मीडिया के ज़रिए एक दूसरे की टांग खींचते हुए देखा और भाजपा के भीतर भी वही गुटबाज़ी देखी जिसके लिए भाजपा दूसरी पार्टियों पर कीचड़ उछालती रही है.

अगर सिर्फ़ वर्ष 2009 की बात करें तो भी उदाहरण कम नहीं है.

जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले लालकृष्ण आडवाणी को आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तक बना दिया गया लेकिन इसी आरोप में पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया.

राज्य में पार्टी की हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर बीसी खंडूरी को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और पार्टी नेतृत्व की किरकिरी की क़ीमत पर भी वसुंधरा राजे सिंधिया को राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद छोड़ने पर मजबूर किया गया. लेकिन महाराष्ट्र में पार्टी की क़रारी हार के बाद राज्य इकाई के अध्यक्ष नितिन गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया.

Image caption जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने के लिए नियमों को भी दरकिनार कर दिया गया

बीता साल इस बात का गवाह रहा कि पार्टी उत्तर प्रदेश में किस तरह अप्रासंगिक हो रही है, किस तरह वह महाराष्ट्र में लगातार तीसरी बार सत्ता के क़रीब पहुँचने में विफल रही है और किस तरह बिहार में उसकी स्थिति लगातार कमज़ोर होती जा रही है. दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में पहली बार सत्ता हासिल करने के बाद, मुख्यमंत्री बी येदियुरप्पा को पार्टी के दूसरे नेताओं से मिली खुली चुनौती पर राष्ट्रीय नेतृत्व की बेबसी का गवाह भी यही साल बना.

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में पार्टी की जीत ज़रुर हुई लेकिन दिल्ली तीसरी बार कांग्रेस में झोली में चली गई. आंध्र में तेलुगुदेशम पार्टी पहले ही छिटक गई थी लेकिन उड़ीसा में बीजू जनता दल का दामन छोड़ देना पार्टी के लिए बेहद नुक़सानदेह साबित हुआ है.

अरूण शौरी से लेकर यशवंत सिन्हा तक कई नेता शीर्ष नेतृत्व की शिकायत करते रहे और इसे सार्वजिक भी करते रहे लेकिन पार्टी उन्हें चेतावनी देने के अलावा कुछ नहीं कर सकी.

यह कहना ग़लत होगा कि भाजपा कभी भी संघ के प्रभाव से मुक्त था लेकिन आभासिक तौर पर ही सही भाजपा ने एक स्वतंत्र राजनीतिक दल की तरह बर्ताव करना शुरु कर दिया था. वर्ष 2009 इस बात का भी गवाह रहेगा कि एक बार फिर भाजपा एक कठपुतली बन गई जिसका कोई स्वतंत्र चरित्र नहीं है और उसकी हर चाल संघ मुख्यालय से नियंत्रित है.

मुख्य विपक्षी दल भाजपा की यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है, इससे कौन इनकार कर सकता है.

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