कब बहुरेंगे प्रयाग नगरी के दिन

  • 26 दिसंबर 2009
Image caption हिंदू धर्मावलंबियों में इलाहाबाद के गंगा-यमुना संगम का ख़ास महत्व है

इन दिनों मैं उत्तर प्रदेश की महानगरी इलाहाबाद आया हुआ हूँ. यह मेरी जन्म भूमि है. अरे मेरी क्या गिनती, यह तो प्रयाग नगरी है जिसकी भूमि को न जाने कितने हज़ार वर्षों से गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों ने सींचा है.

गंगा और यमुना के दोआब में बसा यह नगर भले ही अपने संगम पटल पर करोड़ों व्यक्तियों के पाप एक दिन में धो देता हो, लेकिन मुझे तो ये प्रतीत होता है कि गंगा माई अपनी गोद में बसे इलाहाबादियों को उनकी समस्याओं से अब मुक्ति नहीं दे पाती है.

वह नगरी जहाँ कभी स्वयं जवाहरलाल नेहरू और उनकी बिटिया इंदिरा पले-बढ़े, उसी इलाहाबाद की सड़कों पर यदि अब आप चलें तो आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे. चारों ओर कूड़े का अंबार है, जो फैला हुआ है.

प्रयाग नगरी की दुर्दशा

मंद गति से चलने वाले साइकिल रिक्शा पर दो किलोमीटर चलकर उतरिए तो आपकी हड्डियाँ आपसे सवाल करने लगती हैं.... भैया अभी कितनी देर और इलाहाबाद में रुकोगे. सड़कें, सड़कें नहीं गड्ढों का एक मैदान नज़र आती हैं.

Image caption राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में बहुत सक्रिय हैं

इलाहाबाद का वो सिविल लाइंस जिसका शुमार उत्तर भारत के क्या, कभी देश के महान नगर क्षेत्रों में होता था, वही सिविल लाइंस अब अपनी गंदगी की एक कथा स्वयं सुनाता है.

वह नगर जिसने जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, वीपी सिंह जैसे लगभग आधे दर्जन प्रधानमंत्री देश को दिए, वही इलाहाबाद मानो अतीत की एक गाथा बन गया है.

जवाहरलाल और मोतीलाल के घर आनंद भवन और स्वराज भवन आज भी वैसे ही खड़े हैं. लेकिन वो आनंद भवन एवं स्वराज भवन जहाँ से कभी देश के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा मिली थी, आज उन भवनों में क्या पूरे इलाहाबाद में चिंतन का अभाव नज़र आता है.

आनंद भवन के पास खड़ा वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय जो लगभग वर्ष 1970 के दशक तक विश्वख्याति रखता था, अब वही इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने अतीत पर जी रहा है.

मैंने अपने बचपन के मित्र और इसी विश्वविद्यालय में उर्दू के विभागाध्यक्ष डॉ. फातमी से पूछा कि विश्वविद्यालय का क्या हाल है तो वे मुस्करा कर बोले, "फ़िराक़ साहब, हरिवंशराय बच्चन और महादेवी वर्मा जैसे महापुरुषों को तो भूल जाओ, अब तो हमारे विश्वविद्यालय में एक पुरुष भी ढूँढ़ने से नहीं मिलता."

मैं पास ही इलाहाबाद हाई कोर्ट गया तो वहाँ ताला पड़ा था और वकील नारे लगा रहे थे. गंदी, टूटी सड़कें! जगह-जगह कूड़े का अंबार, सड़कों पर भीड़ और धक्का-मुक्की, धीमी गति से चलने वाले रिक्शों का एक जुलूस, संगम पर सिकुड़ती और ग्लोबल वार्मिंग की याद दिलाती गंदी गंगा नदी, न जाने पिछले तीन दशकों में इलाहाबाद आगे बढ़ा कि सदियों पीछे चला गया.

क्रांति का इंतज़ार

उत्तर प्रदेश में एक इलाहाबाद ही क्या वह लखनऊ हो या कानपुर अथवा मेरठ या अलीगढ़, हर नगरी अपने पिछड़ेपन में इलाहाबाद की मूर्ति है. पता नहीं इस प्रदेश में कब बिजली आती है और कब चली जाती है यह आप पता नहीं लगा सकते हैं. भगवान जाने उत्तर प्रदेश में कभी कोई कारखाना क्यों नही खुलता है.

Image caption उत्तर प्रदेश में मायावती और कांशीराम के अनेक स्मारक निर्माणाधीन हैं

कभी-कभी तो यह प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश में औद्योगिक क्रांति अभी पहुँची ही नहीं है. वह प्रदेश जहाँ गंगा और यमुना के तट पर हिंदु सभ्यता ने अपने पैर जमाए हों और जहाँ कभी गंगा जमुनी तहज़ीब जन्मी हो, वही उत्तर प्रदेश अब मानो समय में जम कर रह गया हो.

आखिर ये हुआ क्या उत्तर प्रदेश को? क्या ये उत्तर प्रदेश पर जातीय राजनीति का एक प्रकोप है? दिल्ली में बैठकर हम तो ये समझते थे कि मुलायम और माया जैसे नेताओं ने प्रदेश में एक सामाजिक क्रांति उत्पन्न कर दी थी.

निःसंदेह एक दलित महिला का अपने दम पर तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनना एक सामाजिक क्रांति तो थी, लेकिन ऐसी क्रांति किस काम की जो बहुजन समाज के एक गुट और कुछ पार्क एवं उद्यानों में सीमित होकर रह गई हो.

उत्तर प्रदेश आज भी भारत का हृदय है. वह इलाहाबाद हो या लखनऊ, हर जगह उत्तर प्रदेश अब वर्ष 1990 में उत्पन्न सामाजिक क्रांति से थका दिखाई पड़ता है. अब इलाहाबाद जैसे उत्तर प्रदेश की हर नगरी को विकास क्रांति की प्रतीक्षा है.

पहले कभी इलाहाबाद जाओ तो मुलायम और माया के चर्चों से इलाहाबाद कॉफी हाउस गूँजता था. अब इलाहाबाद कॉफी हाउस में हर जुबान पर ’राहुल भय्या‘ का नाम है. देखें राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश को वह विकास क्रांति कब दे पाते हैं जिसकी प्रतीक्षा इलाहाबाद जैसे नगर टकटकी लगाए कर रहे हैं.

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