रुचिका मामले में जनहित याचिका दायर

Image caption रुचिका के मामले मे फ़ैसला आने मे 19 साल लगे.

रुचिका गिरहोत्रा मामले में एक नया मोड़ आया है. वकील रंजन लखनपाल ने मामले की नए सिरे से जांच के लिए एक जनहित याचिका दायर की है.

उनका तर्क है कि जिस तर्ज़ पर सुप्रीमकोर्ट ने बेस्ट बैकरी मामले मे नए सिरे से जांच के आदेश दिए थे, इस मामले मे भी ऐसा हो सकता है.

हालांकि क़ानून के कई जानकार मानते हैं कि इस मामले को फिर से खुलवाना आसान नहीं होगा.

दिल्ली हाईकोर्ट में वकील रिबैका मेमन मानती हैं कि इस मामले मे बेशक इंसाफ़ नहीं मिल सका है, पर समय की सुइयों को उल्टा घुमाना संभव नही है. वो कहती हैं कि रुचिका मामले की नए सिरे से जांच कराना आसान काम नहीं होगा, बल्कि ये संभव ही नही है.

उनके अनुसार इस मामले मे सुप्रीम कोर्ट तक ये कह चुका है कि धारा 306 यहाँ लागू नहीं होती. वो कहती हैं कि मीडिया जब इस सवाल को उठा रहा है तो वो इस तथ्य को नज़र अंदाज़ कर रहा है.

लेकिन वकील रंजन लखनपाल कहते हैं कि हाईकोर्ट को ये अधिकार है कि अदालत बेस्ट बैकरी केस को आधार बनाते हुए ऐसे आदेश दिए जाएं.

इस जनहित याचिका पर अभी चंडीगढ़ हाईकोर्ट को तय करना है कि वो इस याचिका को स्वीकार करता है या नहीं.

रुचिका के परिवार ने जो विवरण दिए हैं उससे पता चलता है कि परिवार ने 19 बरस तक न्याय का इंतज़ार किया और इस बीच उसने तरह-तरह की यातनाएँ सहीं.

इस सवाल पर दिल्ली हाईकोर्ट की वकील रिबैका मेमन कहती हैं, "सिर्फ़ पुलिस और व्यवस्था पर सवाल उठाने से बात नहीं बनेगी. ऐसे सवालों पर जवाबदेही भारत के समाज की भी है."

आमतौर पर कहा जाता है कि आम लोगों के लिए न्याय पाना कठिन है लेकिन तब क्यों न्याय व्यवस्था में सुधार कभी आम आदमी का मु्द्दा नही बन पाता, इस सवाल पर रिबैका मेमन कहती हैं कि रुचिका मामले में इंसाफ़ ना सिर्फ़ देरी से मिला बल्कि वो अधूरा भी है.

वो कहती हैं कि जितना ज़ोर इस मामले को फिर से खुलवाने मे लगाया जा रहा है उससे ज़्यादा ज़ोर व्यवस्था में सुधार लाने में लगाया जाना चाहिए.

वो कहती हैं कि यौन हिंसा से संबधित एक विधेयक पिछले कई सालों से सरकार के पास है, पर उस आज तक संसद में नहीं लाया गया, इस पर भी सवाल उठाना चाहिए.

इस तरह के मामलों पर मीडिया बहस ज़रुर खड़ा करता है, एक तरह का मध्यम वर्गीय अभियान भी शुरु होता है, जैसा जेसिका लाल या प्रियदर्शनी मट्टू मामले में भी देखा गया. लेकिन ये बहस कभी इस हद तक नहीं गई कि बीमारी का संपूर्ण इलाज ढूंढा जाए.

रुचिका मामले में हरियाणा राज्य के कई अधिकारियों ने अदालत के फ़ैसले के बाद इस तरह के बयान दिए हैं कि उन पर राजनीतिक दबाव था जिस वजह से वो कोई कार्रवाई नहीं कर पाए. विश्लेषकों के अनुसार उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि नेताओं पर आरोप लगाने से क्या उनका कर्तव्य पूरा हो जाता है? आख़िर क्यूं ना उनके ख़िलाफ़ अपने कर्तव्य के निर्वहन ना करने के लिए कर्रवाई की जाए?

इस तरह के मामलों पर नज़र रखने वालों का कहना है कि इस बात में कोई शक नहीं कि रुचिका गिरहोत्रा, जेसिका लाल, या प्रियदर्शनी मट्टू मामले मे जो एक नागरिक दबाव बन रहा है, वो क़ाबिले तारिफ़ है, पर सवाल ये है कि कितने ही ऐसे मामले डंडे या पैसे के ज़ोर पर पुलिस चौकियों और थानों मे दब जाते हैं उनकी लड़ाई क्यूं नही लड़ी जाती?

आज से तीन साल पहले आज ही के दिन निठारी मे बच्चों के कंकाल मिले थे, कई पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग उठी, कुछ के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई भी.

लेकिन आज सच ये है कि उस मामले मे दोषी एक भी आला अफ़सर ऐसा नही है जिसे सज़ा मिली हो और अदालतों मे जो मामले दायर हैं उसमें अभियोजन पक्ष की दलील और वकील दोनों ही कमज़ोर साबित हो रहे हैं.

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