टीके के अभाव में बच्चों को बीमारियाँ

  • 30 दिसंबर 2009
एक बच्चा
Image caption उत्तर प्रदेश को ग़रीबी और पिछड़ेपन की वजह से बीमारू राज्य में गिना जाता है

उत्तर प्रदेश के बच्चे अब ऐसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं, जो दूसरे कई राज्यों और देशों से ग़ायब हो चुकी हैं. ये छह ऎसी बीमारियाँ हैं, जो नियमित टीकाकरण से रोकी जा सकती हैं.

इनमें डिप्थीरिया अथवा गलघोंटू, काली खांसी, खसरा, पोलियो, टिटनेस और टीबी शामिल हैं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में केवल एक चौथाई बच्चों को ही इन बीमारियों के टीके लग पाते हैं.जिन बच्चों को टीके नही लग पाते वे इन बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. केजी मेडिकल कालेज लखनऊ में बालरोग विभाग के प्रोफ़ेसर डा. योगेश गोविल का कहना है कि पिछले आठ महीनों में अकेले उनके विभाग में गलघोंटू से पीड़ित सौ से ज़्यादा बच्चे भर्ती हुए और उनमे से 41 की मृत्यु हो गई. उनका कहना है कि चूँकि डिप्थीरिया की बीमारी ख़त्म हो गई है, इसलिए उसके इलाज में काम आने वाला सीरम भी नहीं बनता, इसलिए बीमार पड़ने वाले बच्चों का इलाज मुश्किल होता है. उत्तर प्रदेश में खसरा और टिटनेस भी बच्चों को शिकार बना रहा है. ग़रीब तबकों से विशेषज्ञ कहते हैं कि चूँकि गलघोंटू, टिटनेस या खसरे से मरने वाले बच्चे ग़रीब और कमजोर तबके से हैं, इसलिए इन मौतों पर सरकार या समाज में कोई हलचल नहीं हुई.

इन तबके के लोगों में अशिक्षा भी एक बड़ी बीमारी है और उन्हें पता ही नहीं होता कि जच्चा-बच्चा को कब और कितने टीके लगाने चाहिए.

डाक्टर गोविल कहते हैं ''इन सभी छह बीमारियों टीकों की लागत पांच दस रुपयों से ज्यादा नहीं है, इसलिए इसमे धनराशि का अभाव कारण नहीं हो सकता. कमी है तो केवल क्रियान्वयन में.

उनका कहना है कि यह मामला सुप्रशासन से संबंधित है. अगर हम बच्चों को जीवन के लिए बुनियादी जरूरत के टीके नही उपलब्ध करा पाते तो धिक्कार है.''

बाल एवं परिवार कल्याण विभाग के निदेशक डा. सीवी प्रसाद कहते हैं कि उत्तर प्रदेश एक विशाल आबादी वाला प्रदेश है. लोग काफी दूर दराज में रहते हैं और शिक्षा का अभाव भी है.

श्री प्रसाद मानते हैं कि पोलियो टीके पर बहुत अधिक जोर देने से बाकी रूटीन टीके लगाने का काम पीछे रह जाता है. ''पोलियो के ऊपर हमारा विशेष फोकस है, ये नहीं होना चाहिए, बल्कि पोलियो टीकाकरण को भी रुटीन टीकाकरण में जोड़कर कराना चाहिए. सारी हमारी शक्ति पोलियो कैंपेन में लग जाती है और बाक़ी टीकाकरण उपेक्षित रह जाता है. लेकिन अब हम लोग ऐसा करने जा रहे हैं कि शतप्रतिशत जनता भागीदारी करेगी.''

ग़ौरतलब है कि दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में औसतन 90 फ़ीसदी बच्चों को इन सभी छह बीमारियों के टीके लग जाते हैं.

लेकिन उत्तर प्रदेश बहुत पीछे है.

जानकारों का कहना है कि लोगों में शिक्षा की कमी के साथ साथ सरकार और प्रशासन में इच्छाशक्ति में कमी इस समस्या के मुख्य कारण हैं.

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