ज्योति बसु:एक जननेता का सफ़र

ज्योति बसु
Image caption ज्योति बसु 1930 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ़ इंडिया के सदस्य बन गए थे.

भारत में 1996 में हुए संसदीय चुनाव से पहले कुछ लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ज्योति बसु एक दिन भारत के प्रधानमंत्री ज़रूर बनेंगे.

ऐसा इसलिए नहीं था वे एक ऐसी कम्युनिस्ट पार्टी से आते थे जिसका प्रभाव देश के तीन राज्यों को छोड़कर देश में कहीं नहीं रहा. इसलिए भी नहीं कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका पार्टी के पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति की बैठकों तक ही सीमित थी.

ऐसा इसलिए कहा जा रहा था कि भारतीय राजनीति व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी. कुछ क्षेत्रिय नेताओं का राजनीति के क्षितज पर उदय हो रहा था. कुछ वाम दलों और क्षेत्रियों दलों का गठबंधन हो रहा था, ऐसे में ज्योति बसु प्रधानमंत्री पद के एक सर्वसम्मत दावेदार के रूप में उभर कर सामने आए.

राजनीतिक दक्षता

उनके पास बंगाल में वाम दलों को एक साथ रखने का काफ़ी लंबा अनुभव था ( यह गठबंधन आज 33 साल बाद भी वहां सत्ता में बना हुआ है लेकिन अब यह कमज़ोर होने के संकेत दे रहा है) ऐसे में केंद्र की राजनीति में एक अस्थीर गठबंधन को स्थिर बनाए रखना काफ़ी चुनौतीपूर्ण काम था. लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इसे दूसरी तरह से लिया.

माकपा ने इस गठबंधन सरकार में शामिल न होने और उसे बाहर से समर्थन देने का फ़ैसला लिया. इससे ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. बाद में उन्होंने पार्टी के इस फ़ैसले को 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया.

ज्योति बसु का जन्म पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश में) के एक समृद्ध मध्यवर्गीय परिवार में आठ जुलाई 1914 को हुआ था. उन्होंने कलकत्ता के एक कैथोलिक स्कूल और सेंट जेविर्यस कॉलेज़ से पढ़ाई की.

वकालत की पढ़ाई बसु ने लंदन में की. रजनी पाम दत्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं से संबंधों के चलते उन्होंने 1930 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की सदस्यता ले ली.

रेल कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने के बाद पहली बार में वे चर्चा में आए और 1957 में पश्चिम बंगाल विधानसभा में वे विपक्ष के नेता चुने गए.

1967 में बनी वाम मोर्चे के प्रभुत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार में ज्योति बसु को गृहमंत्री बनाया गया लेकिन नक्सलवादी आंदोलन के चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और वह सरकार गिर गई.

इसके बाद 1977 के चुनाव में जब वाम मोर्चा को विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिला तो ज्योति बसु मुख्यमंत्री पद के सर्वमान्य उम्मीदवार के तैर पर उभरे और चुने गए.

ऐतिहासिक मुख्यमंत्री

इसके बाद का समय इतिहास है, जब उन्होंने लगातार 23 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया.

बसु की सरकार ने राज्य में कई उपलब्धियाँ दर्ज कीं जिनमें प्रमुख है नक्सलबाड़ी आंदोलन से बंगाल में पैदा हुई अस्थीरता को राजनीतिक स्थीरता में बदलना.

उनकी सरकार का एक और उल्लेखनीय काम है भूमि सुधार, जो दूसरे राज्यों के किसानों के लिए आज भी एक सपना है.

ज्योति बसु की सरकार ने जमींदारों और सरकारी कब्ज़े वाली ज़मीनों का मालिक़ाना हक़ क़रीब 10 लाख भूमिहीन किसानों को दे दिया. इस सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की ग़रीबी दूर करने में भी काफ़ी हद तक सफलता पाई.

सफलता के झंडे गाड़ने वाली बसु सरकार की कुछ कमियाँ भी रहीं. जैसे कि वह बार-बार हड़ताल करने वाली ट्रेड यूनियनों पर कोई लगाम नहीं लगा पाई, उद्योगों में जान नहीं फूंक पाई और विदेशी निवेश नहीं आकर्षित कर पाई.

वहीं ज्योति बसु की यह सरकार कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की सरकारों की तरह तकनीकी रूप से दक्ष लोगों का उपयोग कर राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग भी नहीं खड़ा कर पाई.

पार्टी का अंतर्विरोध

इस सरकार ने विदेशी निवेश के सैकड़ो समझौता पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर तो किए लेकिन उनमें से कुछ को ही अमली जामा पहनाया जा सका क्योंकि मज़दूर संगठन इसके पक्ष में नहीं थे.

इसके लिए ज्योति बसु अपनी सरकार की अंतिम कैबिनेट बैठक तक लड़ते रहे.

ज्योति बसु को एक कट्टर कम्युनिस्ट नेता की तुलना एक विस्मयकारी समाजवादी नेता के रूप में देखा जाता है.

राजनीतिक विश्लेषक सब्यसाची बसु रॉय चौधरी कहते हैं, ''ज्योति बसु ने साम्यवाद को सम्मानित बनाया.''

ज्योति बसु के राजनीतिक करियर पर बहुत क़रीब से निगाह रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक और अंग्रेज़ी अख़बार 'टेलीग्राफ़' के राजनीतिक संपादक आशीष चक्रवर्ती कहते हैं, ''बसु कम्युनिस्ट कम और व्यवहारिक अधिक दिखते थे, एक सामाजिक प्रजातांत्रिक. लेकिन उनकी सफलता यह संकते देती है कि सामाजिक लोकतंत्र का तो भविष्य है लेकिन साम्यवाद का अब और नहीं.''

लेकिन उनकी यह सफलता और भी अधिक हो सकती थी अगर उनकी पार्टी की केंद्रीय समिति ने उन्हें 1996 में केंद्र में बनने वाली गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने की अनुमति दे दी होती. ज्योति बसु ने बाद में पार्टी के इस फ़ैसले को एक ‘ऐतिहासिक भूल’ बताया था.

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