'महकमा ही सबसे बड़ा शराब माफिया'

  • 7 जनवरी 2010

बिहार में शराब के वैध-अवैध धंधों की बहार-सी आई हुई है. पिछले तीन-चार वर्षों में यहाँ देसी-विदेशी और असली-नक़ली दारू की दुकानें कुकुरमुत्तों की तरह छा गई हैं.

शहर या कस्बे की कौन कहे, अब तो गाँव-गाँव में पाउच वाली देसी दारू धड़ल्ले से बिक रही है. ऐसी मिलावटी और ज़हरीली शराब पीकर लोग मर भी रहे हैं.

लगभग 5000 दारू की दुकानें सरकार की बंदोबस्ती यानी लायसेंसी दायरे में हैं. लेकिन इस दायरे से बाहर वाली जो दुकानें ग़ैरक़ानूनी तौर पर गली-गली में नशा बेच रही हैं, उनकी तादाद का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.

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इस धंधे पर सरकारी नियंत्रण के लिए बने उत्पाद और मद्य निषेध विभाग का काम दरअसल मदिरा के प्रति निषेध नहीं, आकर्षण पैदा करके राजस्व कमाना है. लेकिन इस व्यवसाय की काली कमाई से पैदा हुए धन-पशुओं के आगे बड़ी-बड़ी सत्ता भी बिछ जाती है.

फिर भी, मेरे मन में आया कि बिहार में पहले से ज़्यादा निरंकुश और जानलेवा हुए दारू-कारोबार के प्रति राज्य सरकार की इतनी दरियादिली का कारण इस विभाग के मंत्री से पूछा जाए.

मैंने विभागीय मंत्री जमशेद अशरफ से संपर्क साधा. वो पटना से बाहर थे, लेकिन टेलीफोन पर बातचीत के लिए राज़ी हो गए और जब उनसे बातें हुईं तो लगा जैसे कोई मंत्री नहीं बल्कि दारू के काले कारोबारी-गिरोह से खार खाया हुआ कोई जुझारू आदमी अपना रोष ज़ाहिर कर रहा हो.

'अंडे खाओ, मुर्गियाँ नहीं'

नीतीश सरकार के उत्पाद और मद्यनिषेध मंत्री का ये कहना कि अपने राजनीतिक सहयोगियों के बजाय नौकरशाहों से राय लेना मुख्यमंत्री की आदत है, बड़ा ही अप्रत्यशित लगा.

इतना ही नहीं, अशरफ ने कहा "बिहार में शराब का ढाई हज़ार करोड़ रूपए का मार्केट है, जिसमें सिर्फ आठ या नौ करोड़ रूपए ही सरकार को मिलते हैं. बाक़ी सब अवैध कारोबारियों और घूसखोरों के पेट में जाएगा. किस-किस पर मैं उंगली उठाऊँ, सब-के-सब लिप्त हैं."

इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात उत्पाद मंत्री ने ये कही, "सबसे बड़ा शराब माफिया हमारा ये सरकारी महकमा ही है, जो इसे मलाईदार डिपार्टमेंट मानकर खूब खाता-पीता है. मैं कहता हूँ कि भाई, अंडे खाओ लेकिन मुर्गियां मत खा जाओ."

ये सब सुनकर मुझे लगा कि मंत्री जी तो अपने विभाग के कथित माफिया समेत अब मुख्यमंत्री से भी दो-दो हाथ कर लेने की मुद्रा में हैं.

उधर बिहार के विकास संबंधी विवादस्पद आंकड़ों के अहंकार में चढ़ी हुई आँखें अगर इस प्रदेश में बह रही 'दारू की नदियों' को 'दूध की नदियाँ' घोषित कर भी दें तो ज़्यादा मत चौंकिएगा.

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