जाएँ तो जाएँ कहाँ!

फ़ाइल फ़ोटो
Image caption अमर सिंह की दोस्ती भाजपा के अरुण जेटली से रही है

बेचारे अमर सिंह! नेता जी मुलायम सिंह यादव से उनकी अनबन हो गई.

वह समाजवादी पार्टी जिसने अमर सिंह जी को न केवल देश की राजनीति बल्कि दिल्ली और मुंबई के जगमगाते जगत का सितारा बना दिया वही समाजवादी पार्टी अब अमर सिंह के लिए अतीत हुई.

ऐसे में अमर सिंह जी 'जाएं तो जाएं कहाँ?'

अपने ब्लॉग पर अमर सिंह जी सोनिया गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों की प्रशंसा कर चुके हैं, पर कांग्रेस ठहरी गाँधी परिवार और मैनेजरों की पार्टी. गाँधी परिवार भला अमर सिंह जी को क्यूँ पूछे!

वर्ष 1998 में सोनिया गाँधी को देश का प्रधानमंत्री बनने से जिसने रोका था, उस व्यक्ति का नाम भी अमर सिंह था.

ज़रा याद कीजिए 1998 की वह राजनीतिक उथल पुथल! अटल बिहारी वाजपेयी सरकार लोक सभा में एक मत से अविश्वास प्रस्ताव खो कर सत्ता से बाहर हो गई.

देश की सभी ’सेक्युलर’ राजनीतिक पार्टियों ने अटल बिहारी के गठबंधन के ख़िलाफ़ वोट किया.

उन पार्टियों में अमर सिंह की समाजवादी पार्टी भी शामिल थी.

अब दिल्ली के सियासी गलियारों में एक नई सरकार के गठन की हलचल प्रारंभ हुई.

सोनिया गाँधी ’सेकुलर’ लोक सभा सांसदों की लिस्ट बना राष्ट्रपति के पास पहुँच गईं और नई सरकार गठन का दावा भी ठोंक बैठीं.

उन्होने जो लिस्ट राष्ट्रपति की दी उसमें मुलायम सिंह यादव की पार्टी के सांसद भी शामिल थे.

आख़िर मुलायम सिंह के सांसदों ने अटल सरकार के ख़िलाफ़ वोट किया था तो फिर सोनिया सहमित में संकोच कैसा.

पर मिनटों मे सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर हंगामा खड़ा हो गया.

सोनिया विरोध

अब बड़बोले अमर सिंह ने सोनिया विरोध की पताका बुलंद कर दी और पत्रकार सम्मेलनों में सोनिया के ख़िलाफ़ क्या नहीं कह डाला.

नौबत यहाँ तक पहुँची कि वह मुलायम सिंह यादव जिनकी समाजवादी पार्टी ने अटल सरकार के ख़िलाफ़ वोट किया था, वही मुलायम सिंह सोनिया को समर्थन से मुकर गए.

इस प्रकार सोनिया गाँधी देश की प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गईं.

उस समय देश की व्यवस्था एवं मीडिया दोनों सोनिया का जानी दुश्मन था.

अमर सिंह ने मुलायम को सोनिया के विरूद्ध कैसे रिझाया यह तो खुदा ही जाने, हाँ अब अमर सिंह देश की व्यवस्था और मीडिया की आँखो के तारे हो गए.

अमिताभ बच्चन 'बडे भाई' तो अरूण जेटली उनके 'छोटे भाई'.

अमर सिंह के मुँह से निकला हर शब्द भारतीय मीडिया के लिए गुरूबानी हो गया और बस फिर अमर सिंह ’स्टार’ हो गए.

परन्तु अब जब मुलायम से खटकी और कांग्रेस याद आई तो कांग्रेस को 1998 याद आ गया.

कांग्रेस के दिग्गज़ मैनेजर अमर सिंह के ख़िलाफ़ पार्टी में भर्ती में तलवार लेकर खड़े हो गए. इसलिए 'पुराने कर्मों' के एवज़ में कांग्रेस का द्वार तो अमर सिंह के लिए अब खुलता नहीं.

शायद ब्लॉग पर अटल जी का व्याख्यान इस आशा से किया हो कि 'छोटे भाई' जेटली से प्रेम भाजपा दाखिले का रास्ता साफ़ कर दे.

परन्तु भाजपा में दो समस्याएँ हैं. एक तो नए पार्टी अध्यक्ष गडकरी जी को दिल्ली वालों पर यूँ ही कुछ अधिक विश्वास नहीं है.

फिर अमर सिंह जी ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल पर तूफ़ान खड़ा किया था तो भाजपा की ’साम्प्रदायिक राजनीति’ के विरूद कोई कम बवाल नहीं उत्पन्न किया था.

अमर सिंह को भले ही 'अटल जी और जेटली जी' अच्छे लगते हों. परन्तु उत्तर प्रदेश का मुस्लिम वोट बैंक उनको आडवाणी के विरूद्ध तीखी वाणी का प्रयोग करने से नहीं रोक सका.

भला भाजपा अडवाणी के ख़िलाफ़ अमर सिंह के वह तीखे बाण कैसे भूले.

ऐसे में अमर सिंह जी के लिए भाजपा का द्वार भी खुलता नज़र नहीं आता.

शायद अमर सिंह को अब यह याद आया हो कि सोनिया के विदेशी मूल का उस समय डंका पीटने वाले वो अकेले नहीं थे.

वह शरद पावर जो इस समय मनमोहन सरकार के स्तंभ हैं, उन्ही शरद पावर ने भी सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्ति पर ’विदेशी मूल’ पर आपत्ति उठाकर सोनिया के ख़िलाफ़ बगावत कर दी थी.

पावर ने तो पार्टी छोड़ अपनी अलग एक कांग्रेस सजा ली थी जो महाराष्ट्र में आज तक चल रही है.

परन्तु पवार ठहरे एक घाग नेता. अब वो सोनिया गाँधी की कांग्रेस के साथ मनमोहन सरकार के सहयोगी हैं और सत्ता के मजे भी उठा रहे हैं.

ऐसे में पवार के सहयोगी डीपी त्रिपाठी भले ही अमर सिंह की प्रशंसा कर लें,पर शरद पवार समाजवादी पार्टी के बड़बोले अमर सिंह को लेकर कांग्रेस से अपने रिश्ते ख़राब नहीं कर सकते.

अमर सिंह फ़िल्मी जगत के प्रेमी हैं और शायद इन दिनों वो प्रसिद्व फिल्मी धुन 'जाएँ तो जाएँ कहाँ' गुनगुना रहे हों.

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