भारत में बिक रहे 'ज़हरीले' खिलौने

Image caption सेंटर फार साइंस ऐंड इनवायरमेंट का कहना है कि कई खिलौने बच्चों के लिए हानिकारक हैं

भारत में बिकनेवाले ज्यादातर खिलौनों में एक हानिकारक रसायन मौजूद रहता है. दिल्ली स्थित एक ग़ैरसरकारी संस्था सेंटर फार साइंस एन्ड इनवायरमेंट के एक नए अध्ययन में ये बातें सामने आईं हैं.

थैलेटस नाम का ज़हरीला रसायन बच्चों के लिए खिलौना बनाते वक्त प्लास्टिक को मुलायम बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

सेंटर फार साइंस एन्ड इनवायरमेंट ने दिल्ली के अलग-अलग बाज़ारो से कुल 24 खिलौनों का परीक्षण किया.

उन खिलौनों में लगभग 60 प्रतिशत चीन से आयात किए गए थे, कुछ ताइवान और थाईलैंड के बने हैं जबकि बाक़ी भारत में बने हैं.

अध्ययन के बाद पता चला कि उनमें थैलेटस की मात्रा बाहर के देशों में मौजूद खिलौनों से कहीं ज्यादा है.

क्या है थैलेटस

सीएसई के सह निदेशक चंद्रभूषण के मुताबिकड थैलेटस एक पेट्रोकेमिकल पदार्थ है जो कि खिलौनों के प्लास्टिक को मुलायम बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

लेकिन जैसे ही बच्चा इन खिलौनों को अपने मुंह में डालता है, इसका असर होने लगता है. तीन साल से कम उम्र के बच्चों पर इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ता है.

इसके दूसरे संभावित दुष्प्रभावों में बच्चों को रिप्रोडक्टिव डिसआर्डर होना, फेफड़े बर्बाद होना, हड्डिया कमजोर होना और सांस की तकलीफ बढ़ना शामिल हैं.

अमरीका में थैलेटस प्रतिबंधित है जबकि यूरोपीय देशों में इसके मानक काफ़ी सख्त है लेकिन जहां तक भारत का सवाल है तो इस ज़हर से मुक़ाबला करने के लिए देश में अभी तक कोई मापदंड नहीं हैं.

भारत में ब्यूरो आफ़ इंडियन स्टैंडर्डस ने खिलौने के मामले में सुरक्षा से जुड़े कुछ मापदंड ज़रूर हैं लेकिन उनमें थैलेटस शामिल नहीं है और वो मापदंड भी स्वैच्छिक हैं.

बावजूद इसके न्यायपालिका के दबाव में आकर भारत सरकार ने पिछले साल जनवरी में पहले चीन के खिलौनों पर उसके बाद सारे देशों से आयातित खिलौनों पर प्रतिबंध लगाया था जो कि आने वाले 23 जनवरी को खत्म हो रहा है.

ऐसे में भारत के सामने क्या विकल्प है, इसका जवाब देते हुए चंद्रभूषण कहते हैं कि भारत ने अपने घरेलू खिलौने व्यवसाय के लिए कोई नियम नहीं बनाए हैं लेकिन उस पर आयात पर प्रतिबंध न लगाने का डब्लूटीओ का दबाव है.

लिहाज़ा सरकार के सामने दो ही रास्ते हैं या तो वो सारे खिलौनों को क़ानून के दायरे मे लाए या फिर सबसे पाबंदी हटा दे जैसा कि जनवरी 2009 से पहले था.

सीएसई मांग कर रही है कि बच्चों के स्वास्थ्य का ख़्याल रखते हुए सरकार सबके लिए नियम बनाए.

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