भारत के रुख़ की पुष्टि हुई: रमेश

जयराम रमेश
Image caption जयराम रमेश का कहना है कि आईपीसीसी की रिपोर्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है

हिमालय के ग्लेशियरों के पिघल जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है.

भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का कहना है कि हिमालय ग्लेशियर मामले में भारत के रुख़ की पुष्टि हुई है.

जयराम रमेश ने कहा है कि हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पूरी तरह पिघल जाने संबंधी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से आईपीसीसी के पल्ला झाड़ लेने के बाद भारत सरकार का रुख़ सही साबित हुआ है.

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) के रिपोर्ट को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस रिपोर्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था.

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आईपीसीसी के चेयरमैन राजेंद्र पचौरी भी यह कहते हुए इस विवाद से पीछे हट गए हैं कि इसमें उनकी 'कोई ज़िम्मेदारी नहीं है'.

वैज्ञानिक आधार नहीं

रमेश ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा, "ग्लेशियर के बारे में गंभीर चिंतन की जरूरत है लेकिन हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पूरी तरह पिघल जाने संबंधी आईपीसीसी की रिपोर्ट का थोड़ा भी वैज्ञानिक आधार नहीं है."

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया था कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया में सबसे तेज़ी से पिघल रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो 2035 तक या इससे पहले भी वे पूरी तरह ग़ायब हो जाएंगे.

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए सराकार ने पिछले वर्ष नवंबर में एक अलग रिपोर्ट जारी की थी जिसमें संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को ग़लत बताने वाले अनेक उदाहरण दिए गए थे और कहा गया था कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले 100 वर्षों में अलग-अलग तरीक़े से व्यवहार करते दिखे हैं.

रिपोर्ट के अनुसार सियाचिन ग्लेशियर में 1862 और 1909 के बीच 700 मीटर की वृद्धि देखी गई, फिर 1929 और 1958 के बीच 400 मीटर की कमी देखी गई, लेकिन पिछले 50 वर्षों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक गंगोत्री ग्लेशियर में भी सितंबर 2007 और जून 2009 के बीच घटाव की दर स्थिर रही.

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