जयपुर में चढ़ा साहित्य का रंग

जयपुर साहित्य उत्सव

दुनिया भर के साहित्यकारों के बीच लोकप्रिय हुए जयपुर साहित्य उत्सव में बड़ी तादाद में साहित्य, सिनेमा और संस्कृति के जाने-माने चेहरे हिस्सा लेने पहुँचे हैं.

इस उत्सव में गुलज़ार और ओम पुरी जैसे नामचीन लोग पहुँचे हैं तो कई विदेशी साहित्यकार भी भाग ले रहे हैं. ये उत्सव 21 जनवरी से 25 जनवरी तक चलेगा.

गुलजार ने अपने काव्य में ज़िंदगी के अलग-अलग रस पिरोए और भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ताना रिश्तों पर ज़ोर दिया. पहली बार इस उत्सव ने दलित साहित्य की महत्ता समझी और उनके साहित्यकारों को मंच देना सवीकार किया है.

मौसम काव्य रचनाओं में रूमानियत लेकर आता है. लेकिन उत्सव के पहले दिन कई नामी-गिरामी हस्तिओं का रास्ता रोक लिया और वो धुंध के कारण इसके उदघाटन समारोह में भाग लेने से ही वंचित हो गए.

उत्सव

नाटक के एक बड़े नाम गिरीश कर्नाड इसके उदघाटन समारोह में शरीक नहीं हो सके. लेकिन गुलज़ार ने इस उत्सव को अपनी मौजूदगी से बांधे रखा.

गुलज़ार ने इंसान और किताबों के रिश्तों को बहुत ही ख़ूबसूरती से अपनी कविता में जगह दी और इसका पाठ किया तो लोगो ने बहुत ही मनोयोग से सुना.

गुलज़ार ने बहुत ही दार्शनिक अंदाज़ में ज़िंदगी के अलग-अलग रंगों को पेश किया. लेकिन उन्हें भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के दर्द को एक कविता में पिरोने पर बहुत तारीफ़ मिली.

उन्होंने अपनी कविता में कहा- मेरे सामने वाले घर में रोशनी जलती है. मेरे कमरे की दीवार पर उस घर की परछाई चलती रहती है. ऐसा लगता है दोनों घरों को आग लगी है.

गुलज़ार को इस कविता पर बहुत दाद मिली. गुलज़ार कहने लगे जैसा समाज होता है वैसा ही सिनेमा और साहित्य होता है. उन्होंने भारत और पाकिस्तान में दोस्ती की वकालत की.

कूटनीति की दुनिया से परे भारत में अमरीका के राजदूत रोमर भी इस मेले में पहुंचे. वे राजनय के माहिर होंगे. पर वो किताबो की ताक़त को सलाम करते हैं.

रोमर ने बीबीसी से कहा -अमरीका या भारत के राजदूत लोगों तक बहुत कामयाबी के साथ पहुँच सकते है. लेकिन जो किताबो में ताक़त है उसका कोई मुक़ाबला नहीं है. मेरी नज़र में किताबों से बड़ा कोई राजदूत नहीं हो सकता जो लोगो को क़रीब लाने में गजब की ताक़त रखती है.

दलित साहित्य को मौक़ा

ये पहला मौक़ा है जब दुनिया के साहित्यकार जिस मंच पर जमा हुए, उसने दलित साहित्य की महत्ता को पहचाना और शिरकत का मौक़ा दिया.

जाने-माने दलित साहित्यकार कांचा कहते हैं- ये पहला मौक़ा है, जब एक बड़े आयोजन में दलित साहित्य को शामिल किया गया है. अब कोई भी दलित साहित्य की उपेक्षा नहीं कर सकता है. दलित साहित्य का अपना प्रभाव बढ़ा है. मुख्यधारा का साहित्य अब दलित साहित्य की अनदेखी नहीं कर सकता है.

कांचा इसे साहित्य के इतिहास में एक बड़े बदलाव के रूप में दर्ज करते हैं.

उन्होंने कहा, ''इस बदलाव को मुख्यधारा में लाना है. दलित साहित्य बुनियादी साहित्य है. दलित साहित्य उत्पादन पर आधारित है, जबकि मुख्यधारा का साहित्य बाज़ार और वितरण पर आधारित है."

कांचा कहते हैं कि आज़ादी बाद का साहित्य बराबरी का भाव नहीं ला सका है. जबकि दलित साहित्य इसी की बात कहता है.

इस उत्सव में पाकिस्तान से भी अदब की दुनिया के लोग आए हैं. उनमें से एक अली सेठी कहते हैं दोनों मुल्कों की अवाम दोस्ती की इच्छा रखती है.

उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से दोस्ती की राह मज़बूत होती है. इस समारोह के आयोजकों को भरोसा है कि ऐसे कार्यकमों से एक बेहतर समाज बनाया जा सकता है. क्योंकि कोई भी समाज शस्त्रों से नहीं शास्त्रों से मज़बूत बनता है.

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