एक महान योद्धा की गुमनाम मौत

  • 26 जनवरी 2010
लिली चक्रवर्ती
Image caption गुमनाम ज़िंदगी और गुमनाम मौत, यही है स्वतंत्रता सेनानी की कहानी

पूरा भारत जब गणतंत्र की 61वीं सालगिरह मना रहा है, कोडरमा ज़िले के झुमरी तलैया में सुभाष यादव के घर मातम छाया है.

सुभाष यादव और उनके परिवार के लोग बड़ी माँ और दादू की यादें संजोए उस कमरे में बैठे हैं जहाँ पर बड़ी माँ यानी लिली चक्रवर्ती नें 96 वर्ष की उम्र में तीन जनवरी को इस दुनिया को अलविदा कह दिया है.

अविभाजित भारत की आज़ादी की इस योद्धा की ज़िंदगी तो गुमनामी में गुज़री ही, उनकी मौत भी गुमनाम ही रह गई.

चार जनवरी को जब लिली चक्रवर्ती का अंतिम संस्कार झुमरी तलैया में किया जा रहा था, उसी दिन झारखंड विधानसभा में एक शोक प्रस्ताव पारित किया जा रहा था. मगर उस शोक प्रस्ताव में लिली चक्रवर्ती का नाम कहीं नहीं था.

उनकी क़ुर्बानी को ना सिर्फ़ झारखंड में भुला दिया गया बल्कि देश के किसी कोने से भी उनकी मौत पर किसी नेता का कोई शोक संदेश नहीं आया.

यह अनकही कहानी है एक ऐसे दंपत्ति की जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी ज़िंदगी की बाज़ी लगा दी और दशकों तक उन्हें जेल की सलाखों के पीछे यातनाएँ सहनी पड़ीं.

लिली चक्रवर्ती का संग्राम 1931 में उनकी शादी के महज़ सात दिनों के अंदर शुरू हो गया था जब उन्होंने अपने शादी के गहनों को एक तरफ़ समेट दिया था और भारत की आज़ादी के आंदोलन की मशाल अपने हाथों में थाम ली थी.

क्रांतिकारी गतिविधियाँ

शादी के सातवें दिन ही उनके पति हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती को ब्रितानी सरकार नें 'अथ्राबाड़ी मेल ऐक्शन' कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया था.

हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती कई साल तक देश की विभिन्न जेलों में बंद रहे. फिर उन्हें कालापानी की सज़ा सुना दी गई और अंडमान स्थित सेलुलर जेल भेज दिया गया.

पति के जेल जाते ही लिली चक्रवर्ती ने क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और 1941 में उन्हें बांग्लादेश के चटगाँव में हुए शस्त्रागार लूट कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उनकी गिरफ़्तारी के छह साल बाद भारत को आज़ादी मिली मगर लिली चक्रवर्ती को नहीं.

वो 1952 तक बांग्लादेश की बोरिशाल जेल में क़ैद रहीं. भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की पहल पर लिली चक्रवर्ती को बांग्लादेश की जेल से रिहा किया गया.

लिली चक्रवर्ती की रिहाई के बाद हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती और लिली चक्रवर्ती अविभाजित बिहार के झुमरी तलैया में आकर बस गए. चूँकि जेल में हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती को काफी यातनाएँ झेलनी पड़ी थीं, वह यहां आते ही फ़ालिज का शिकार हो गए.

अब आजीविका हासिल करने की सारी ज़िम्मेदारी लिली के कंधों पर आ गई और उन्होंने स्कूल में पढ़ा कर अपना और अपने पति का पेट पाला. 1986 में हेमेन्द्रनाथ चक्रवर्ती (दादू) का निधन हो गया.

लिली के सेवक सुभाष का कहना है, "उस समय पश्चिम बंगाल की सरकार ने अपने राज्य में दादू के सम्मान में तीन दिनों का राजकीय शोक रखा मगर अविभाजित बिहार का हिस्सा रहे कोडरमा में दादू की मौत उसी तरह गुमनाम रह गई जिस तरह उनकी ज़िन्दगी. 24 सालों के बाद लिली चक्रवर्ती का भी यही हश्र हुआ- गुमनाम ज़िन्दगी और गुमनाम मौत. शायद आज़ादी के योद्धाओं को आज़ाद भारत के नागरिकों के पास देने के लिए अब सिर्फ़ यही बचा है."

किसी ने सुध न ली

कोडरमा के रंगकर्मी विनोद विश्वकर्मा कहते हैं, "मुझे दुख है कि लिली चक्रवर्ती के निधन के बाद मैंने राज्य सरकार के अधिकारियों से संपर्क किया और उनसे अनुरोध किया कि स्वतंत्रता संग्राम की इस महान योद्धा का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाए. सरकार के अलावा मैंने कोडरमा के सांसद बाबूलाल मरांडी से भी संपर्क कर लिली चक्रवर्ती के निधन के बारे में बताया. मगर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. न सरकार और न ही स्थानीय सांसद - किसी नें उनकी मौत पर शोक भी प्रकट नहीं किया.''

Image caption कुछ लोगों को शायद यह भी न मिला हो

लिली चक्रवर्ती की ज़िन्दगी तो क्रांति को समर्पित थी ही, उनकी मौत भी कम क्रांतिकारी नहीं थी. चूँकि उनकी अपनी कोई औलाद नहीं थी उन्होंने अपने एक भांजे को गोद लिया था मगर वह भी उनका न हो सका.

उन्होंने अपने जीते जी यह वसीयत कर दी थी कि उन्हें मुखाग्नि उनकी सेवा करने वाले सुभाष यादव ही देंगे. और हुआ भी ऐसा ही. सुभाष यादव ने उनकी सेवा तो की ही और एक पुत्र की भूमिका भी निभाई.

सुभाष यादव कहते हैं, "सिर्फ उनकी मौत ही नहीं, ज़िन्दगी भी गुमनाम रह गई. इतने वर्षों में उनसे मिलने ना तो कोई सरकारी अधिकारी आया न ही कोई नेता. वह बहुत बीमार भी रहती थीं मगर कोई उनका हाल पूछने कभी नहीं आया."

उपभोगतावाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की पहचान जहां उनके विचारों से नहीं बल्कि 'गांधीगिरी' से हो रही है वहां हेमेंद्रनाथ चक्रवर्ती और लिली चक्रवर्ती के प्रति राज्य का रवैया किसी से छुपा नहीं है.

उनकी क़ुर्बानियों के प्रति आभारी होना तो दूर, राज्य ने कोडरमा के प्रखंड कार्यालय पर एक शिलापट लगाया है जिस पर कुछ स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं, मगर इस शिलापट पर भी इन दोनों का नाम नहीं.

स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे योद्धा या तो अब इस दुनिया में नहीं होंगे और अगर होंगे भी तो सिर्फ़ एक आध ही.

लिली चक्रवर्ती तो कम से कम इस मायने में भाग्यशाली रहीं कि उन्हें सुभाष यादव जैसा बेटा मिल गया जिसने उनके बुढ़ापे में उनकी सेवा की. पता नहीं कुछ एक जीवित स्वतंत्रता सेनानी इतने भाग्यशाली होंगे या नहीं!

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