उड़ीसा में जंगल बचाने की लड़ाई

  • 28 जनवरी 2010
एक पेड़ॉ से चिपके विश्वनात बरद
Image caption उड़ीसा के नयागढ़ में जंगलों को बचाने का यह आंदोलन 1982 से चल रहा है.

उड़ीसा के नयागढ़ ज़िले के केशरपुर गाँव के पास बिंझागिरी पहाड़ को अपने आँखों के सामने वृक्ष शून्य होते देख स्थानीय स्कूल के एक शिक्षक के मन में इतना गहरा असर हुआ कि उसके बाद से उन्होंने जंगलों की सुरक्षा को ही अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लिया.

क़रीब 40 साल पहले बिंझागिरी पहाड़ की दुर्दशा ने जोगीनाथ साहू उर्फ़ 'जोगी सर' के मन में जंगल सुरक्षा का जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल पेड़ बन गया है और ज़िले के आठ सौ से अधिक गांवों को अपने हरे आगोश में ले लिया है. इस मुहिम में 'जोगी सर' के साथ स्थानीय किसान उदयनाथ खटाई और उत्कल विश्वविद्यालय के एक युवा प्रोफ़ेसर नारायण हजारी भी साथ हैं.

उत्तराखंड के पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा से प्रेरित होकर इन तीनों ने नयागढ़ जिले में ‘चिपको आन्दोलन’ का स्थानीय संस्करण शुरू किया.

स्थानीय लोगों ने पेड़ों से चिपकने से लेकर पेड़ काटने वालों के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने और उनके गाँव के बीचों बीच सो जाने जैसे शांतिपूर्ण हथकंडे का इस्तेमाल किया जिससे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई बंद की जा सके.

जंगल सुरक्षा के लिए 'जोगी सर' और उनके सहयोगियों की बात धीरे-धीरे आसपास के गांवों में फैलने लगी.

इन तीनों की अगुवाई में 1982 में जब "वृक्ष ओ जिबर बंधू परिषद’’ का गठन हुआ, तब तक 22 गांवों के लोग इस मुहिम में शामिल हो चुके थे. परिषद के गठन के बाद आन्दोलन और व्यापक हुआ. जंगल सुरक्षा के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए गांवों में, स्कूलों में, चौराहों पर सभाओं का आयोजन किया गया. जंगल ख़त्म होने के दूरगामी परिणाम के बारे में सैंकड़ों पोस्टकार्ड भेजे गए. शीघ्र ही पेड़ों की सुरक्षा के लिए लोगों ने कमर कसना शुरू किया. जंगल की सुरक्षा के लिए महासंघ ने एक नायाब तरीका अपनाया जो "ठेंगा पाली" के नाम से प्रसिद्ध है. उड़िया में 'ठेंगा' का मतलब है लाठी और 'पाली' का अर्थ बारी. इस व्यवस्था में हर रोज़ गांव के उन दो आदमियों के घर के सामने एक-एक लाठी रख दी जाती है, जिसकी उस दिन जंगल की रखवाली करने की बारी होती है. इन दो घरों के दो पुरुष सदस्य दिन भर जंगल की रखवाली करते हैं और फिर अपनी-अपनी लाठियाँ उन दो घरों के सामने रख देते हैं, जिनकी अगले दिन रखवाली करने की बारी होती है.

Image caption जंगल की रखवाली के लिए गाँवों में लोगों की अलग-अलग ड्यूटी लगाई जाती है.

नयागढ़ के ज़्यादातर गांवों में जंगल की सुरक्षा के लिए अब बाकायदा चौकीदार नियुक्त कर दिए गए हैं, लेकिन कोसका जैसे कुछ गांवों के लोग आज भी उसी 'ठेंगा पाली' को अपनाए हुए हैं, जो एक तरह से नयागढ़ जंगल सुरक्षा आन्दोलन की पहचान बन गई है. सवाल उठता है कि जब कोई आदमी जंगल से पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है, तब क्या होता है?

हातिमुंदा आंचलिक जंगल सुरक्षा समिति के स्थानीय प्रभारी विश्वनाथ बराड़ कहते हैं, ‘‘वैसे तो आज कल इसकी नौबत बहुत कम आती है लेकिन अगर मान लीजिए कोई चोरी करते हुए पकड़ा जाता है, तो उसकी कोई निर्धारित सज़ा नहीं है. उसकी सज़ा उसकी ग़लती की गंभीरता और कई अन्य चीज़ों पर भी निर्भर करती है. पहली और छोटी ग़लती के लिए माफ़ भी कर दिया जाता है. लेकिन अगर कोई बार-बार गलती करे तो उसके हाथ में जो भी हथियार होता है उसे ज़ब्त कर लिया जाता है या फिर उस पर जुर्माना लगाया जाता है.''

उन्होंने बताया कि कभी-कभी जिस गाँव का वह आदमी है, उस गाँव की समिति के पास शिकायत दर्ज कराई जाती है. आंदोलन के शुरुआती दिनों में यह कोई आसान काम नहीं था. आंदोलनकारियों को न केवल लकड़ी माफ़िया का बल्कि जंगल विभाग, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के रोष का भी सामना करना पड़ा.

संघर्ष के उन दिनों को याद करते हुए नयागढ़ जंगल सुरक्षा महासंघ के उपाध्यक्ष और इसकी महिला शाखा की प्रमुख रेनुबाला प्रधान कहती हैं,‘‘एक बार हमें थाने से बुलावा आया. थाना बाबू ने हमें कहा, तुम लोग अपने बगीचे की सब्ज़ियों की रखवाली करो. सरकारी संपत्ति की रखवाली करने की इजाज़त किसने दी? हमने कहा, 10 साल से हम जंगल की सुरक्षा कर रहे हैं. इस दौरान जंगल से अगर किसी ने एक दातून भी चुराया, तो हमने उसकी खबर ली और आज जब हमारी मेहनत रंग लाई है और नंगा पर्वत हरा, भरा हो गया है, तो आप कह रहें हैं हम इसे सरकार को दे दें. सरकार है कौन ?" 'जोगी सर' मानते हैं की रेनुबाला प्रधान और उनकी जैसी हज़ारों महिलाएँ और पुरुष वह काम करते हैं जो जंगल विभाग को करना चाहिए. " ये लोग सही मायनों में फ़ॉरेस्टर हैं. उनके पास न वेतन है और न वर्दी, न गाड़ी है न बंदूक फिर भी ये लोग हज़ारों एकड़ ज़मीन पर फैले जंगल की सुरक्षा कर रहें हैं. नयागढ़ ज़िले में आप देखेंगे की जहाँ नंगे पहाड़ हैं, वहाँ सरकार रखवाली कर रही है और जहाँ हरियाली ही हरियाली है, वहाँ लोग पहरे दे रहें हैं." नयागढ़ जंगल सुरक्षा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह किसी बाहरी सहायता, सरकारी या ग़ैर सरकारी, का मोहताज़ नहीं है. आश्चर्य कि बात है कि लगभग 65 हज़ार परिवारों की सदस्यता की बदौलत करीब ढाई लाख एकड़ जंगल कि सुरक्षा कर रहा महासंघ अभी तक एक पंजीकृत संगठन नहीं है.

Image caption बिंझागिरी पहाड़ की दुर्दशा देख जोगी सर ने यह आंदोलन शुरू किया था.

महासंघ का हर सदस्य परिवार जंगल सुरक्षा के लिए सालाना चार रुपए का चंदा देता है महासंघ को कुछ पैसे जुर्माने के रूप में भी मिल जाते हैं. हालाँकि महासंघ को अपनी मुहिम चलाने के लिए पहले ऑक्सफ़ेम और फिर भुवनेश्वर स्थित 'रिजीनल सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट कोऑपरेशन' (आरसीडीसी) से कुछ सहायता ज़रूर मिली.

आरसीडीसी के निदेशक कैलाशचंद्र दास कहते हैं कि यह सहायता "आर्थिक कम और नैतिक ज्यादा है". महासंघ के अध्यक्ष पूर्ण चंद्र महापात्र, जो 'जोगी सर' की तरह एक शिक्षक रह चुके हैं, बताते हैं, ‘‘आर्थिक सहायता न लेने का निर्णय काफ़ी सोच विचार के बाद लिया गया था. जब हमारे पास जंगल जैसी अपार संपत्ति है तो फिर हमें किसी से सहायता लेने की क्या ज़रूरत है." चढ़ईआपल्ली जंगल सुरक्षा समिति के बही खाते देखने पर महापात्र के इस वक्तव्य का मतलब समझ मेंआता है. वनजात द्रव्यों कि बिक्री, आम के बागानों और जंगल के अन्दर खोदे गए तालाबों की निलामी, जुर्माने के रूप में मिले पैसों और सालाना चंदे से समिति ने 2005 में 2,13,331 रुपए 2006 में 2,77,755 और 2007 में 2,55,605 रुपए कमाए. इन पैसों का इस्तेमाल गाँव के विकास के कामों में किया गया.

महासंघ के अध्यक्ष पूर्णचंद्र महापात्र कहते हैं, ‘‘जंगल विभाग का नारा है 'राधे राधे, आपके आधे हमारे आधे' लेकिन हमारा नारा है 'हमारा जंगल सिर्फ़ हमारा है'. जल, जंगल और ज़मीन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. हम इसमें से किसी को हिस्सा नहीं देंगे".

महासंघ के रवैये को लेकर राज्य का जंगल विभाग असमंजस में है. सच पूछा जाए तो क़ानूनी तौर पर यह नाजायज़ नहीं है, क्योंकि गाँव के सामूहिक संसाधनों के प्रबंध का उत्तरदायित्व संविधान ने वाकई ग्राम सभा और पंचायतों को दे रखा है. जंगल विभाग एक तरफ जहाँ महासंघ की बुराई नहीं करना चाहता, वहीं वह महासंघ के काम करने के तरीक़े से, जिसने विभाग को एक तरह से निरस्त कर दिया है, बेहद नाराज़ है. उड़ीसा के प्रिंसिपल चीफ़ कंज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट यानि मुख्य वनपाल सुरेश चंद्र मोहंती की बातों में भी यही असमंजस साफ़ था.

उन्होंने नयागढ़ आंदोलन की तारीफ़ तो की लेकिन साथ में यह भी कहा, "उन्होंने अपना एक अलग ही ढांचा बनाया है जो सरकारी ढांचे से बिल्कुल अलग है. कुछ लोगों को मानना है कि महासंघ सभी वर्गों के लोगों की साझेदारी का पूरा ख्याल नहीं रखता और लिंग से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं है.’’ लेकिन आरसीडीसी के निदेशक कैलाश दास इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘‘यह कहना बिल्कुल ग़लत है कि महासंघ में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता या फायदा नहीं मिलता. जहाँ तक लैंगिक मुद्दों का सवाल है नयागढ़ में महिलाएँ जंगल सुरक्षा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेतीं हैं.’’ महासंघ का मानना है कि वन विभाग संयुक्त जंगल प्रबंध के ज़रिए वन संरक्षण समितियों को सरकारी पैसों का लालच देकर महासंघ और लोगों की एकता को तोड़ना चाहता है जिससे कि विभाग की सत्ता एक बार फिर बहाल हो सके. दूसरी तरफ वन विभाग समझता है कि महासंघ एक समांनांतर जंगल विभाग चला रहा है. दोनों पक्षों के बीच अस्मिता की यह लड़ाई तब से चल रही है जब से नयागढ़ में जंगल सुरक्षा आंदोलन की नींव रखी गई थी. ज़ाहिर है यह लड़ाई आगे भी चलेगी. लेकिन अभी तक के स्कोर से लगता है कि आखिरकार जीत लोगों की ही होगी.

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