शिवसेना और भाजपा के बदलते रिश्ते

  • 2 फरवरी 2010
गोपीनाथ मुंडे और उद्धव ठाकरे
Image caption महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन पर संकट माना जा रहा है

लोग भूले नहीं होंगे, 1977 की चर्चित टिप्पणी को. जनता पार्टी सरकार के सूचना- प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संवाद माध्यमों पर तीखा कटाक्ष किया था.

सत्ता ने झुकने को कहा था परंतु अधिकांश अख़बार और पत्रकार साष्टांग दंडवत करने लगे.

मिली जुली सरकार में सहयोगी दल को साथ रखने के लिए सबसे बडे़ राजनीतिक दल भी यही कुछ करते रहे हैं.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इतना दावा कर सकते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद के दबाव के बावजूद अयोध्या में मंदिर नहीं बनने दिया.

इसके बावजूद एक अपमानजनक घटना को न तो अटल बिहारी वाजपेयी ख़ुद भूलेंगे और न ही उनके संकटमोचक.

शिवसेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री की मनुहार को नकारते हुए सुरेश प्रभु का पहले मंत्रालय बदला और फिर उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया.

प्रभु बिजली मंत्रालय में छाप बना रहे थे. महाराष्ट्र के कांग्रेसी मंत्री केपीए सुबोध मोहिते शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शरण में पहुंच कर लोकसभा सदस्य बने.

ठाकरे ने मोहिते को प्रभु का मंत्रालय थमा दिया. आडवाणी और प्रमोद महाजन ठाकरे को मना नहीं सके.

यहां तक कि प्रभु को बिजली मंत्रालय की सहायता के लिए अलग प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव ठाकरे ने ठुकरा दिया.

क्रिकेट मैच रोकने के लिए वाजपेयी सरकार में शिवसैनिकों ने पिच खोद डाली. जवाहर लाल नेहरू की उदारवादी कार्बन कॉपी बनने के लिए आतुर वाजपेयी असहाय थे.

दरअसल वाजपेयी ने तो शिवसेना से गठबंधन का प्रस्ताव ही विवशता में स्वीकार किया था.

देश भर में मात्र दो लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव जीतने के कारण भाजपा का चेहरा उतरा हुआ था.

उन दिनों उग्र हिन्दुत्ववादी मेक अप जमाने के लिए शिवसेना नाम का सिंदूर पूरे मुंह पर चुपड़ा था.

शिवसेना ने पहले दिन साफ़ कर दिया था कि बाल ठाकरे ही नेता हैं, वे ही नीति और संविधान हैं और तालमेल उनकी मर्ज़ी पर निर्भर रहेगा.

प्रमोद महाजन दो दशक तक शिवसेना प्रमुख को पुचकारने और उनकी शर्तें पूरी करने में जुटे रहे. उनके जाने के बाद नासूर फूट पड़ा.

ताज़ा घटनाक्रम

कुछ महीने पुरानी बात है. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान बार बार ख़बर आ रही थी कि भाजपा के प्रदेश नेता नितिन गडकरी और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के बीच सीटों की खींचतान के ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं.

Image caption भाजपा शिव सेना के उग्र तेवरों का विरोध कर रही है

महाराष्ट्र विधानसभा में वर्ष 2009 तक नेता प्रतिपक्ष रामदास कदम को उम्मीदवारी दिलाने के लिए गुहागर विधानसभा क्षेत्र के विद्यमान भाजपा विधायक नातू का पत्ता काट दिया गया.

बग़ावत कर नातू निर्दलीय चुनाव लड़े. दोनों हारे. कदम को शिवसेना विधान परिषद में जिता कर ले आई.

कदम की सबसे बड़ी पात्रता यह है कि वे कोंकण अंचल की राजनीति में नारायण राणे के विरोधी हैं.

शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में पहुंचकर राणे कांग्रेस सरकार में मंत्री बने थे. लेकिन असहाय थे.

कदम के विधान परिषद में चुनकर आने के बाद भाजपा इतना ही कर सकती थी कि बाग़ी नातू को वापस पार्टी में शामिल कर ले.

इस तरह के उदाहरण दोनों तरफ उबलती गिला की गरमी का अहसास करा देते हैं.

देश की सरकार चलाने और प्रदेश में सरकार बनाने के जतन करते वक्त भाजपा ने अनेक बार दुत्कार सही.

वोट बैंक की पिटाई पर मुंह बंद रखा. लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुंबई में जिन्हें चुनाव में उतारा, उनमें से ज़्यादातर गुजराती, राजस्थानी एवं अन्य हिन्दी भाषी उम्मीदवार मुंबई में धराशायी हुए.

दूसरी ओर शिव सेना ने जिन लोगों को राज्यसभा में भेजा, उन पर गौर कीजिए-चंद्रिका केनया, मुकेश पटेल, प्रीतिश नंदी, संजय निरुपम और राजकुमार धूत.

बिहार का असर

सवाल यह है कि बिहार विधानसभा चुनाव निकट न होते तो क्या भाजपा का मौन क़ायम रहता?

Image caption नए भाजपा अध्यक्ष गडकरी महाराष्ट्र से हैं और उनके आने के बाद बदलाव की उम्मीद की जा रही थी

सवाल यह भी है कि 2014 में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बाल ठाकरे नाम की कोई शक्ति रहेगी या नहीं?

भाजपा ने इन सवालों पर गहराई से विचार किया. भाजपा से अधिक विचार- मंथन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किया.

वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि चार बरस बाद लालकृष्ण आडवाणी और बाल ठाकरे के नाम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता.

यह अवसर है जब ठाकरे परिवार उग्रता की होड़ में भिड़ा है.

शिवसेना के कार्यकारी उद्धव ठाकरे के हिमायती दावा करते हैं कि वे ईमानदार और उदारवादी हैं.

राज ठाकरे से आगे निकलने के लिए उन्हें उत्तर भारतीय और हिंदी भाषी विरोधी तेवर अपनाने पड़े.

मुंबई की सड़कों पर इस कलह का नतीजा दिख सकता है. भाजपा के पास इससे अच्छा अवसर नहीं था, शिवसेना से पिंड छुडा़ने का.

भाजपा बाज वक़्त पाकिस्तान और अल्पसंख्यक विरोधी बयानबाज़ी कर पुरानी छवि क़ायम रखना चाहेगी.

महाराष्ट्र वापसी की उम्मीद दूर दूर तक नहीं है.

राष्ट्र में खोते अस्तित्व को बचाने का अवसर तो है ही, भाजपा को लगता है कि बाकी सहयोगी दलों को छिटकने से रोका जा सकेगा.

( लेखक दैनिक भास्कर, नागपुर के संपादक हैं)

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