राजनीतिक वसंत की तलाश

राहुल गांधी
Image caption राहुल गांधी की यात्रा को लेकर कांग्रेसियों में काफ़ी उत्साह है

बिहार में लगभग 20 वर्षों का पतझड़ झेल चुकी कांग्रेस अब राहुल गाँधी के बूते यहाँ अपना राजनीतिक वसंत लाना चाहती है. राज्य में दो दिनों (1-2 फरवरी) के राहुल-भ्रमण को लेकर उस युवा-वर्ग में रुझान ज़्यादा है, जो लालू-नीतीश राज से निराश और संभावना पूर्ण विकल्प की तलाश में है. बिहार में लंबे समय से मृतप्राय कांग्रेस के पास कोई ऐसा प्रभावी प्रादेशिक नेता रहा नहीं, जो यहाँ पार्टी को फिर से जीवंत बनाने जैसी मुहिम का सूत्रधार बन सके.

इसलिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी इस राज्य में जारी युवा कांग्रेस सदस्यता-अभियान के समय संगठन में जान डालने पहुँच गए हैं.

चंपारण से सोमवार को शुरू हुई उनकी यह बिहार-यात्रा दरभंगा, गया, पटना और भागलपुर होते हुए किशनगंज में मंगलवार को संपन्न होगी. इस दौरान राहुल गांधी का मिथिला विश्व विद्यालय, पटना वीमेंस कॉलेज और लोयला इंटर स्कूल के छात्र-छात्राओं से मिलना और उनसे सीधे संवाद क़ायम करना यहाँ चर्चा का विषय बना हुआ है.

जोड़ने की कोशिश

दूसरी तरफ उन्होंने राज्य के दलित, मुस्लिम और अन्य कमज़ोर तबके के युवाओं से आमने-सामने बातचीत जैसे कार्यक्रम को अपनी इस यात्रा से जोड़ा है.

इस पूरे आयोजन को कांग्रेसियों ने बिहार में अपना राजनीतिक महोत्सव वाला रूप देने की हर संभव कोशिश की है. इसके लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू कर दी गई थी.

'राहुल ब्रिगेड' क्या चीज़ है, इसका नज़ारा बिहार में पहली बार दिखा है. केंद्र सरकार में पार्टी के सभी युवा मंत्री, युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के तमाम नेता और संगठन पदाधिकारी- सभी इस मौक़े पर उतर आए. ऐसा लगने लगा जैसे 'बाबा नाम केवलम' की तर्ज़ पर 'राहुल नाम केवलम' वाला जोश और जुनून पैदा करने में राहुल ब्रिगेड ने पूरी ताक़त लगा दी हो.

लाभ

वैसे, इसका लाभ ये हुआ है कि ना सिर्फ़ आम चर्चा में बल्कि राज्य की राजनीतिक मुख्यधारा में भी कांग्रेस का फिर से प्रवेश होता हुआ दिखने लगा है.

Image caption कांग्रेस को राहुल से बहुत उम्मीद है

पुराने पड़ चुके या निष्क्रिय हो चुके यहाँ के कांग्रेसी नेताओं में वो कूवत रही नहीं, जिसके बूते यहाँ लालू यादव या नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूम रही राजनीति का रुख़ कांग्रेस की तरफ़ मोड़ा जा सके. इसलिए प्रेक्षक मानते हैं कि असरदार प्रादेशिक नेतृत्व वाले किसी नेता के बिना बिहार में कांग्रेस का सत्तासीन होना बेहद मुश्किल है.

और इस मुश्किल का हल आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ढूंढ लेना राहुल गांधी के लिए भी आसान नहीं है.

हाँ, इतना ज़रूर हुआ है कि चाहे राज्य का सत्ताधारी जदयू-भाजपा गठबंधन हो या विपक्षी लालू-रामविलास गठजोड़, दोनों ही खेमों में कांग्रेसी सेंध लग जाने जैसी चिंता बढी है.

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