समाजवादी पार्टी से अमर सिंह का जाना

अमर सिंह
Image caption सपा की राजनीति में अमर सिंह अचानक काफ़ी महत्वपूर्ण हो गए थे

तकरीबन डेढ़ महीने तक चले सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह से छुटकारा पाना ही बेहतर समझा.

इसमें संदेह नहीं कि इस पूरे समय में मुलायम सिंह ने काफी संयम से काम लिया. अमर सिंह ने इस बीच जो आरोप लगाए, उसमें उन्होंने उनके परिवार के साथ उन्हें भी नहीं बख्शा था.

ये आरोप उन्होंने मौजूदा विवाद के पहले से ही लगाना शुरू कर दिया था. पहले कल्याण सिंह को पार्टी में लाने और फिर बाहर करने की कार्रवाई को परोक्ष तौर पर मुलायम सिंह की ग़लती बताया.

नवंबर, 2009 में फिरोज़ाबाद उपचुनाव में सपा की हुई हार को लेकर भी उन्होंने यही रुख़ अपनाया और कहा कि अतिविश्वास सपा को ले डूबा. इस चुनाव में मुलायम सिंह ने अपनी बहू डिंपल को टिकट दिया था.

तीन दिन पहले सपा प्रवक्ता मोहन सिंह ने जब अमर सिंह से राज्यसभा से इस्तीफ़ा देने की मांग की तो अमर सिंह ने चुनौती दी कि कन्नौज या बदायूं की सीट सपा खाली करे, वो वहां से चुनाव लड़ कर दिखाते हैं कि कौन जीतता है.

कन्नौज से मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश सिंह और बदायूं से उनके भतीजे धर्मेंद्र लोक सभा सदस्य हैं.

पर इस पूरे मामले में अमर सिंह के ख़िलाफ़ मुलायम सिंह ने अभी तक एक शब्द नहीं कहा. मीडिया के पूछे सवालों पर दो दिन पहले तक यह कहते रहे कि समाजवादी परिवार का यह भीतरी मामला है, बातचीत से सुलझा लिया जाएगा.

इसके पहले अमर सिंह के भेजे गए इस्तीफ़े को क़रीब 10 दिन तक मंज़ूर नहीं किया गया. मुलायम के इस नरम रुख़ और अमर सिंह के इस आक्रामक रुख़ को लेकर कई तरह की व्याख्या है.

बहरहाल राजनीतिक दायरे में मौजूदा सवाल जो पूछा जा रहा है वह यही है कि अमर सिंह के जाने से समाजवादी पार्टी पर क्या असर पड़ेगा. पार्टी कमज़ोर होगी या फिर क़रीब एक दशक तक पूंजीवादी संस्कृति से प्रभावित सपा उससे मुक्त होने के बाद नए सिरे से अपने को संगठित करेगी.

पार्टी पर असर

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में जो जड़ें जमाईं, उसमें अमर सिंह का कोई योगदान नहीं है. अमर सिंह के पार्टी में आने से पहले सपा दो बार वहां सत्ता में आ चुकी थी.

Image caption किसी वक्त अमर सिंह मुलायम के सबसे खास हुआ करते थे

मुलायम सिंह 1989 और 1993 में प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. केंद्र में जब संयुक्त मोर्चा की सरकार आई तो सपा लोकसभा में अपने सदस्यों की वजह से गठबंधन में एक प्रमुख घटक दल थी और इस ताकत की वजह से ही मुलायम सिंह रक्षा मंत्री बने.

यहां तक की देवगौड़ा के बाद अगले प्रधानमंत्री की खोज शुरू हुई तो मुलायम सिंह भी एक उम्मीदवार के रूप में थे. उस समय अमर सिंह को पार्टी में आए कुछ ही महीने हुए थे.

सपा ने यह मज़बूती समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे नेताओं और मुलायम सिंह की मेहनत से पाई थी.

चौधरी चरण सिंह ने प्रदेश में कांग्रेस विरोधी जिस सामाजिक समीकरण अजगर को एकजुट किया था, उसमें यादवों के नेता मुलायम सिंह तो बने ही साथ में अन्य पिछड़ी जातियों और मुस्लिम मतों के एक हिस्से को मिला कर उन्होंने एक ठोस वोट बैंक तैयार किया था.

पर संयुक्त मोर्चा सरकार के बाद सपा की राजनीति में अमर सिंह अचानक काफ़ी महत्वपूर्ण हो गए.

इतना महत्वपूर्ण हो गए कि सपा में मुलायम सिंह लंबे समय से जुड़े जनेश्वर मिश्र, रामाश्रय कुशवाहा, बेनी प्रसाद और मोहन सिंह जैसे नेता अपने को पार्टी में उपेक्षित महसूस करने लगे.

इन जैसे नेताओं की मजबूरी यह थी कि वे ज़िन्दगीभर कांग्रेस विरोधी, सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति करते रहे और वे बसपा में जा नहीं सकते थे.

पार्टी में योगदान

अमर सिंह का पार्टी के लिए जो योगदान था, वह केवल इतना ही था कि उन्होंने पार्टी के लिए न केवल पूंजी जुटाई बल्कि पूंजीपतियों को भी पार्टी के संपर्क में लाए.

सपा में उन्हें वह ताकत मिल गई जिसके बारे में छोटे लोहिया और मुलायम सिंह के साथ लंबे समय से जुड़े बेनी प्रसाद जैसे नेताओं ने कभी सोचा नहीं था.

सपा को इसका खामियाज़ा भी उठाना पड़ा. बेनी प्रसाद गए, आज़म खान गए, राज बब्बर गए. ये और इनके जैसे दूसरे, पार्टी से मुलायम की वजह से नहीं गए, अमर सिंह की वजह से गए.

इनकी जगह फ़िल्म स्टार पार्टी में लाए गए. गरीबगुरबों के नाम से आंदोलन करने वाली पार्टी ग्लैमरस बन गई.

पिछली लोकसभा चुनाव में जयाप्रदा की वजह से ही आज़म खान को पार्टी से जाना पड़ा था. अमर सिंह जयाप्रदा के टिकट पर अड़ गए थे.

इसलिए जयाप्रदा ने शनिवार को अमर सिंह के लिए जब प्रेस कांफ्रेंस की तो किसी को ताज्जुब नहीं हुआ. आंध्र में चन्द्रबाबू नायडू की उपेक्षा के बाद उन्हें अमर सिंह की वजह से उत्तर प्रदेश में सपा का टिकट मिला था.

ज़ाहिर है अमर सिंह के बाद पार्टी में उनको अब कोई पूछने वाला नहीं था.

सपा को अमर सिंह के बयानों से भी नुक़सान पहुंचा. सपा ने शनिवार को इस बारे में कई तथ्य सामने भी लाए हैं.

अमर सिंह का सपा, प्रदेश और देश की राजनीति में जो प्रभाव था, वह मुलायम सिंह की वजह से था.

राजनीति में ताकत उसी समय होती है जब किसी के पास या उसके पीछे वोट का कोई आधार होता है.

ऐसा नहीं है कि अमर सिंह ने इस बीच यह आधार बनाने की कोशिश नहीं की. राजपूतों का नेता बनने का प्रयास किया और मुलायम सिंह ने इसके लिए हरी झंडी भी दी थी.

पर प्रदेश में चंद्रशेखर और वीपी सिंह राजपूतों के कभी सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए. वैसे अमर सिंह के बाद उनकी जगह मोहन सिंह को जिस तरह दी गई है, उससे लगता है कि मुलायम सिंह ने इस पहलू को भी ध्यान में रखा है.

अमर सिंह पर सपा की तरफ से लगातार हमला कर रहे मोहन सिंह पूर्वांचल के ही राजूपत हैं.

लोकमंच का गठन कर अमर सिंह ने दावा किया है कि उनके साथ सपा के 25 और भाजपा के 10 विधायक हैं पर शनिवार की प्रेस कांफ़्रेंस में उनके साथ केवल चार विधायक आए.

इनमें तीन राजपूत हैं. राजा भैया जैसे राजूपत अभी सामने नहीं आए हैं. इनकी मुसीबत में अमर सिंह ने अकेले इन्हें बचाने की कोशिश की थी.

जनेश्वर मिश्र के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए रखी शोकसभा में वामपंथियों के साथ सपा नेताओं ने जो संकेत दिए, उससे लगता है कि पार्टी में अमर सिंह युग ख़त्म होने के बाद सपा एक बार फिर अपनी पुरानी संघर्ष की राजनीति पर उतरना चाहती है.

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