25 साल का संघर्ष, 41 दिन की नौकरी

अब्दुर रऊफ़
Image caption फ़िलहाल अब्दुर रऊफ़ पेंशन के लिए लडा़ई लड़ हैं

सरकारी नौकरी के लिए चुने जाने के बावजूद एक व्यक्ति को ज्वाइन करने से पहले 25 वर्षों तक अदालती लड़ाइयों और लालफीताशाही से जूझना पड़ा.

आख़िर में जब नौकरी मिली तो 41 दिनों तक ही काम कर सके. वजह, तब तक रिटायर होने की उम्र हो चली थी.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के 63 वर्षीय अब्दुर्रऊफ़ की मुश्किलें अब तक ख़त्म नहीं हुई हैं. अब बीते तीन साल से वो अपनी पेंशन के लिए दर-दर गुहार लगा रहे हैं. लेकिन उसके मिलने की उम्मीद कम ही है.

सरकार की दलील है कि उन्होंने महज़ 41 दिनों तक ही नौकरी की है. इसलिए उन्हें पेंशन नहीं दी जा सकती. एक झोपड़पट्टी में रहने वाले रऊफ़ अपने किराएदारों से मिलने वाली रक़म से ही आजीविका चलाते हैं.

दक्षिण कोलकाता के पार्क सर्कस इलाक़े में रहने वाले रऊफ़ कहते हैं कि उन्हें पांच मई, 1982 को राज्य सरकार के खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग में सहायक सैंपलर के पद पर चुना गया था.

अब पेंशन की लड़ाई

उसके बाद नियमों के मुताबिक़ उनसे पुलिस सत्यापन प्रमाणपत्र जमा करने को कहा गया.

लेकिन एक क़रीबी रिश्तेदार की ओर से दर्ज कराया गया एक कथित झूठा मामला ही उनकी राह का रोड़ा बन गया. लंबी अदालती लड़ाई के बाद आख़िर में उनको क्लीन चिट तो मिली. लेकिन तब तक 25 साल गुज़र गए थे.

रऊफ़ कहते हैं, "मेरे भाई ने एक झूठा मामला दायर कर दिया था. पुलिस ने किसी जांच के बिना ही खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग को रिपोर्ट भेज दी कि मेरे ख़िलाफ़ आपराधिक मामला चल रहा है. विभाग ने मुझसे कहा कि इस मामले में बरी होने के बाद ही मैं नौकरी ज्वाइन कर सकता हूँ."

अपने मित्रों की सहायता से लंबी लड़ाई के बाद रऊफ़ को वर्ष 2001 में अदालत से क्लीन चिट मिल गई. अदालत के फ़ैसले के बावजूद उनकी मुश्किलें ख़त्म नहीं हुईं.

विभागीय अधिकारियों ने उनसे पुलिस प्रमाणपत्र लाने को कहा. इस लालफीताशाही से निपटने में छह साल और गुज़र गए. उन्होंने 20 नवंबर, 2007 को नौकरी ज्वाइन की और उसी साल 31 दिसंबर को रिटायर हो गए.

तब तक उनकी उम्र 60 साल की हो चुकी थी.

रऊफ़ कहते हैं, "मैंने इसे अपनी नियति मानते हुए सोचा कि अब बाक़ी जिंदगी पेंशन के सहारे गुज़ार लूंगा. लेकिन मुझसे कहा गया कि सिर्फ़ 41 दिनों की नौकरी की वजह से पेंशन नहीं मिल सकती."

वो सवाल करते हैं कि इसमें उनका क्या कसूर है? रऊफ़ ने पेंशन के लिए राज्य प्रशासनिक पंचाट में अपील की. पंचाट ने रऊफ़ के पक्ष में फ़ैसला सुनाया. लेकिन अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.

बाद में उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग में गुहार लगाई. वे बताते हैं कि आयोग ने विभाग को तीन-चार पत्र भेजे हैं. लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला है. अब रऊफ अपनी पेंशन के लिए एक बार फिर लंबी क़ानूनी लड़ाई के लिए कमर कस रहे हैं.

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