आंध्र प्रदेश में 'मुस्लिम आरक्षण' रद्द

मुस्लिम महिला
Image caption वर्ष 2004 में भी राज्य सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया था, जिसपर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दिया जा रहा चार प्रतिशत आरक्षण रद्द कर दिया है.

सात जजों की विशेष बेंच का कहना है कि इस तरह का आरक्षण लागू नहीं रखा जा सकता है.

सोमवार को सात जजों की विशेष बेंच ने ये फ़ैसला बहुमत के आधार पर लिया है जिसमें पाँच जज आरक्षण को रद्द करने के पक्ष में थे.

बहुमत में से एक जज के अनुसार आरक्षण के लिए सरकार ने सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया था और विशेषज्ञ समिति की जिस रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण दिया गया है वो रिपोर्ट केवल छह ज़िलों पर ही आधारित है.

उधर राज्य सरकार के एडवोकेट जनरल सीताराम मूर्ति ने बताया है कि इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी.

वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने मुस्लिम सुमदाय की 15 पिछड़ी बिरादरियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में चार प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला किया था जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.

सदमे का दिन

हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्थानीय राजनीतिक पार्टी मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष और सांसद असदु्द्दीन ओवैसी ने हैरत ज़ाहिर करते हुए कहा, "राज्य के लिए यह सदमे का दिन है, हमें समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसे न्यायिक फ़ैसले कैसे हो सकते हैं."

जबकि मुसलमानों का पक्ष रख रहे वकील केजी कन्नाबीरन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "फ़ैसला संविधान के अनुसार नहीं है और इससे समाजिक विघटन की स्थिति उत्पन होगी."

ग़ौरतलब है कि वर्ष 2004 और 2005 में भी राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने उस पर भी रोक लगा दी थी.

उस समय कोर्ट का कहना था कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती और पूरे मुसलमानों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता.

इसके बाद वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने अपनी रणनीति बदलते हुए सारे मुसलमानों की जगह इस समुदाय की 15 पिछड़ी हुई बिरादरियों को पाँच की जगह चार प्रतिशत आरक्षण देने का कानून बनाया. इन 15 बिरादरियों की पहचान एक विशेषज्ञ समिति ने की थी.

इस विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर आंध्र प्रदेश विधान सभा ने लगभाग सर्वसम्मति से 'मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों' को आरक्षण का कानून जुलाई 2007 में पारित किया.

हालाँकि इसपर तुरंत अमल भी शुरू हो गया, लेकिन बाद में इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई.

इस मामले की सुनवाई पहले पांच जजों की बेंच की, लेकिन 2008 में इसे सात जजों वाली बेंच को सौंप दिया गया.

आरक्षण विरोधियों ने इस पर रोक लगाने और इसके अंतर्गत मुस्लिम छात्रों के दाख़िले को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाज़ा खटखटाया लेकन अगस्त 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार दाखिला दे सकती है, लेकिन उनका भविष्य हाई कोर्ट के अंतिम निर्णय पर होगा.

हालाँकि अभी तक इस आरक्षण के अंतर्गत पिछले चार सालों में राज्य के विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में हज़ारों मुस्लिम समुदाय के छात्रों को दाख़िला मिला हुआ है.

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