मुस्लिम संगठनों ने मांगा आरक्षण

मुस्लिम वकक्ता
Image caption मुसलमानों के अनुसार जबतक उन्हें देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.

भारत के प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग की है और कहा कि ये उनका वाजिब हक़ है जो उन्हें मिलना चाहिए.

विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा है कि विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.

ये बातें बुधवार को दिल्ली में नैशनल मूवमेंट फ़ॉर मुस्लिम रिज़र्वेशन (एनएमएमआर) के सम्मेलन में हुईं जिसमें देशभर की जानीमानी हस्तियों, कई राजनीतिक दलों के नेताओं और कई मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

ये सम्मेलन एक ऐसे समय हुआ है जब आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को दिए जा रहे आरक्षण को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है वहीं पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी गठबंधन ने मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है.

एनएमएमआर के प्रमुख सैयद शहाबुद्दीन ने कहा, "मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए, रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए."

पिछड़ी जातियों पर ज़ोर

शहाबुद्दीन का कहना था कि 1950 में राष्ट्रपति अध्यादेश के ज़रिए धारा 341 पर प्रतिबंध लगाकर सभी अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जाति से ख़ारिज कर दिया गया, लेकिन बाद में सिखों और नवबौद्घों को इस धारा में संशोधन कर अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया, लेकिन मुसलमान और ईसाई को इससे अब भी बाहर रखा गया है.

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मुसलमानों को आरक्षण मिलता है तो ऐसे प्रावधान रखे जाएंगे कि इसका फ़ायदा पहले इस समुदाय की पिछड़ी बिरादरियों को हर हाल में मिले.

सम्मलेन में विभिन्न राज्यों में मुसलमानों की स्थिति पर भी चर्चा हुई और कहा गया है कि सरकारी नौकरियों में जहाँ कर्नाटक में मुसलमानों की स्थिति बेहतर है वहीं पश्चिम बंगाल में हालत बहुत ही ख़राब है.

बहुचर्चित राजेंद्र सच्चर कमेटी के सदस्य-सचिव रहे अबु सालेह शरीफ़ ने सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की स्थिति का राज्यवार ब्यौरा प्रस्तुत किया.

शरीफ़ के कहा, "पश्चिम बंगाल में जहाँ मुसलमानों की आबादी 25.2 प्रतिशत है वहीं सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी महज़ 2.1 प्रतिशत है. वहीं कर्नाटक में मुसलमानों की आबादी 12.2 प्रतिशत है जबकि सरकारी नौकरियों में उनकी सहभागिता 8.5 प्रतिशत है."

सालेह शरीफ़ ने आरक्षण की वकालत करते हुए कहा, "फ़िलहाल मुसलमान आर्थिक दृष्टिकोण से अनुसूचित जातियों के बराबर हैं जबकि शैक्षणिक स्तर पर वो उनसे भी पिछड़े हुए हैं."

उनका कहना था आरक्षण मुसलमानों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है.

अबु सालेह शरीफ़ ने देश में मुस्लिम केंद्रित ज़िलों में केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही योजना का भी ज़िक्र किया और इसकी नाकामी के उदाहरण पेश किए.

सम्मेलन में सरकारी योजनाओं का फ़ायदा मुसलमानों तक ठीक तरह से पहुंचे, इस बात पर भी चर्चा हुई और इस सिलसिले में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति सैयद हामिद ने स्वतंत्र निगरानी एजेंसी के गठन का सुझाव दिया.

सम्मेलन में मुस्लिम आरक्षण से संबंधित आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के ताज़ा फ़ैसलों पर खुलकर चर्चा हुई. अनेक वक्ताओं ने दोनों राज्यों की सत्ताधारी सरकारों की मंशा पर सवाल उठाए.

आंध्र प्रदेश के संबंध में वक्ताओं का कहना था कि सरकार ने जानबूझ कर हाई कोर्ट के सामने कमज़ोर केस पेश किया. वहीं पश्चिम बंगाल के हवाले से इनका कहना था कि अगर सरकार केवल पिछड़े तबक़ों को आरक्षण देती है तो इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा, क्योंकि राज्य में जाति के आधार पर पसमांदा मुसलमानों की तादाद बहुत ही कम है जबकि राज्य के अधिकतर मुसलमान अभावग्रस्त हैं.

वोट की ताक़त

Image caption मुसलमानों के अनुसार उनके पिछड़ने की एक वजह सरकारी स्तर पर अनदेखी भी है

अनेक प्रतिनिधियनों का कहना था कि मुस्लिम वोट को खिसकता देख पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों ने मुसलमानों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया. ऐसे में मुसलमानों को वोट को हथियार बनाने की ज़रूरत है और वो उसी पार्टी को वोट दें जो आरक्षण देने का समर्थन करे.

कई वक्ताओं ने मुसलमानों की मौजूदा स्थिति के लिए राजनीतिक पार्टियों को दोषी ठहराया और उनकी नीयत पर शक करते हुए कहा कि आरक्षण पाना आसान नहीं होगा.

लेकिन पूर्व कैबिनेट सचिव ज़फ़र सैफ़ु्ल्लाह का कहना था, "आरक्षण की माँग भीख नहीं है बल्कि मुसलमानों का हक़ है और सरकार बहुत दिनों तक किसी को उसके हक़ से दूर नहीं रख सकती है."

हालाँकि उनका कहना था कि आरक्षण नहीं मिलने में सबसे बड़ी रुकावट सरकार की नीयत में खोट है.

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