कश्मीर में आत्मसमर्पण नीति का बचाव

उमर अब्दुल्ला
Image caption उमर अब्दुल्ला के प्रस्ताव से नेशनल कॉन्फ़्रेस और कांग्रेस में मतभेद पैदा हो गए हैं

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चरमपंथियों के आत्मसमर्पण की अपनी प्रस्तावित नीति का बचाव करते हुए इसे समय की ज़रुरत बताया है.

उमर अब्दुल्ला के प्रस्ताव पर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और कहा था कि यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आत्म समर्पण करने वाले युवक फिर से चरमपंथी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे.

इसका जवाब देते हुए उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को जम्मू में मीडिया से कहा, "नीति बनाते समय लाभ और हानि दोनों का आकलन किया जाएगा."

इस प्रस्तावित नीति के तहत उन चरमपंथियों युवकों को आम माफ़ी दे दी जाएगी जो कभी पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में चले गए थे और अब वापस आकर मुख्य धारा में शामिल होना चाहते हैं.

नीति पर नोंकझोंक

उमर अब्दुल्ला ने गत छह फ़रवरी को आंतरिक सुरक्षा पर दिल्ली में हुए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इस नीति की वकालत की थी.

इस नीति का उद्देश्य उन युवकों को वापस लाना है जो 90 के दशक में नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में चले गए थे.

माना जाता है कि इनमें से ज़्यादातर उस ओर जाकर चरमपंथी गतिविधियों में संलग्न हो गए थे और इसके लिए उन्हें वहाँ प्रशिक्षण दिया गया था.

अनुमान है कि ऐसे युवकों की संख्या 10 हज़ार से अधिक हो सकती है.

उमर अब्दुल्ला का कहना है कि इन युवाओं का पुनर्वास सरकार की ज़िम्मेदारी होगी.

लेकिन इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा था, "इस बात की गारंटी कौन लेगा कि ये युवक वापस आकर चरमपंथी गतिविधियों में फिर से संलग्न नहीं हो जाएंगे? क्या हम पाकिस्तान पर भरोसा कर सकते हैं? क्या यह हथियारबंद युवाओं के घुसपैठ की एक और कोशिश नहीं होगी?"

लेकिन उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अभी भी कई युवक काठमांडू और ढाका के रास्ते अपनी पहचान छिपा कर आते हैं और फिर वापस ग़ायब हो जाते हैं.

उन्होंने कहा, "यदि इन युवकों के लिए अच्छी आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति बनाई जाएगी तो सरकार उनकी गतिविधियों पर नज़र रख सकेगी और यह सुनिश्चित कर सकेगी कि वे वापस चरमपंथी गतिविधियों की ओर न जाएँ."

उन्होंने कहा कि इस नीति का दुरुपयोग न्यूनतम करने के लिए गृहमंत्रालय के अधिकारियों के साथ चर्चा चल रही है.

उन्होंने अपने उस प्रस्ताव का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार से उन इलाक़ों से सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार देने वाले क़ानून को ख़त्म करने का अनुरोध किया है जहाँ अब चरमपंथी गतिविधियाँ ख़त्म हो गई हैं.

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