मिले, मतभेद हुए पर संपर्क बनाने पर सहमति

  • 27 फरवरी 2010
निरुपमा राव और सलमान बशीर
Image caption दोनों विदेश सचिवों ने संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई

भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की हाल ही में हुई बातचीत में कुछ ऐसा नहीं था जो अनपेक्षित हो. पाकिस्तान के सलमान बशीर और भारत की निरुपमा राव मिले, मतभेद ज़ाहिर किए और संपर्क बनाए रखने पर सहमत हुए.

भारत के लिए पाकिस्तान की सरज़मीन से उपजा चरमपंथ एजेंडा पर सबसे ऊपर था. पाकिस्तान के लिए कश्मीर, पानी का मामला और बलोचिस्तान में भारत का कथित हस्तक्षेप सबसे अहम मुद्दे थे.

भारतीय अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में बिना किसी स्रोत क ज़िक्र किए छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि विशेष दूतों, भारत के सतिंदर लांबा और पाकिस्तान के रियाज़ मोहम्मद ख़ान की परदे के पीछे चल रही बातचीत को भी इस मुलाक़ात में हरी झंडी दिखा दी गई.

निरुपमा राव का इस बारे में स्पष्ट रुख़ था कि 26/ 11 के मुंबई हमलों के बाद से अवरुद्ध समग्र वार्ता फिर से शुरू करने का 'समय अभी नहीं' आया है. हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के साथ एक बार फिर भरोसा क़ायम करने के लिए 'पहला क़दम' उठा लिया गया है.

उधर, सलमान बशीर ने इस बात का दावा करते हुए कि उनके देश के पास इस बात के सुबूत हैं कि भारत बलोचिस्तान में पाकिस्तान की सुरक्षा को ख़तरे में डाल रहा है, कश्मीर को सबसे अहम मुद्दा बताया.

मौजूदा स्थिति का आकलन

इसके साथ ही बशीर ने कहा कि दोनों पक्षों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति का भी जायज़ा लिया.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी सार्थक बातचीत पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं. भारत की भूमि पर यदि कोई चरमपंथी हमला होगा तो इस बात के पूरे आसार हैं कि उसे पाकिस्तान के किसी चरमपंथी गुट से जोड़ कर देखा जाएगा.

अब जबकि भारत और पाकिस्तान अपनी अवरुद्ध शांति प्रक्रिया को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं तो स्पष्ट रूप से यह एक चुनौती है जो दोनों देशों के सामने मौजूद है इस महीने के प्रारंभ में लाहौर में एक विशाल प्रदर्शन आयोजित करने के मामले में जमात-उद-दावा के साथ बरती गई रियायत ने भारतीय हलकों में पाकिस्तान के इरादों के प्रति संशय पैदा कर दिया है.

और ज़ाहिर है लाहौर में इस तरह के आयोजन देख कर यह विचार और पुख़्ता हो जाता है कि पाकिस्तान प्रशासन कहीं न कहीं इस तरह के गुटों को 'उपयोगी' मानता है.

विपक्षी भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि जब पाकिस्तान लगातार भारत के ख़िलाफ़ चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है तो इस समय उससे बातचीत का कोई मतलब नहीं है. भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "आतंक और बातचीत की नीति क़तई तर्कसंगत नहीं है".

इस तरह के माहौल में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार पर इस बात का काफ़ी राजनीतिक दबाव होगा कि वह शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाएँ और पाकिस्तान के साथ रुकी हुई समग्र वार्ता फिर से शुरू करें.

भारत-पाकिस्तान शांति प्रक्रिया का भविष्य इस बात से जुड़ा हुआ है कि मनमोहन सिंह इस दबाव को झेलने में कितने सक्षम हैं और साथ ही इसका संबंध इस उम्मीद से भी है कि अब भारत पर ऐसे कोई हमले नहीं होंगे जिन्हें पाकिस्तान में संचालित जिहादी गुटों से जोड़ा जा सके.

इस बारे में महज़ उम्मीद ही की जा सकती है.

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