रंग डालने की सज़ा शादी !

  • 28 फरवरी 2010
संथाल समाज
Image caption संथाल समाज में महिलाए अपने बीच ही होली खेतली हैं

क्या होली के दिन किसी युवती को रंग लगाने की सज़ा उससे शादी कर भुगतनी पड़ सकती है.

सवाल थोड़ा अटपटा ज़रूर है. लेकिन अगर आपने कभी पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में जलपाईगुड़ी ज़िले के अलीपुरद्वार क़स्बे का यही नियम और परंपरा है.

जलपाईगुड़ी के अलीपुरद्वार की तुरतुरी पंचायत के संथाल मोहल्ले में सदियों पुरानी यह अनोखी परंपरा आज भी जस की तस है.

यह अलग बात है कि अब समाज और लोकलाज के डर से लोग यहां भूल कर भी होली के दिन लड़कियों को रंग नहीं लगाते.

लेकिन इस मोहल्ले में कम से कम एक दर्जन ऐसे लोग हैं जो लड़कियों को रंग लगाने की सज़ा उनसे शादी कर भुगत चुके हैं.

शादी नहीं तो जुर्माना

लेकिन पंचायत के बुज़ुर्ग कहते हैं कि अगर लड़की को रंग लगाने की भूल किसी ऐसे व्यक्ति से हो जाए जो विवाह के योग्य नहीं है तो वह जुर्माने की रक़म भर कर माफ़ी पा सकता है.

संथाल समाज के पटगो टुडू बताते हैं, ‘‘होली के दिन अगर कोई लड़का किसी लड़की को ग़लती से भी रंग लगा दे तो उसे लड़की से शादी करनी पड़ती है. अगर किसी वजह से शादी नहीं हो सकती तो उस लड़के की हैसियत के मुताबिक़ जुर्माना तय किया जाएगा. जुर्माने की न्यूनतम रकम पांच सौ रुपए है.’’

वैसे, इस वैकल्पिक प्रावधान की ठोस वजह तो कोई नहीं बता पाता.

इसी डर से कोई संथाल युवक किसी युवती के साथ रंग नहीं खेलता.

संथाल समाज में होली रंग से नहीं, बल्कि पानी से खेली जाती है. परंपरा के मुताबिक़ पुरुष केवल पुरुष के साथ ही होली खेल सकता है.

परंपरा और पवित्रता

Image caption होली में ये समाज गीत-संगीत का ख़ास आयोजन करता है

रंग खेलने के बाद वन्यजीवों के शिकार की परंपरा है. शिकार में जो वन्यजीव मारा जाता है उसे पका कर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है.

संथाल मुहल्ले के विजय मुंडा कहते हैं, ‘‘आधुनिकता के इस दौर में भी हमारे मोहल्ले में इस नियम का पालन कड़ाई के साथ होता है. इसका मक़सद इस त्योहार की पवित्रता बरकरार रखना है. होली के दिन इस सामाजिक परंपरा को तोड़ने की हिम्मत कोई नहीं करता.’’

होली खेलने का दिन भी समाज के मुखिया निर्धारित करते हैं. मुखिया मालदो हांसदा ने इस बार होली के एक सप्ताह बाद यह त्योहार मनाने की तारीख तय की है. तुरतुरी ग्राम पंचायत के संथाल युवक-युवतियां उसी दिन होली खेलेंगे.

समाज के बड़े-बूढे़ तो होली की इस सदियों पुरानी परंपरा से खुश हैं. लेकिन बदलते समय के साथ युवा पीढ़ी इसमें बदलाव के पक्ष में है. हेमलता मुंडा कहती हैं, ‘‘यह परंपरा सदियों पुरानी है. आधुनिकता के इस दौर में इसमें बदलाव लाया जाना चाहिए. हमें भी खुल कर रंगों से होली खेलने की छूट दी जानी चाहिए.’’

दूसरी ओर, मुखिया मालदो हांसदा कहते हैं, ‘‘समाज में सदियों पुरानी परंपरा को बदलना न तो उचित है और न ही संभव.’’

वे इस परंपरा में किसी तरह की खामी नहीं मानते.

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