जहाँ धर्म कोई बाधा नहीं होता

राजस्थान में होली गीत गाते मुसलमान
Image caption मुसलमान कलाकार होली के गीत गाते हैं

राजस्थान के मरुस्थली इलाक़े में जब होली का ख़ुमार चढ़ता है तो धर्म कोई बाधा नहीं बनता और मुस्लिम लोक कलाकार होली के गीत गाकर धार्मिक सद्भभाव की एक अनुठी मिसाल पेश करते हैं.

राज्य के सीमावर्ती रेगिस्तानी इलाकों में धार्मिक मेलजोल की यह परंपरा सदियों पुरानी है.

यहां के लोक कलाकारों का मानना है कि सांप्रदायिक सद्भभाव मरुस्थल के मिज़ाज में है.

होली पर कहीं चंग की थाप पर लोग थिरकते हैं तो कहीं मंदिरों में फाग उत्सव का आयोजन किया जाता है. मगर बियाबान रेगिस्तान में जब लंगा और मांगनयार बिरादरी के कलाकार होली के गीतों को स्वर देते है तो धार्मिक विभाजन की लकीरें ओझल हो जाती हैं.

राजस्थानी लोक गीतों के जाने-माने कलाकार हयात मोहम्मद लंगा कहते हैं, ‘‘होली के गीत हमें विरासत में मिले हैं. इस मौक़े पर हम लोग ‘होली आई रे पिया के देश में’ सरीखे गीत बड़े ही उत्साह के साथ गाते हैं.’’

महिला कलाकार भी पीछे नहीं

बाड़मेर निवासी रुक़मा लोक गायन के क्षेत्र में एक स्थापित महिला कलाकार हैं. उनकी बिरादरी सदियों से गायन और संगीत की परंपरा में योगदान देती आई है. पहले इस बिरादरी में महिलाओं को मंच पर गाने की अनुमति नहीं थी. रुक़मा ने इस वर्जना को तोड़ा और इस तरह वो अपनी बिरादरी की पहली महिला कलाकार हैं.

रुक़मा एक गाने का मुखड़ा गाती हैं-‘‘भर पिचकारी हम खेले होली पिया संग, भर पिचकारी मुख पर डाली, भीग गई अंगिया.’’

राजस्थान में यह गीत काफ़ी मशहूर है. इन गीतों में हिंदू प्रतीक और देवी देवता मौजूद हैं, मगर आवाज़ देते हैं मुसलमान कलाकार.

यूँ तो कान्हा का बरसाना उत्तर प्रदेश में है और रेगिस्तान से यह काफी दूर है. लेकिन जब ये फनकार होली के गीत गाते हैं तो ऐसा चित्र बनता है मानो बरसाना का रंग इसी मरुस्थल में आ बसा हो.

राधा और कृष्ण का बखान

इन गीतों में राधा और कृष्ण दोनों का बखान है.

लोक गायक बड़े ग़ाजी ख़ान कहते हैं, ‘‘श्री किशन हमारे गीतों में केंद्रीय नायक हैं. राधिका होली खेलती हैं, कान्हा मुरली पर धुन छेड़े हुए हैं और हम कान्हा के जन्म पर बधाई गीत गाते हैं कि ‘आओ खेलें होली फाग’. इसमें मज़हब कभी भी आड़े नहीं आता.’’

इन कलाकारों ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी कला के प्रदर्शन से लोगों को मंत्रमुग्ध किया है.

कमायचा पर संगत देने वाले लुना ख़ान बताते हैं कि इन गीतों में नायिका अपने पिया के देश में होली के त्योहार का बखान करती है.

लोक कलाकार खेते ख़ान मांगनयार बताते हैं, ‘‘होलिका से सात दिन पहले ही हमारी बिरादरी के लोग अपने साज़ के साथ होली के गीत गाने लगते हैं. फिर अगर गांव में कोई जजमान शहर से छुट्टी बिताने आया हो तो हम उससे मिलने जाते हैं.’’

मरुस्थल में रेत के बवंडर उठते हैं तो माटी पर उकेरी हर तस्वीर मिट जाती है. मगर रेगिस्तान में बालू के टीलों पर सांप्रदायिक सद्भभाव की इबारत इतनी पुख्ता लिखी गई है कि कोई भी झंझावात उसे मिटा नहीं सकता.

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