परमाणु बिजली घर के ख़िलाफ़ खड़े हैं किसान

  • 4 मार्च 2010
प्रवीन गवांकर
Image caption इस इलाक़े के किसानों और मछुआरों ने बिजली घर के विरोध में आंदोलन छेड़ रखा है.

महाराष्ट्र के कोंकण इलाक़े में अरब महासागर के किनारे पहाड़ियों पर बसे मधबन और उसके आसपास के गाँवों में इन दिनों बेचैनी और नाराज़गी का माहौल है.

कारण यह है कि केंद्र सरकार यहाँ फ़्रांस के सहयोग से एक परमाणु बिजली सयंत्र लगाने जा रही है.

गाँव वाले समझते हैं कि इससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा इसलिए ये लोग परमाणु घर के निर्माण का ज़बरदस्त विरोध कर रहे हैं.

मधबन अरब महासागर के किनारे बसे गाँवों में से एक है. यह उतना ही सुंदर है जितना गोवा या केरल के समुद्री किनारे हैं.

मुंबई-गोवा के बीच बसी इन बस्तियों में रहने वाले किसानों और मछुआरों को डर है कि इस परमाणु बिजली घर का उनके व्यवसाय और पर्यावरण पर ख़राब असर पड़ सकता है.

आंदोलन

प्रवीण गव्हानकर मधबन के बड़े किसानों में से एक हैं. इस परमाणु बिजली घर के विरोध में जारी आंदोलन का नेतृत्व गवांकर ही कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "हम लोग यहाँ सदियों से बसे हैं. हम जान दे देंगे लेकिन अपने पूर्वजों के घरों और खेत को छोड़ कर नहीं जाएँगे."

सरकार ने जनवरी में मधबन और आसपास के तीन और गाँवों की ज़मीन का इस बिजली घर के लिए अधिग्रहण किया था.

सरकार ने ज़मीन के बदले औपचारिक रूप से तीन बार किसानों को मुआवज़ा देने की कोशिश की लेकिन सात किसानों को छोड़कर क़रीब 24 सौ किसानों ने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया.

किसानों और मछुआरों के इस आंदोलन से बेख़बर दिख रहे परमाणु बिजली घर के एक अधिकारी सीबी जैन का कहना है, ''सरकार के इस परियोजना को जल्द पूरा करवाने के लिए हम पूरी तरह तैयार हैं.''

यह बिजली घर दो साल पहले भारत और फ़्रांस के बीच हुए परमाणु ऊर्जा से संबंधित एक समझौते का नतीजा है. यह समझौता तभी संभव हो पाया जब परमाणु ईंधन बेचने वाले अंतरराष्ट्रीय समूह ने भारत पर लगी पाबंदी को हटा लिया था.

भारत और फ़्रांस के बीच हुए इस समझौते के मुताबिक़ फ़्रांस की परमाणु ऊर्जा कंपनी 'अरेवा' मधबन-जैतपुर में छह रिएक्टर लगाएगी. हर रिएक्टर से 1650 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा.

उद्योगविहीन

मुंबई और गोवा के बीच अरब सागर का यह तटीय इलाक़ा कोंकण के नाम से जाना जाता है. इस इलाक़े में दाभोल बिजली घर के अलावा कोई और बड़ा उद्योग नहीं है.

Image caption इस आंदोलन को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं व संस्थाओं की मदद मिल रही है.

सरकार इस इलाक़े में मधबन-जैतपुर में परमाणु बिजली घर के अलावा नौ और बिजली घर बनाना चाहती है.

प्रवीन गवांकर का कहना है कि बिजली पैदा करने के लिए सरकार के पास और भी कई तरीक़े है तो फिर परमाणु ऊर्जा पैदा कर इलाक़े को नष्ट क्यों किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ''यहाँ परमाणु ऊर्जा बिजली घर बनाने का मतलब है यहाँ की सुंदर प्रकृति के साथ बलात्कार करना.''

किसानों और मछुआरों के इस आंदोलन को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और संस्थाओं से मदद मिल रही है.

अंतरराष्ट्रीय संस्था 'ग्रीनपीस' की कार्यकर्ता भक्ति नेफ्रेतिती कहती हैं कि उनकी संस्था की ये कोशिश है कि बैंक और वित्तीय संस्थाएँ इस परमाणु बिजली घर को आर्थिक मदद न करें.

भक्ति बताती हैं, ''हम इस प्रोजेक्ट की सहायता करने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को यह समझाने में लगे हैं कि परियोजना से इलाक़े में विकिरण फैलने का ख़तरा है. इससे इलाक़े के पर्यावरण को ख़तरा है. समुद्री जीवन नष्ट होने से यहाँ के मछुआरों की कमाई का जरिया ही ख़त्म हो सकता है.''

इन विरोध-प्रदर्शनों के बाद भी केंद्र सरकार देश में 30 और परमाणु बिजली घर बनाने की बात कर रही है.

सीबी जैन कहते हैं, ''विरोध करने का सभी को हक़ है. लेकिन हमने इन गाँव वालों को हर तरह से समझाने की कोशिश की है कि इस बिजली घर से कोई ख़तरा नहीं है. हमने उनकी बातों पर ध्यान दिया है. उन्हें विश्वास दिलाया है की इससे उनके जीवन पर कोई बुरा असर नहीं होगा. हमें यकीन है कि यह विरोध जल्द ही ख़त्म हो जाएगा और इस योजना पर काम जल्द ही शुरू हो जाएगा''

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