अक्षम लोगों का संसार संवारता इंटरनेट

अरुण मेहता और स्टीफन हाकिंन

इंटरनेट के प्रयोग ने निःसंदेह दुनिया के एक बड़े हिस्से को जानकारी देने, सीखने और समझने के लिए आधुनिक, अधिक सस्ता, तेज़ और विश्वस्तरीय नेटवर्क वाला विकल्प दिया है.

पर दुनिया की आबादी का 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा ऐसा है जो संचार के तमाम विकल्पों से नावाकिफ़ रहा है. मैं जिस आबादी की बात कर रहा हूँ उसे विकलांग या शारीरिक-मानसिक रूप से अक्षम लोगों के तौर पर जाना जाता है.

हालांकि मेरा मानना है कि इन्हें अक्षम मानने के बजाय इनके अंदर की अदभुत क्षमताओं को समझना चाहिए क्योंकि इनका चीज़ों को देखने और करने का तरीका अलग किस्म का है.

संचार के पुराने माध्यम शायद यह मानकर चलते हैं कि सभी लोग सुन सकते हैं, देख सकते हैं, उनके हाथ ठीक हैं, वो अख़बारों के पन्ने पलट सकते हैं. जैसे समाचार पत्र, या रेडियो, टीवी जैसे माध्यम.

इस मामले में कम्प्यूटर एक एकदम अलग किस्म का माध्यम है. यह एक ऐसा ज़रिया है कि अगर आप देख न सकें तो कोई बात नहीं, दिखनेवाली चीज़ आपको सुना दी जाएगी. अगर किसी के हाथ काम नहीं करते, कोई कीबोर्ड और माउस का इस्तेमाल नहीं कर सकता तो वो केवल एक बटन जैसी व्यवस्था से आप काम कर सकते हैं.

आंखों के ज़रिए, एक या दो बटन चलाकर या दिमाग़ के ज़रिए आप कंप्यूटर चला सकते हैं. अगर आप सुन नहीं सकते तो अब ऑटोमेटिक केप्शनिंग की सुविधा विकसित हो गई है. अलग भाषाओं में अनुवाद कंप्यूटर पर ही हो जाता है.

हमारा लक्ष्य यह रहा है कि कैसे इंटरनेट या कंप्यूटर का इस्तेमाल इन लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए हो सकता है और इतना प्रभावी माध्यम इन चुनौतीपूर्ण स्थितियों में जी रहे लोगों की कैसे मदद कर सकता है.

एक महान मिसाल

यहाँ जाने-माने वैज्ञानिक, भौतिकी विशेषज्ञ और लेखक प्रोफ़ेसर स्टीफ़न हॉकिंन का उदाहरण देना चाहूँगा. वो इतनी महान शख्सियत है पर उनके लिए तमाम चीजें एक बटन वाली एक मशीन से संभव हो पाती हैं. हमें प्रोफेसर साहब से मिलने और उनके लिए काम करने का गौरव हासिल है.

दरअसल, प्रोफेसर स्टीफन का सॉफ्टवेयर है इक्वेलाइज़र. यह एक बटन से चलता है. वो एक बटन से टाइप कर पाते हैं और उसी साफ़्टवेयर में विकल्प है कि उनका लिखा हुआ पढ़ा भी जा सकता है. कंप्यूटर खुद उनके लिखे हुए को आवाज़ देता है.

उनका सॉफ्टवेयर एक ऐसे हार्डवेयर पर चलता है जो 20 साल पहले बना था और अब उसे कोई नहीं बनाता. अगर उनका को हार्डवेयर ख़राब हो जाए तो उनकी आवाज़ चली जाएगी.

हमने इतना किया है कि आधुनिक तकनीक से उनके सॉफ्टवेयर से बेहतर सपोर्ट सिस्टम तैयार किया है ताकि अगर उनका सिस्टम काम करना बंद कर दे तो इससे उनका बोलना, लिखना बंद न हो.

हमारे लिए यह मसला केवल प्रोफेसर हाकिंन का नहीं है. ऐसे कितने ही लोग है जो ऐसी अक्षमताओं के साथ जी रहे हैं. उनके लिए भी एक सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पाना हमारी कोशिश होती है.

चुनौती यह है कि अपंगताएं, अक्षमताएं कई प्रकार की होती हैं. अलग-अलग तरह के मामलों में अलग-अलग सॉफ्टवेयर की ज़रूरत पड़ेगी. इसके अलावा उम्र के साथ-साथ ज़रूरतों का दायरा भी बदलता जाता है.

इंटरनेट की भूमिका

मैं जब 80 के दशक में भारत लौटा तो मेरे साथ भी एक तरह की विकलांगता थी कि मेरे पास उतनी जानकारी नहीं पहुँच रही थी कंप्यूटर के बारे में, जितनी की होनी चाहिए थी.

मेरे लिए चिंता इस बात को लेकर भी है कि मैं तो एक परामर्शदाता हूँ, मैं जानकारी बढ़ाने के लिए कहाँ जाउं, किससे पूछूं. इंटरनेट आने से सबसे पहली बात यह हुई कि हमें जो जानकारी चाहिए थी वो कई रूपों में हमारे सामने आने लगी.

सूचना अब हमतक पहुँचने लगी है और अब हमारा काम है कि बाकी लोगों तक इसे कैसे पहुंचाएं.

ऐसा हो भी रहा है कुछ स्थानों पर. लोग स्काइप या अन्य चैट वेबसाइटों के ज़रिए अपनी खबर लोगों तक पहुँचा रहे हैं. कर्नाटक संगीत, शास्त्रीय संगीत सीखने तक कितने ही तरह के प्रयोग इंटरनेट के ज़रिए लोगों ने किए हैं. जितने भी काम आउटसोर्स हो रहे हैं, उन्हें विकलांग लोग भी कर रहे हैं. कंप्यूटर पर होने वाले कामों में अब विकलांग और ग़ैर-विकलांग का फ़र्क नहीं होता.

मिट्टी के माधो

यूएन का एक दस्तावेज़ है- यूएन कन्वेंशन फॉर राइट्स ऑफ़ डिसेबल्स के नाम से एक बहुत अच्छा दस्तावेज़ संयुक्त राष्ट्र ने निकाला है. दुनिया के कई देशों ने इसे अपनाया भी है. पर उसका अमल नहीं हो रहा है.

दरअसल, अभी तक सरकारी कामकाज और तौर-तरीकों में इसे उतारा नहीं गया है. हर सुविधा के लिए आपको संघर्ष करना पड़ता है कि आप इसे लोगों की पहुँच तक ले जाएं.

सरकार जिन विकलांग लोगों के लिए नीतियां बना रही होती है, वे लोग ही इन बैठकों में शामिल नहीं किए जाते हैं.

हमारा कहना यह है कि सरकार पूरी प्रक्रिया को सही करे. जिस प्रक्रिया से नीतियां बनती हैं, इमारतों को पारित किया जाता है. जिस प्रक्रिया से किसी सॉफ्टवेयर को अपनाने से पहले उसका परीक्षण किया जाता है, उस प्रक्रिया में विकलांगता को भी लाया जाए.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनि आनंद से बातचीत पर आधारित)