'आरक्षण नहीं तो वोट नहीं' का नारा

मुसलमानों की रैली
Image caption हैदराबाद में आयोजित इस रैली में मुसलमान बड़ी तादाद में इकट्ठा थे.

शनिवार रात को हैदराबाद में मुसलमानों ने एक बड़ी रैली की. इस रैली में मुस्लिम संगठनों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर अपनी शक्ति का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया.

रैली में कांग्रेस पार्टी को चेतावनी दी गई है कि अगर मुसलमानों को आरक्षण नहीं दिया गया तो अगले चुनाव में वे कांग्रेस पार्टी को वोट नहीं देंगे.

रैली में यह भी मांग की गई कि महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाले विधेयक में संशोधन किया जाए. इसमें मुसलमान और अन्य पिछड़ी जातियों की महिलाओं को अलग से आरक्षण दिया जाए ताकि उन्हें भी प्रतिनिधित्व मिल सके.

रैली में तक़रीबन एक लाख मुसलमानों ने भाग लिया.

गत महीने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में मुसलमानों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दिया गया चार फ़ीसदी आरक्षण रद्द कर दिया था.

तभी से मुसलमान राज्य सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि इस आरक्षण को जारी रखने के लिए कदम उठाया जाए.

रैली का आयोजन मुस्लिम मुत्तहेदा मजलिस-इ-अमल ने किया था.

रैली को स्थानीय नेताओं के अलावा राज्य सभा के उन तीन सदस्यों ने भी संबोधित किया जिन्हें हाल ही में महिला विधेयक पर चर्चा के दौरान अव्यवस्था फैलाने पर राज्य सभा से निलंबित कर दिया गया था.

इनमें निर्दलीय एजाज़ अली, लोक जन शक्ति के सबीर अली और समाजवादी पार्टी के कमाल अख्तर शामिल थे.

आरक्षण मुसलमानों का संवैधानिक अधिकार

हैदराबाद के सांसद और मज़लिस के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि मुसलमान आरक्षण के लिए भीख नहीं मांग रहा है बल्कि यह उसका संवैधानिक अधिकार है. यह अधिकार उसे मिलना ही चाहिए.

उन्होंने कहा कि गत 50-60 वर्षों में मुसलमान इतना पिछड़ गया है कि उसकी हालत दलितों से भी ख़राब हो गई है. स्वयं सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग ने अपनी रिपोर्टों में इसका उल्लेख किया है और मुसलमानों के साथ न्याय की ज़रुरत बताई है.

रैली में पारित प्रस्तावों में मांग की गई कि आंध्र प्रदेश में मुसलमानों के लिए 4 फ़ीसदी आरक्षण बहाल किया जाए. यह भी कि रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिश के अनुसार मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया जाए और महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन करके मुसलमान और अन्य पिछड़ी जातियों की महिलाओं को भी आरक्षण दिया जाय.

मुसलमानों में पिछड़ापन

ओवैसी ने मुसलमानों के बढ़ते पिछड़ेपन के संबंध में कई आंकड़े गिनाए.

Image caption महिला विधेयक के दौरान राज्य सभा के जिन सांसदों ने आरक्षण का विरोध किया था, वहीं रैली में इन लोगों ने मुसलमान आरक्षण की पुरजोर मांग की.

उन्होंने कहा कि देश में बनने वाले हर 100 ग्रेजुएट में केवल तीन मुसलमान होते हैं. आम साक्षरता 65 फ़ीसदी की तुलना में मुसलमानों में साक्षरता केवल 51 फ़ीसदी है. शहरी इलाकों में गरीबी का स्तर आम तौर पर 27 फ़ीसदी है जब कि मुसलमानों में यह 37 फ़ीसदी है.

उन्होंने उल्लेख किया कि देश के 4790 आईएएस अधिकारियों में केवल 109 मुस्लिम हैं जबकि 3209 आईपीएस अधिकारियों में 109 मुसलमान, 619 आईएफ़एस अधिकारियों में 10 मुसलमान और केंद्र सरकार में 80 सचिवों में एक भी मुसलमान नहीं है.

ओवैसी ने वर्ष 1950 के राष्ट्रपति के उस आदेश को एक धब्बा बताया जिसमें आरक्षण के फायदे को केवल हिन्दू दलितों तक सीमित रखा गया था. उन्होंने सवाल किया कि एक ही काम करने वाले हिन्दू और मुस्लिम धोबी और नाई के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं.

रैली में विभिन्न दलों के नेता

रैली में जिन स्थानीय नेताओं ने संबोधित किया उनमें तेलुगु देशम के लालजन बाशा और कांग्रेस पार्टी के मोहम्मद अली शब्बीर थे.

इन नेताओं ने कहा कि आरक्षण के मुद्दे पर तमाम मुसलमान एक हैं चाहे उनका सम्बन्ध किसी भी दल से हो.

शब्बीर ने आश्वासन दिया, ‘‘राज्य सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि मुसलमान छात्रों को अगले वर्ष भी आरक्षण का फ़ायदा मिले और इस संबंध में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है.’’

डॉ. एजाज़ अली ने कहा कि संविधान की धारा 143 में आरक्षण के मामले में धर्म के आधार पर भेदभाव बरता गया है. इसलिए इसमें संशोधन होना चाहिए ताकि मुसलमानों को बराबर का अधिकार मिल सके.

राज्य सभा के बाकी दोनों सदस्यों- लोक जन शक्ति के सबीर अली और समाजवादी पार्टी के कमल अख्तर ने भी मुसलमानों के लिए आरक्षण के विषय को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने और सरकार पर दबाव बढ़ाने की ज़रुरत पर जोर दिया.

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