हरिद्वार में दूसरा शाही स्नान

हरिद्वार

हरिद्वार महाकुंभ में आज दूसरा शाही स्नान हो रहा है. स्नान का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है क्योंकि आज ही सोमवती अमावस्या भी है.

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार ये दुर्लभ संयोग क़रीब 750 साल बाद बना है जब कुंभ काल के दौरान ही सोमवती अमावस्या भी है.

सूर्य और चंद्रमा दोनों ही मीन राशि में है जिसका विशेष फल माना जा रहा है.

आस्था और भक्ति के महासंगम में शामिल होने के लिए देश-दुनिया से लाखों लोग हर की पैड़ी पर उमड़ रहे हैं. हर की पैड़ी पर मानो तिल रखने की भी जगह नहीं है.

वैसे तो कुंभ के लिए गंगा तट पर 15 किलो मीटर लंबे कई और घाट बनाए गए हैं लेकिन सबकी कामना है कि वो हर की पैड़ी पर ही गंगा स्ना करें क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमृत की बूंदें हर की पैड़ी पर स्थित ब्रहमकुंड में ही छलकी थीं.

आधी रात के बाद पुण्य काल आरंभ होते ही स्नान करने के लिए हर की पैड़ी पर लोगों का तांता लग गया.

अमृतसर से आईं सुरिंदर कहती हैं, "संतों के दर्शन और उनके स्नान से जूठे हुए पानी में स्नान करने का पुण्य फल मिलता है और उसी के लिए मैं यहाँ आई हूं."

ऑस्ट्रेलिया से आए जेनसन अब हिंदू धर्म में दीक्षित और खुद महामंडलेश्वर हैं. उनका कहना है, "शाही स्नान का दिन अनूठा है और ऐसे पर्व पर मैं यहाँ हूं ये मेरे लिए गौरव की बात है."

हालांकि आम लोग सुबह 9.30 बजे तक ही हर की पैड़ी पर स्नान कर सकेंगे और उसके बाद अखाड़ों का शाही स्नान शुरू होगा.

स्नान

वैष्णव और शैव संप्रदाय के सभी 13 अखाड़े क्रम से शाही स्नान करेंगे. सबसे पहले निरंजनी अखाड़ा और सबसे अंत में निर्मल अखाड़ा स्नान करेगा.

इस बार स्नान के क्रम को लेकर अखाड़ों में कोई विवाद नहीं है. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं. "सभी अखाड़ों में स्नान के क्रम को लेकर सहमति है और हमने इस बारे में प्रशासन को लिखकर दे भी दिया है."

अखाड़ों के शाही स्नान के महत्व के बारे में पंडित प्रतीक मिश्रपुरी बताते हैं.

वो कहते हैं, "हरिद्वार के पंडा और अखाड़े सनातन धर्म में सबसे प्राचीन माने जाते हैं इसलिए उन्हें स्नान में प्राथमिकता दी जाती है. माना जाता है कि साधु-संत जो ज्ञान-तप और पुण्य अर्जित करते हैं. कुंभ में आकर उन्हें उड़ेल देते हैं इसलिए उनके स्नान के बाद गंगा-स्नान का महत्व और बढ़ जाता है."

हरिद्वार में इस दौरान सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं और हरिद्वार पहुँचने के सारे रास्ते कई किलो मीटर पहले से ही वाहनों के लिए बंद कर दिए गए हैं.

लेकिन तमाम तकलीफ़ों के बावजूद लोग आठ से 10 किमी तक पैदल चलकर भी स्नान पर्व में शामिल होने के लिए पंहुच ही रहे हैं.

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