हैदराबाद के अरब बच्चों की पुकार

हैदराबाद के इन बच्चों का रक्त टेस्ट किया गया था
Image caption हैदराबाद के इन बच्चों का कहना है कि उनका रक्त टेस्ट किया गया था

यूँ तो हैदराबाद में स्थानीय लड़कियों के अरब शेख़ों के साथ विवाह की परंपरा काफ़ी पुरानी है क्योंकि हैदराबाद जब निज़ाम के अंतर्गत एक अलग राजवाड़ा था, तभी से अरब देशों के साथ उसे के विशेष संबंध और निज़ाम के पास अरबों पर आधारित एक अलग सेना थी.

आज भी हैदराबाद में अरबों की एक अलग बस्ती बरक्स के नाम से मशहूर है. लेकिन गत चार दशकों के दौरान स्थानीय महिलाओं और अरबों का विवाह समय-समय से विवाद का विषय बनते रहे हैं और अब इस समस्या का एक नया रूप सामने आ रहा है. अब उन अरब शेख़ों के वो बच्चे अपना अधिकार लेने के लिए खड़े हुए हैं, जिनके पिता उन्हें और उनकी माओं को छोड़ कर स्वदेश चले गए थे और फिर कभी पलट कर नहीं आए.

ऐसे कम से कम 20 लड़कों और लड़कियों ने संयुक्त अरब अमीरात में अपने पिताओं को ढूँढ निकालने और वहां की नागरिकता हासिल करने के लिए मिलजुलकर संघर्ष शुरू किया है. हैदराबाद के पुराने शहर में रहने वाली रुक़य्या बेगम उन सैकड़ों महिलाओं में से एक है जिनका गत तीन चार दशकों में संयुक्त अरब अमीरात, सउदी अरब, ओमान और दूसरे अरब देशों से आने वाले वहां के नागरिकों से विवाह हुआ था. नवंबर 1977 में रुक़य्या बेगम की शादी दुबई के एक नागरिक और व्यापारी अली अहमद मोहम्मद कल्ली से हुई थी. उन्होंने रुक़य्या के अलावा हैदराबाद में दो और महिलाओं और दुबई में एक अरब महिला से भी शादी रचाई थी और हैदराबाद में उन्हें कुल मिलाकर छह बच्चे हुए. 1988 तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा और अली अहमद ने अपनी पत्निओं और बच्चों का पूरा ख़याल रखा लेकिन अली अहमद की मौत के साथ ही सब कुछ बदल गया.

दुबई में अली अहमद की पहली अरब पत्नी के बच्चों ने हैदराबाद के अपने सौतेले भाई बहनों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उनके दुबई के पासपोर्ट जला डाले. तब से कल्ली के बच्चे दुबई जाने और अपने पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा लेने और वहां की नागरिकता पाने की लड़ाई में जुटे हैं.

रुक़य्या बेगम अपने बच्चों की ख़राब हालत सुनाते हुए रो पड़ती हैं, "बीस वर्ष तक मेरे बच्चों ने बहुत मुश्किलें उठाई हैं, बहुत तकलीफें झेलीं हैं. उन्हें कोई ठीक काम भी नहीं मिला. हमारे ख़राब हालात के कारण मैं उन्हें ज़्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं सकी. अगर उनके दुबई जाने का कोई रास्ता निकलता है तो मैं बहुत आभारी रहूंगी." ऐसी ही कुछ कहानी 31 वर्षीय नासिर जमाल मोहम्मद की है जो गत दस वर्षों से शारजाह में रहने वाले अपने पिता को ढूँढ रहे हैं. पिता जमाल मोहम्मद ने तो इस बात को स्वीकार कर लिया है की उन्होंने नासिर की माँ फरहतुन्निसा से विवाह किया था लेकिन नासिर को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है.

उन्होंने इस बात का सबूत माँगा है की उनके चले जाने के बाद फरहतुन्निसा ने दूसरी शादी नहीं की.

नासिर के कहना था, "मेरे पिता 1976 में हैदराबाद आए थे और उसी दौरान उनकी शादी मेरी माँ से हुई थी और यह वादा करके गए थे के वो दोबारा आकर मेरी माँ को ले जाएंगे लेकिन वो फिर कभी नहीं आए. मेरे पास मेरे पिता का कोई अता-पता नहीं है और न ही मेरा उनसे सम्पर्क है."

"पहले हमें यह सूचना मिली थी के मेरे पिता का देहांत हो गया है लेकिन बाद में वर्ष 2000 में दुबई की सरकार से मुझे जो पत्र मिला इस में यही कहा गया था कि मेरे पिता जीवित हैं, उन्होंने मेरी माँ को तो स्वीकार किया है लेकिन मुझे नहीं लेकिन मुझे विश्वास है की एक न एक दिन मैं उन्हें ज़रूर देखूंगा."

अक़ीक़े के बावजूद इसी तरह एक और युआ सालम बिन हुमैद का कहना था की वो भी दुबई में रहने वाले अपने पिता की तलाश कर रहे हैं. उनका कहना था कि उनकी माँ से 1983 में शादी के बाद उन के पिता दो बार आए और दूसरी यात्रा में उन्होंने सालम का अक़ीक़ा (इस्लामी धार्मिक रस्म) भी करवाया और उसके बाद यह वादा रके गए की वो जल्द ही माँ और बेटे को दुबई बुला लेंगे लेकिन वो फिर पलट कर नहीं आए.

सालम का कहना था, "मेरे पास मेरी माँ और बाप की शादी का सबूत है. मेरे पिता के पासपोर्ट और उनके फोटो की फ़ोटो कॉपी है और इसी में मैंने उन्हें देखा है."

ऐसे ही दूसरे बच्चों की तरह सालम की शिक्षा भी केवल पांचवीं कक्षा तक ही हो सकी. सालम का कहना था, "मुझे लगता है कि मैं एक बेकार का जीवन बिता रहा हूँ. मैं ऑटोरिक्शा चलाता हूँ. जब कमाई होती है तो पेट भर लेता हूँ वरना भूखा रह जाता हूँ. मेरी नानी ने मेरी माँ की दूसरी शादी कर दी और उनका जीवन अब अलग है. मैं नहीं जानता कि आगे मेरा क्या होगा." ऐसी सभी महिलाओं और बच्चों की कहानी का दुखद पहलू यही है कि उन्हें आर्थिक कठिनाइयों और ग़रीबी में जीवन बिताना पड़ा है जिसकी वजह से वो ठीक से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सके और उन्हें कोई अच्छी नौकरी भी नहीं मिल सकी है.

नागरिकता का सवाल

इन सब को यही लगता है कि केवल संयुक्त अरब अमीरात की नागरिकता और वहां जाने से ही उनकी समस्याएं हल हो सकती हैं. ऐसे ही एक युवा अब्दुल्लाह अली अहमद के कहना था कि एक अरब नागरिक के बच्चे होने के कारण उन्हें भारत में कोई पहचान पत्र भी नहीं मिल सकता. उनका कहना था, "चूँकि मेरे पिता अरब थे और दुबई से आए थे और यह बात मेरे जन्म प्रमाण पत्र में भी दर्ज है इसलिए मुझे यहाँ कोई पहचान पत्र, राशन कार्ड या पासपोर्ट नहीं मिल सकता. मुझे लगता है कि मुझे संयुक्त अरब अमीरात की नागरिकता मिलनी चाहिए. यह मेरा अधिकार है." जिस बात ने इन अरब नागरिकों के बच्चों के मन में उम्मीद जगाई है वो संयुक्त अरब अमीरात और दुबई की सरकार का यह फैसला है कि वो मिस्र, लेबनान और भारत में जन्मे अपने नागरिकों के बच्चों को स्वीकार कर लेगी. एक और युवा याक़ूब अली का कहना था, "मैं भी संयुक्त अरब अमीरात की नागरिकता लेना चाहता हूँ. यह मेरा पैतृक अधिकार है जो मुझे मिलना चाहिए. मैं दुबई के शासक शेख़ मोहम्मद बिन राशेद से यह दरख़्वास्त करता हूँ कि अपने फ़ैसले के अनुसार भारत में रहने वाले मुझ जैसें तमाम बच्चों की यात्रा के दस्तावेज़ जारी करें ताकि हम जल्द से जल्द दुबई जा सकें. हमारी आवाज़ उन तक केवल मीडिया के ज़रिए ही पहुँच सकती है." इसी प्रक्रिया के एक भाग के रूप में गत वर्ष अप्रैल में दुबई के अधिकारियों की एक टीम ने मुंबई में ऐसे बीस लड़के और लड़कियों के ख़ून की डीएनए (DNA) परीक्षा की ताकि उस की तुलना अपने उन नागरिकों के रक्त से की जा सके जिन्होंने हैदराबाद में विवाह रचाया था.

अधिकारयों ने इन युवाओं से वादा किया था की एक महीने के अंदर उन्हें जवाब मिल जाएगा और उन्हें वहां की नागरिकता भी मिल जाएगी. लेकिन यह लोग इस बात को लेकर बहुत निराश हैं कि अभी तक उन्हें दुबई से कोई उत्तर नहीं मिला.

सालम बिन हुमैद ने दुबई के शाह मोहम्मद रशीद बिन अल मक्तूम से अपील की है कि वो तुरंत अपने अधिकारियों को करवाई का निर्देश दें. "हम यहाँ पागलों की तरह घूम रहे हैं. दुबई के अफसर आकर हमें एक आस दिखा कर चले गए. अगर आप को काम करना है तो ठीक तरीके से करिए. किसी की भावनाओं से मत खेलिए." सालम ही की तरह मंसूर अली को भी दुबई से जवाब का बेचैनी से इंतज़ार है.

उनका कहना था, "दुबई से जो अधिकारी आए थे उनका व्यवहार हमारे साथ बहुत अच्छा था. उन्होंने हमारे ख़ून का नमूना लिया. उनके पास हमारा सारा रिकॉर्ड था और उन्होंने बहुत हमदर्दी दिखाई. हमारे फ़िंगर प्रिंट लिए, अरबी काग़ज़ात पर हमारे दस्तख़त लिए और हमें दिलासा दिया कि वो हमारा काम जल्द ही कर देंगे लेकिन 11 महीने गुज़र चुके हैं लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं आया. हम बहुत बेचैन हैं और एक एक दिन हम पर बहुत भारी है." इधर नासिर जमाल मोहम्मद ने भी भारत और शारजाह में अपना डीएनए टेस्ट करवाया है और उनका रिकॉर्ड वहाँ की सरकार के पास मौजूद है लेकिन अपने पिता से मिलने का उनका इंतज़ार अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है. नासिर ने कभी अपने पिता को नहीं देखा और वो मानते हैं कि सालम बिन हुमैद ख़ुशनसीब है क्योंकि उस के पास कम से कम अपने पिता के फोटो की प्रति तो है. लेकिन फिर भी 31 वर्षीय नासिर से लेकर 16 वर्षीय सईद अली तक कोई भी हिम्मत हारने और निराश होने को तैयार नहीं है. उन्हें उम्मीद है कि दुबई और संयुक अरब अमीरात की सरकारें उन के साथ न्याय करेंगी और अपने दरवाज़े उन के लिए खोलेंगी. लेकिन संयुक्त अरब अमीरात के अलावा अन्य अरब देशों के नागरिकों के ऐसे बेसहरा बच्चों के सामने ऐसी कोई उम्मीद नहीं है जिन्होंने हैदराबाद की लड़कियों से विवाह किया था क्योंकि उनकी सरकारों ने ऐसे बच्चों पर कोई ध्यान नहीं दिया है और ना ही उन्हें अपनाने की बात कही है.

शायद भारत सरकार को ही उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए पहल करनी पड़ेगी.

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