युद्ध ग्रस्त इराक़ को पांव देने की पहल

जयपुर फ़ुट
Image caption जयपुर फ़ुट समिति का दावा है कि उसने अभी तक पौने चार लाख पांव लगाए हैं

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में जमी बर्फ़ तो न जाने कब पिघले मगर ये पहला मौक़ा है जब भारत और पाकिस्तान के दो ग़ैर सरकारी संगठनों ने युद्ध से जर्जर इराक़ में अपाहिज हुई ज़िंदगियों को सहरा देने के लिए हाथ मिलाया है.

भारत की भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति और पाकिस्तान का हसवा ट्रस्ट इराक़ की हिंसा में पैर गँवा चुके लोगों को जयपुर फ़ुट के सहारे खड़ा करेंगे.

इसके लिए समिति ने अपने 22 तकनीकी विशेषज्ञों का एक दल इराक़ की राजधानी बग़दाद के लिए रवाना किया है. इस दल का नेतृत्व समिति के संरक्षक डीआर मेहता कर रहे हैं.

भारत में सतारूढ़ गठबंधन की अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने सोमवार को इस दल को नई दिल्ली से रवाना किया. ये दल मंगलवार को बग़दाद पहुँच जाएगा और कोई एक महीने तक शिविर लगा कर विकलांगो लो जयपुर फ़ुट के सहारे चलने लायक़ बनाएगा.

डीआर मेहता कहते है, "यह दोनों देशो के 'पीपुल टू पीपुल' संबधो की बेहतरीन मिसाल होगी. जब समिति और पाकिस्तान का ये ट्रस्ट दोनों मिलकर ऐसे पैरो को चलने की ताक़त देंगे जो हिंसा की भेंट चढ़ कर अपाहिज हो गए थे."

''हमारा इरादा लगभग एक हज़ार लोगो को जयपुर फ़ुट लगाने का है. इसमें हम इराक़ के चलाबी फ़ाउंडेशन के साथ काम करेंगे. ये इराक़ी संस्था इस नेक काम की तीसरी साझीदार होगी."

मेहता ने हाल में बग़दाद का दौरा भी किया है. वह कहते है कि अभी यह कहना मुश्किल है कि इराक़ में कितने लोगों को जयपुर फ़ुट ज़रूरत हैं मगर एक अनुमान के मुताबिक़ लगभग 30 हज़ार ऐसे अपाहिज है जो हिंसा में अपना पैर खो चुके हैं.

उन्होंने के कहा, "हम चाहते है कि वहाँ एक पूरा केंद्र स्थापित हो जो जयपुर फ़ुट लगाने का काम करे."

इस दल में शामिल ओमप्रकाश एक निपुण टेक्नीशियन हैं जो दुनिया के हर हिस्से में जाकर जयपुर फ़ुट लगा चुके है. ओमप्रकाश कहते है, "हम तो सेवा के भाव से जा रहे है. हमारी इच्छा है कि युद्ध में पैर खो चुके लोगों को हम जयपुर फ़ुट लगाकर फिर से चलते फिरते देख सकें."

ख़राब अनुभव

ओमप्रकाश के लिए सबसे ख़राब अनुभव अफ़्रीकी देश सिएरा लियोन का रहा जब 1991 में हथियारों से लैस एक भीड़ ने उस क़स्बे को लंबे समय तक घेरे रखा जहाँ समिति के लोग जयपुर फ़ुट लगाने गए थे.

Image caption जयपुर पैरों की मांग विदेशों में भी बढ रही है

इराक़ के लिए रवाना हुए कृष्ण कहते हैं, "हम तो ख़िदमत का जज़्बा लेकर जा रहे है. इसलिए दिल मे कहीं कोई भय का नाम नहीं है."

मेहता कहते हैं कि जयपुर फ़ुट इंसानी पैर से बहुत मिलता जुलता है. ''ये लचीला है, टिकाऊ है, इसे लगाकर कोई भी अपाहिज न केवल रोज़मर्रा के काम कर सकता है बल्कि वो ज़रुरत पड़ने पर दौड़ भी सकता है, ज़मीन पर बैठ सकता है. अगर कोई इस्लाम को मानने वाला है तो बैठ कर इबादत भी कर सकता है."

जब से जयपुर फ़ुट की शुरूआत हुई है तब से अब तक इस समिति ने कोई पौने चार लाख अपाहिजों को जयपुर फ़ुट लगाकर चलने फिरने के क़ाबिल बना दिया है.

मेहता कहते है, "जयपुर फ़ुट की लागत भी इसी तरह के अन्य बनावटी पैरों के मुक़ाबले बहुत कम है. ये भारत में लगभग चालीस अमरीकी डॉलर में मिल सकता है जबकि अमरीका में इसकी क़ीमत लगभग दस हज़ार डॉलर है. हाँ इराक़ में इसकी लागत लगभग 200 डॉलर आएगी." दुनिया अगर देखेगी तो ये एक सुनहरा मंज़र होगा जब भारत और पाकिस्तान के लोग इराक़ में अपाहिज हुई ज़िंदगियों को हाथ से हाथ मिलाकर पैरों पर खड़ा करेंगे.

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