नशे की चपेट में कश्मीरी युवा

डल झिल
Image caption एक अंदाज़े के अनुसार 15 से 40 के उम्र के समूह की एक तिहाई आबादी नशा करती है

भारत प्रशासित कश्मीर में विशेषज्ञों का कहना है कि नशीले पदार्थ का इस्तेमाल महामारी की तरह फैल रहा है और युवाओं की एक बड़ी आबादी इसकी ज़द में है.

जाने-माने मनोचिकित्सक डॉक्टर अरशद हुसैन कहते हैं कि 1980 के दशक में कश्मीर में मादक पदार्थों का इस्तेमाल आबादी के एक छोटे से तबक़े में हो रहा था जबकि उन दिनों भारत सहित इसके पडो़सी देशों में ये अनियंत्रित समस्या थी.

भारत, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों में 1980 के दशक में अफ़ीम का बोलबाला था. युवाओं में अफ़ीम और हेरोइन की लत थी, लेकिन कश्मीर नशीले पदार्थों की तस्करी के रास्ते में होने के बावजूद उस रोग से दूर था.

डॉक्टर अरशद कहते हैं, "आजकल हमारी युवा पीढ़ी यानी 18-25 साल की उम्र के युवाओं में नशीले पदार्थों का इस्तेमाल एक आम समस्या है."

डॉक्टर अरशद आगे कहते हैं, "हम देख रहे हैं कि इस उम्र समूह में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से मौत भी हो रही है. महामारी विशेषज्ञ ने हमें बताया कि जब नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से मौत हो जाए तो जानना चाहिए कि नशीले पदार्थों का इस्तेमाल युवाओं में एक महामारी के रुप में फैल रहा है."

कारण

समाज शास्त्रियों के अनुसार कश्मीर में नशीले पदार्थों का इस्तेमाल आम हो जाने के कई कारण हैं. ग्रामीण आबादी का शहरों में आना और लोगों का पैसे के पीछे भागना शामिल हैं.

कश्मीर विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर बशीर अहमद डबला का कहना है कि इसके पीछे 20 वर्षों के दौरान राज्य में हिंसक पृथकतावादी आंदोलन के कारण एक सामान्य परिवार के मुखिया का अधिकार कमज़ोर हो गया है.

वो कहते हैं, "इसका सीधा परिणाम भटकाव और अपराध के रुप में सामने आया है."

डॉक्टर डबला आगे कहते हैं, "इन हालात में हम समाजिक अराजकता देख सकते हैं, हमारे यहाँ मादक पदार्थों का इस्तेमाल काफ़ी अधिक है. एक अंदाज़े के अनुसार 15 से 40 के उम्र के समूह की एक तिहाई आबादी में ये लत पाई गई है."

मनोचिकित्सक मुज़फ़्फ़र अहमद ख़ान श्रीनगर में पुलिस के ज़रिए खोले गए मादक निवारण केंद्र में तैनात हैं. वे कहते हैं कि घाटी में नशा करने वाले अधिकतर लोग मादक द्रव्य का इस्तेमाल करते हैं. वो दवाइयों में कफ़ सिरप या स्पाज़मोप्रोज़िमैन (दर्द निवारक दवा) का उदाहरण देते हैं.

लेकिन डॉक्टर ख़ान कहते हैं कि इन सब दवाइयों में मादक पदार्थों के अंश होते हैं इसलिए युवा इनका ग़लत इस्तेमाल करते हैं.

डॉक्टर ख़ान के अनुसार दूसरे नंबर पर चरस, भांग, गांजा जैसे पदार्थों का इस्तेमाल होता है. उनका कहना है कि इन पदार्थों का ग़लत इस्तेमाल इस तरह से होता है कि इनका रोगी 10 दिन, 15 दिन या महीने दो महीने में इसका आदी बन जाता है.

कश्मीर घाटी में नशीली पदार्थों का इस्तेमाल गंभीर समस्या बन गई है हालाँकि इस ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया है जितना दिया जाना चाहिए.

राज्य मे ग़ैर सरकारी संगठनों के ज़रिए नशा निवारण केंद्र खोले गए हैं. लेकिन मनोचिकित्सकों का कहना है कि वास्तव में एक केंद्र काम कर रहा है. जो पुलिस के ज़रिए स्थापित किया गया है. लेकिन वहाँ केवल आठ बिस्तरों की गुंजाइश है.

मनोचिकित्सकों के अनुसार घाटी के प्रत्येक ज़िले में नशा निवारण केंद्र खोलने की आवश्यकता है.

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