अब कूड़े के लिए संघर्ष

कूड़ा
Image caption भारत में कई कंपनियों की नज़र अब घरेलू कूड़े कचरे पर है.

जर, जोरु और ज़मीन के लिए झगड़े तो आम बात है लेकिन अब कूड़ा जी हां घरेलू कूड़े को लेकर भी लोग संघर्ष कर रहे है.

यह संघर्ष कूड़ा बीनने वालों का है और उन्होंने अपनी मांगें को लेकर संसद मार्ग के पास प्रदर्शन भी किया है.

असल में लाखों करोड़ों घरों से निकलने वाले कूड़े पर अब निजी कंपनियों की नज़र पड चुकी है. ये कंपनियाँ अब कचरे से ऊर्जा बनाने के व्यापार में उतर रही हैं.

इस कारण कूड़ा-कचरा बीनने वाले अपनी रोज़ी-रोटी को लेकर आंशकित हैं.कूड़ा बीनने वालों का कहना है कि वो कूड़े को रिसाइकल करते हैं और सरकार को उन्हें संरक्षण देना चाहिए.

अलायंस ऑफ इंडियन वेस्टपिकर के बैनर तले दल ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक से मुलाकात करने की कोशिश की थी पर सफल नहीं हो पाए.

इनकी माँगो में कचरे से ऊर्जा बनाने पर रोक, सरकार द्वारा पहचान पत्र जारी किया जाना, पर्यावरण बचाने मे उनके योगदान की मान्यता और नगर पालिका द्वारा पंजीकरण शामिल है.

अब बड़ी बड़ी कंपनियाँ हाउसिंग सोसायटियों और लोगों से करार कर के कू़ड़ा उठा लेती है जिससे असंगठित क्षेत्र के कूड़ा-कचरा बीनने वाले घर-घर से कूड़ा इक्कठ्ठा नहीं कर पा रहे हैं.

अहमदाबाद से आई राजी बेन पराशर कहती हैं, ‘‘ कूड़ा तो कच्चा सोना है, वो सोना हमे क्यों ना मिले ? हम तो परंपरागत तौर पर कूड़ा बीनने का काम करते रहे है.’’

कूड़े पर हक के लिए रोज़ी-रोटी इनका इकलौता तर्क नहीं है. उन्हें गर्व है कि वो पर्यावरण को बचाने के लिए अहम भूमिका निभाते है.

मुंबई की सुशील साल्वे कहती हैं, " हम कूड़े से दोबारा इस्तेमाल की चीज़ें निकाल कर ना सिर्फ कूड़े की मात्रा घटाते हैं बल्कि नगर पालिका का 20 प्रतिशत पैसा भी बचाते है और साथ ही पर्यावरण भी."

इनका ये तर्क है कि कूड़े से ऊर्जा बनाने मे ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है वहीं कूड़े से दोबारा इस्तेमाल की चीज़ें निकाल कर ये लोग चीजों का जीवन काल बढा देते है.

भारत में अनुमान के मुताबिक 15 लाख लोग कूड़ा-कचरा बीनने का काम करते है और औसतन प्रतिदिन 60-200 रुपये कमाते है.

वैश्वीकरण का सामना कर रही विकासशील दुनिया के कई छोटे मोटे उद्योग बड़ी कंपनियों के ग्रास में समा चुके हैं लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ये कंपनियां कूड़े को भी नहीं छोड़ेंगी.

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