शुभा मुदगल के सुरीले 'शब्द बाण'

  • 27 मार्च 2010
शुभा मुदगाल (तस्वीरः नितिन जोशी)
Image caption शुभा मुदगल संगीत सीखने में गुरू के बड़े योगदान को स्वीकार करती हैं.(तस्वीरः नितिन जोशी)

शुभा मुदगल ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और पॉप संगीत के बीच बड़ी ही मधुरता और सुगमता से एक पुल बनाया है.

जब वे भजन गाती हैं तो उनके सुर पूरी तन्मयता से भक्ति रस में डूबे लगते हैं. इसी तरह ख्याल और ठुमरी भी उनकी आवाज में उतनी ही परिपक्वता से सजते हैं.

पेश है शुभा मुदगल से बातचीत के प्रमुख अंश-

आपने कथक सीखना प्रारंभ किया था फिर गायन में रूचि कैसे हुई?

आजकल ऐसी धारणा बन गई है कि जो नृत्य करता है, उसे गायन या वादन में कोई रूचि नहीं होगी. लेकिन आप ध्यान से देखें तो जो हमारे यहाँ सिखाने का तरीक़ा और सिलसिला है, उसमें हमेशा एक इंटर डिस्सीप्लीनरी अप्रोच रखा गया है. मेरी माँ ने मुझे सलाह दी कि मैं गायन भी सीखूं. इलाहाबाद में पंडित रामआसरे झा जी से बाकायदा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखना प्रारंभ किया.

आप किस तरह की बच्ची थीं?

यह सवाल तो आप अगर मेरी माँ से पूछतीं तो वो बतातीं. पर हाँ, उनकी बातों से लगता है कि मुझे बचपन से ही साहित्य और संगीत से बहुत लगाव था.

क्या आपके घर में संगीत का माहौल था?

संगीत का ही नहीं, साहित्यिक माहौल भी था. मेरी माँ और पिता जी ने घर में ऐसा माहौल बनाया जहाँ कविता पढ़कर सुनाई जाती थी. साहित्य की चर्चा होती थी.

संगीत सीखने में गुरु का कितना महत्व है?

भारतीय शास्त्रीय संगीत को गुरुमुखी विद्या कहा ही गया है. उठने-बैठने का सलीका, बड़ों से कैसे आशीर्वाद लिया जाए, वाद्ययंत्र की देखभाल कैसे की जाए-ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं लिखीं होती हैं. ये सभी बातें शिष्य या शागिर्द गुरु के सानिध्य में ही सीखता है.

शास्त्रीय संगीत का व्यावसायीकरण कहाँ तक उचित है?

मेरे जैसे एक व्यावसायिक कलाकार की आजीविका भी संगीत से चलती है. ऐसा नहीं है कि जब मैं भजन गाती हूँ तो प्रोफ़ेशनल फ़ीस नहीं लेती. न ही ये होता है कि जब मैं फ़िल्मों के लिए भजन गा रही होती हूँ तो वो भक्ति विहीन होता है.

आपको किस तरह का संगीत गाने में आनंद आता है?

अपनी मातृभाषा को बोलने में हमको कुछ भी सोचना नहीं पड़ता है. हमारे अंदर भाव सहज ही आते जाते हैं. संगीत में मेरी मातृभाषा है ख्याल और ठुमरी यानी शास्त्रीय संगीत. इसी को गाने में मुझे सबसे ज़्यादा आनंद आता है.

आपको कौन सा राग सबसे अधिक पसंद है?

किसी एक राग को पसंदीदा कहना एक संगीत के विद्यार्थी के लिए संभव नहीं है. हाँ, इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि वो राग जिसे महाराग कहा जाता है, उनसे एक ख़ास संबंध बन जाता है. इनमें प्रमुख हैं यमन, मारवा पूर्वी आदि.

क्या हमेशा यह ज़रूरी है कि आप किसी न किसी घराने से जुड़े हों?

बिलकुल ज़रूरी है. आप जिस गुरु से सीखते हैं तो उनका घराना ही आप का घराना होता है. कभी-कभी आपके एक से ज़्यादा गुरु होते हैं तो घराना भी बदलता है.

क्या प्रत्येक घराने का अपना-अपना नियम होता है जिससे अलग आप नहीं जा सकते हैं?

नहीं, ऐसा कोई ख़ास नियम नहीं होता है. पर हर घराने के गाने का अपना एक अलग तरीक़ा होता है. जैसे स्वर लगाने का या विस्तार करने का. ये अंदाज़ गायक में स्पष्ट रूप से दिखते हैं. किराना घराना के दो बहुत बड़े कलाकार पंडित भीमसेन जोशी और गंगूबाई हंगल के घराने की विशेषता दोनों की गायिकी में दिखती है लेकिन दोनों काफ़ी अलग भी हैं.

आपके ब्लॉग का नाम शब्द बाण है. यह नाम आपने क्यों चुना?

यह शब्द से संबंधित है. बाण इसलिए रखा कि इसमें वाणी का समावेश है और बाण लगने से लोगों पर असर होता है. चाहे वो प्रेम बाण हो या शब्द बाण. उस असर को करने की इच्छा थी शायद इसीलिए यह नाम रखा.

शब्द बाण के ज़रिए लोगों से जुड़ना कैसा लगता है?

मुझे अपने काम में लोगों से मिलने का भरपूर अवसर मिलता है. लेकिन जब कोई बात मैं संगीत में नहीं कह पाती और कुछ ख़ास कहना होता है तो ऐसे में शब्द बाण का सहारा लेती हूँ.

आपने संगीत भी दिया है. आजकल महिला संगीतकार कम हैं. ऐसे में इस दिशा में आने के लिए कैसे सोचा?

महिला संगीतकार कम हैं, ऐसा नहीं है. महान गायिका लता मंगेशकर ने भी गीतों को संगीतबद्ध किया है. मुझे कुछ डॉक्यूमेंट्री और फ़ीचर फ़िल्मों में भी संगीत देने का मौक़ा मिला.

भविष्य में आपके चाहने वालों को क्या सौगात मिलने वाली है?

मैं अभी 2-3 अलग-अलग प्रोजेक्ट पर काम कर रही हूँ. उनमें से एक है भारतेंदु जी की रचनाओं को स्वरबद्ध करना. इसमें मैंने और मेरे पति अनुष प्रधान जी ने गाया है. इनको हमने शास्त्रीय और उप शास्त्रीय अंदाज़ में रिकॉर्ड किया है.

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