क्या ईसा मसीह का कश्मीर में मक़बरा है?

  • 28 मार्च 2010
रौज़ाबल, कश्मी
Image caption कहा जाता है कि इस रौज़ाबल दरगाह में ईसा मसीह की क़ब्र है

एक परंपरा ये कहती है कि ईसा मसीह ने सूली से बचकर अपने बाक़ी दिन कश्मीर में गुज़ारे और इसी आस्था के कारण श्रीनगर में उनका एक मज़ार बना दिया गया जोकि विदेशी यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है.

श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को रौज़ाबल के नाम से जाना जाता है.

यह शहर के उस इलाक़े में स्थित है जहाँ भारतीय भारतीय सुरक्षा बल की गश्त बराबर जारी रहती है या फिर वह अपने ठिकानों से सर निकाले चौकसी करते हुए नज़र आते हैं.

इसके बावजूद वहां सुरक्षाकर्मियों को कभी-कभी चरमपंथियों से मुठभेड़ का सामना करना पड़ता है तो कभी पत्थर फेंकते बच्चों का. फिर भी सुरक्षा स्थिति में बेहतरी आई है और पर्यटक यहां लौट रहे हैं.

पिछली बार जब एक साल पहले हमने रौज़ाबल की तलाश की थी तो हमारे टैक्सी वाले को एक मस्जिद और दरगाह के कई चक्कर लगाने पड़े थे और काफ़ी पूछने के बाद ही हमें वह जगह मिली थी.

यह रौज़ा एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है.

एक दरबान मुझे अंदर ले गया और उसने मुझे लकड़ी के बने कमरे को ख़ास तौर से देखने के लिए कहा जो कि जालीनुमा जाफ़री की तरह था.

इन्हीं जालियों के बीच से मैंने एक क़ब्र देखी जोकि हरे रंग की चादर से ढकी हुई थी.

'वो प्रोफ़ेसर'

इस बार जब में फिर से यहां आया तो यह बंद था. इसके दरवाज़े पर ताला लगा था क्योंकि यहां काफ़ी पर्यटक आने लगे थे.

इसका कारण क्या हो सकता था. नए ज़माने के ईसाइयों, उदारवादी मुसलमानों और दाविंची कोड के समर्थकों के मुताबिक़ भारत में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहां शव रखा है.

आधिकारिक तौर पर यह मज़ार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूज़ा आसफ़ का मक़बरा है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि यह नज़ारेथ के येशु यानी ईसा का मज़ार है.

उनका मानना है कि सूली से बचकर ईसा मसीह 2000 साल पहले अपनी ज़िंदगी के बाक़ी दिन गुज़ारने कश्मीर चले आए थे.

रियाज़ के परिवार वाले इस रौज़े की देख-भाल करते हैं और वह नहीं मानते कि ईसा यहां दफ़न हैं.

उसने कहा, "ये कहानी स्थानीय दुकानदारों की फैलाई हुई है क्योंकि किसी प्रोफ़ेसर ने कह दिया था कि यह क़ब्र ईसा मसीह की है. उन्होंने सोचा की यह उनके कारोबार के लिए काफ़ी अच्छा होगा. पर्यटक आएंगे. आख़िर इतने सालों की हिंसा के बाद."

Image caption कहा जाता है कि यहां 80 ई. में एक बौद्ध सम्मलन हुआ था जिसमें ईसा भी आए थे

उसने ये भी कहा, "और फिर ये हुआ कि लोनली प्लैनेट में इसके बारे में ख़बर प्रकाशित हुई और फिर ये हुआ कि बहुत सारे लोग यहां आने लगे."

उसने मेरी ओर खेद भरी नज़रों से देखते हुए कहा, "एक बार एक विदेशी यहां आया और मक़बरे से एक टुकड़ा तोड़ कर अपने साथ ले गया."

कहानी सुनाते हुए उसने कहा, "एक बार एक थका-हारा, और मैला आस्ट्रेलियाई जोड़ा अपने हाथ में लोनली प्लेनेट का भारत के लिए नया ट्रैवेल गाइड लिए पहुंचा जिसमें ईशनिंदा पर कुछ आपत्तियों के साथ ईसा की मज़ार के बारे में लिखा गया था."

"उन्होंने मुझे मज़ार के बाहर उनकी तस्वीर लेने के लिए कहा क्योंकि मज़ार बंद था. वे इस बात से ज़्यादा परेशान नहीं हुए."

उनका कहना था कि उनके लिए ईसा का मज़ार भारत में उनकी यात्रा के दौरान उन स्थानों की सूची में शामिल था जिन्हें देखना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था यानी अपनी मस्ट-विज़िट लिस्ट में शामिल कर रखा था.

बौद्ध सम्मेलन

श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार के खंडहर हैं जिसका ज़िक्र अभी लोनली प्लेनेट में नहीं हो सका है.

Image caption भारत में ईसाई धर्म के मानने वाले दो प्रतिशत हैं

यह वह जगह है जहां हम पहले नहीं जा सके थे क्योंकि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया था कि वह इलाक़ा चरमपंथियों से भरा हुआ है.

लेकिन अब ऐसा लगता है कि वहां के चौकीदार बहुत सारे पर्यटकों के आने के लिए तैयार हैं क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ी के 50 शब्द सीख लिए हैं और वे अपने छुपे हुए पुराने टेराकोटा टाइलों को बेचने का इरादा रखते हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि सन 80 में हुए महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था. यहां तक कि उन्होंने वह जगह भी बताई कि ईसा मसीह उस सम्मेलन में कहां बैठे थे.

ईसा मसीह के संदर्भ में ये कहानियां भारत में 19वीं शताब्दी से प्रचलित हैं.

ये उन कोशिशों का नतीजा थीं जिसमें बुद्धिजीवियों में 19वीं सदी के दौरान बौद्ध और ईसाई धर्मों के बीच समानता को उजागर करने की कोशिश की गई थी. ऐसी ही इच्छा कुछ ईसाइयों की थी कि वे ईसा मसीह की कोई कहानी भारत से जोड़ सकें.

ईसा मसीह के कुछ वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं है कि वह 12 साल की आयु से लेकर 30 वर्ष की आयु तक कहाँ थे.

कुछ लोगों का मानना है कि वह भारत में बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, लेकिन आम तौर पर इसे सही नहीं माना जाता है.

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