मुद्दों के पीछे भागती भारतीय राजनीति

  • 31 मार्च 2010
मुलायम सिंह और लालू यादव
Image caption लालू और मुलायम महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे हैं.

आरक्षण, आरक्षण और अधिक आरक्षण! लगता है भारतीय राजनीति को 'आरक्षण बुखार' चढ़ गया है. क़रीब दो हफ़्ते पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण बिल राज्य सभा में पारित करवा कर महिलाओं का दिल लूट लिया था.

अब सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश में मुस्लिम कोटे का रास्ता साफ़ कर देश के सबसे बडे अल्पसंख्यक समुदाय का मन मोह लिया. अब देखिए कुछ और समय में कौन सा राजनीतिक दल आरक्षण का कौन सा नया गुल खिलाता है.

भाई आप मानिए या न मानिए राजनीति में इन दिनों आरक्षण की बहार है. बात यह है कि भारतीय राजनीति अधिकतर किसी न किसी एक मुद्दे पर ही चलती है. नेता सोचते हैं कि जिस मुद्दे का राजनीतिक मौसम चल रहा हो उसको भुनाओ और चुनाव जीतो. कम से कम हम सन 1970 के दशक से यही देखते आ रहे हैं.

राजनीति के मुद्दे

आपको याद दिलाते हैं कि किस दशक में भारतीय राजनीति में कौन सा मुद्दा या मौसम छाया रहा.

सन 1972 में इंदिरा गांधी ने 'ग़रीबी हटाओ' के नारे पर लोकसभा का चुनाव जीता था. बस क्या था, इसके बाद से ही देश की राजनीति में ग़रीबी हटाने का मौसम चल पड़ा.

ग़रीबी हटी या नहीं हटी लेकिन इंदिरा जी का राजनीतिक जीवन निसंदेह ग़रीबों के साथ जुड़ गया. आज भी इंदिरा ग़रीबों की मसीहा मानी जाती हैं.

इसके बाद कुछ समय के लिए 1980 में बोफ़ोर्स का मौसम आ गया. अरे साहब देखते-देखते सारा देश राजीव गाँधी पर चढ़ दौड़ा.

बोफ़ोर्स की बहार में वीपी सिंह चमक उठे. राजीव हीरो से ज़ीरो हो गए. बेचारे राजीव गांधी, बात-बेबात बोफ़ोर्स के मौसम की नज़र भेंट हो गए. और जैसे ग़रीबी हटाओ अभियान में ग़रीबी नहीं हटी वैसे ही बोफ़ोर्स अभियान में भ्रष्टाचार का कुछ नहीं बिगड़ा. लेकिन देश का एक अच्छा नेता बोफ़ोर्स की भेट चढ़ गया.

फिर देखते-देखते भगवान राम के बुखार ने देश की राजनीति को जकड़ लिया. वह अयोध्या जिसका भारतीय राजनीति में सन 1986 के पूर्व बहुत कम जिक्र होता था, वही अयोध्या भगवान राम की जन्म भूमि के नाते देश की राजनीति को भगवामय बना गया.

मुद्दे और आम आदमी

भले ही भगवान राम का भव्य मंदिर का बनना अभी भी पाइप लाइन में हो पर वह भाजपा जिसके सन 1984 में लोकसभा में केवल चार सांसद थे, वही भाजपा राम के नाम पर सत्ता में पहुँच गई. फिर राम बुखार ऐसा उरता की भाजपा सत्ता में ही ना रही.

फिर 21 शताब्दी में सोनिया गाँधी ने 'आम आदमी' का मंत्र चलाया और सिकुड़ी-सिमटी कांग्रेस सत्ता तक पहुँच गई. दो लोकसभा चुनावों के बाद भले ही आम आदमी महँगाई के बोझ तले कुचला जा रहा हो लेकिन कांग्रेस मजे में है.

पर 'आम आदमी' का मौसम दो चुनाव तक चला. इस महँगाई में अब चुनाव जीतने को नया मंत्र चाहिए. और मंत्र मिल भी गया. वह मंत्र है आरक्षण.

कभी महिलाओं का आरक्षण तो कभी मुसलमानों का आरक्षण. आलू , प्याज, दाल, चावल, पेट्रोल के दाम भले ही आसमान छू रहे हों लेकिन राजनीतिक और मीडिया जगत में तो बस अब आरक्षण की धूम है.

Image caption राम मंदिर का मुद्दा उछालकर भाजपा केंद्र की सत्ता तक पहुँच गई.

कोई महिला आरक्षण के पक्ष में है तो कोई विरोध में. किसी को मुस्लिम समाज का उद्धार केवल आरक्षण में दिख रहा है तो किसी को मुस्लिम आरक्षण से देश टूटता दिख रहा है.

बस अब न महँगाई पर बहस और न भ्रष्टाचार पर कोई बात. कहा न यहाँ तो आरक्षण का मौसम है. अब कम से कम दो चुनाव आरक्षण के मुद्दे पर ही होंगे.

महिलाएँ और मुस्लिम समाज आरक्षण से कितना सशक्त होगा यह तो एक शताब्दी बाद इतिहास तय करेगा, हाँ अभी तो आरक्षण के इस राजनीतिक मौसम में कुछ राजनितिक पार्टियों का ही सशक्तिकरण होगा. यही कारण है कि अब क़रीब एक दशक तक आरक्षण पर ही बहस होगी.

कहा न, अब तो भारतीय राजनिति पर आरक्षण का बुखार चढ़ा हुआ है. बस अब आरक्षण, आरक्षण और आरक्षण ही होगा.

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