'फांसी से पहले बच्चा चाहिए'

Image caption जसवीर को फाँसी और सोनिया को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है

पंजाब में सोलह वर्षीय एक बालक के अपहरण और हत्या के दोषी पाए गए पति-पत्नी ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर गुहार लगाई है कि उन्हें क़ैद के दौरान दाम्पत्य संबंध कायम करने का अधिकार दिया जाए.

पंजाब की पटियाला जेल में क़ैद जसवीर सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी की सज़ा सुनाई थी जबकि उनकी पत्नी सोनिया को उम्रकैद की सज़ा सुनाई जा चुकी है.

ये मामला वर्ष 2005 का है जब पति-पत्नी ने होशियारपुर के एक 16 वर्षीय बालक का अपहरण किया और उसे रिहा करने के लिए उसके माता-पिता से 50 लाख रुपए माँगे. लेकिन बालक को नशीला पदार्थ दिए जाने के कारण उसकी मौत हो गई.

इसके बाद इस मामले में गिरफ़्तार हुए पति-पत्नी के ख़िलाफ़ न्यायिक कार्रवाई हुई और उन्हें पहले स्थानीय अदालत की ओर से फांसी की सज़ा सुनाई गई जिसे उच्च न्यायालय ने कायम रखा. सुप्रीम कोर्ट ने जसवीर की फाँसी की सज़ा को कायम रखा जबकि सोनिया की सज़ा को घटाकर उम्रकैद में बदल दिया था.

दाम्पत्य संबंध कायम करने के बारे में उनकी याचिका पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अगले महीने सुनवाई होगी.

किरण बेदी सहमत नहीं

जसवीर और सोनिया की वकील गुरशरण कौर मान ने बीबीसी को बताया, "दोनों चाहते हैं कि जेल में उन्हें शादी-शुदा लोगों की तरह साथ रहने और अपने वारिस पैदा करने का अधिकार दिया जाए. दाम्पत्य संबंध जीवन के अधिकार के अंतर्गत आता है.

उनका कहना था कि उच्च न्यायालय के समक्ष उन्होंने दलील रखते हुए कहा है, "अदालतों ने संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार के तहत ये माना है कि वंश आगे बढ़ाने का अधिकार भी इसका हिस्सा है. जसवीर और सोनिया को अपना बच्चा चाहिए क्योंकि जसवीर अपने माता-पिता का एक ही बेटा है. विकसित देशों में ये हक़ क़ैदियों को मिला हुआ है और ये माना गया है कि जेल से रिहाई के बाद इससे ऐसे लोगों के समाज में पुनर्वास में मदद मिलती है."

लेकिन तिहाड़ जेल में सुधार लाने के लिए ख़ासी चर्चा में रहीं पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी इससे सहमत नहीं हैं.

किरण बेदी ने बीबीसी से कहा, "जब कोई अपराध होता है और न्यायालय की ओर से सज़ा दी जाती है तो वो पूरी होनी चाहिए. सज़ा का मतलब ही यही है कि आपके कुछ अधिकार होते हैं और कुछ अधिकार आपको नहीं दिए जाते."

उनका मानना है, "क़ैद की सज़ा के दौरान सामान्य दाम्पत्य जीवन गुज़ारने का अधिकार नहीं होता है. नहीं तो क़ैद में और समान्य जीवन में फ़र्क क्या हुआ? विकसित देशों की सभ्यता अलग है और वहाँ सज़ा देने के अलग-अलग तरीकें हैं लेकिन भारत में ये प्रथा नहीं है और मैं भारतीय प्रणाली को सही मानती हूँ."

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